शनिवार, 25 जून 2011

गुटबंदी का कोई इलाज नहीं

पूर्वांचल की माटी ने एक से एक साहित्य सृजनकार पैदा किए हैं। वे अपनी प्रतिभा से पूरे विश्व को साहित्य रस में डुबोते हैं। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को जब बिड़ला फाउंडेशन 2010 का व्यास सम्मान देने की घोषणा हुई तो यहां की प्रतिभा ने एक बार फिर लोगों को चमत्कृत कर दिया। परमानंद श्रीवास्तव के बाद वह पूर्वांचल के दूसरे साहित्यकार थे, जिन्हें इस पुरस्कार से नवाजा गया। विश्वनाथ जी को पुरस्कार मिलने की घोषणा के साथ ही उनका मोबाइल और लैंडलाइन फोन घनघनाने लगा। हर शुभचिंतक उन्हें बधाई देने लगा। पत्रकारों के फोन आने लगे, इंटरव्यू और बातचीत के लिए। मैं भी उनमें से एक था। आखिर उनसे समय मिला और पहुंच गया उनके घर। इससे पहले मैं उनसे मिला नहीं था। मन में एक सवाल था लकदक व्यक्तित्व होगा। सम्मान मिलने के बाद उसमें और भी निखार आया होगा। मन में कुछ हिचकिचाहट थी, लेकिन जब मिला तो ऐसा लगा जैसे हम पहली बार नहीं मिले हैं। बिल्कुल सरल और साधारण व्यक्तित्व, जो किसी को भी आकर्षित कर जाए। जब हम पहुंचे तो वह जिस हालत और जिस कपड़े में थे, उसी में चले आए। सामने वाले पर प्रभाव डालने के लिए कोई विशेष कपड़ा नहीं पहना। शरीर पर साधारण कुर्ता और लुंगी। बात करने का लहजा इतना सरल, साफ कि हर बात आसानी से समझ में आ जाए। पूरे इंटरव्यू के दौरान कहीं नहीं लगा कि वह हड़बड़ी में हैं। बोलने की स्पीड उतनी ही थी, जितनी मैं आसानी से लिख सकूं। कुल करीब एक घंटे के इंटरव्यू के दौरान साहित्य चर्चा के रस में डुबता-उतराता रहा। पेश है उनसे बातचीत के कुछ खास अंश।

प्रश्न- 2008 में प्रकाशित कविता संग्रह फिर भी कुछ रह जाएगा के लिए व्यास सम्मान मिलने पर कैसा महसूस कर रहे हैं?
उत्तर- खुशी हो रही है। सबसे खुशी की बात यह है कि यह पुरस्कार सर्वसम्मति से मिला है। यह कविता संग्रह 12 सालों की मेहनत के बाद आई। कई विषयों पर लिखने के बाद इसे एक किताब का रूप दिया। इससे पहले 1991 में आखर अनंत कविता संग्रह आया था। अन्य चीजों के मुकाबले कविता लिखना कठिन काम है।
प्र-क्या लेखकों के लिए पुरस्कार जरूरी होता है?
उ- बिल्कुल होता है। इससे लेखक का उत्साह बढ़ता है। मनोबल बढ़ता है। इससे लगता है कि उसके काम को स्वीकृति मिल रही है। वैसे कोई भी लेखक पुरस्कार के लिए नहीं लिखता है।
प्र- जिस कविता संग्रह के लिए आपको पुरस्कार मिला है, उसे किस वर्ग को फोकस किया गया है?
उ- इसमें हमारे समय के समाज का वर्णन है। उपभोक्तावाद, स्त्री और दलित विमर्श और भारतीय मूल्य पर इसमें फोकस किया गया है। इस कविता संग्रह में उपेक्षित और संघर्षशील मनुष्य है।
प्र- अब तक आपकी कितनी किताबें और कविता संग्रह आ चुके हैं?
उ- अब तक पांच कविता संग्रह आ चुके हैं। पहला 1970 में चीजों को देखकर, दूसरा साथ चलते हुए 1976, तीसरा बेहतर दुनिया के लिए 1985, चैथा आखर अनंत 1991 और पांचवा जिस पर पुरस्कार मिला।  साथ चलते हुए कविता संग्रह में आपातकाल और बांग्लादेश युद्व को आप पा सकते हैं। जो इसमें लिखा गया है, वैसी ही स्थिति उस समय भारत और बांग्लादेश के नागरिकों की थी।
प्र- लेखकों की गुटबंदी को लेकर अक्सर बात सामने आती है। देखा जाता है कि पुरस्कार देने में भी गुटबंदी हावी रहती है।  क्या आप भी किसी गुट में शामिल हैं?
उ- गुटबंदी का कोई इलाज नहीं है। लेखक का काम लिखना होता है। उसे गुटबंदी से कोई मतलब नहीं होना चाहिए। गुटबंदी लेखक की सृजनात्मक क्षमता को नष्ट करता है। हां लेखकों में विचार की विभिन्नता होनी चाहिए। मैं किसी गुट में शामिल नहीं हूं। वैसे हम किसी को गुटबंदी से मुक्त नहीं करा सकते। यह लोकतं़त्र का एक अनिवार्य अंग है।
प्र- कहा जाता है कि आप प्रगतिशील खेमे के बाहर के लेखक हैं, इस बारे में आप का क्या कहना है?
उ- प्रगतिशीलता मेरी रचानाओं में आप पा सकते हैं। प्रगतिशील मुझे अपने खेमे से बाहर का मानते हैं और गैर प्रगतिशील अपने खेमे में। मैं पहले ही कह चुका हूं कि किसी खेमे में नहीं हूं।
प्र-आप साहित्य अकादमी के हिंदी  भाषा के संयोजक हैं। आम साहित्यकारों के लिए आप क्या कर रहे हैं?
उ- इसके लिए हम छोटे-छोटे नगरों में कार्यक्रम का आयोजन कराने की कोशिश है। ऐसे आयोजनों में प्रतिभावान लेखकों को जोेड़ा जाए। इस तरह के आयोजन के जरिए 600 लेखकों को जोड़ चुका हूं। हम हिंदी भाषा की सर्वश्रेष्ठ पुस्तकों को छापने हैं जिन्हें अन्य प्रकाशक नहींे छापते। इस पद पर मैं 2012 तक रहूंगा। कोशिश है कि जहां तक संभव हो सके आम लेखकों के लिए अच्छा काम करूं।
प्र- नई पीढ़ी के युवा का रूझान साहित्य की तरफ कम हो रहा है। क्या इससे साहित्य का नुकसान नहीं हो रहा है?
उ- देखिए आज की युवा पीढ़ी टेक्निकल एजूकेशन की तरफ भाग रही है। उसके उपर टेक्नोलाजी का दबाव ज्यादा है। लेकिन ऐसा नहीं है कि इससे साहित्य को नुकसान पहुंच रहा है। नये लेखक नहीं आ रहे हैं। जिसके अंदर सृजनात्मक क्षमता है, वह बाहर आती ही है, चाहेें वह कहीं भी रहे। एक लेखक के अंदर सृजनात्कता जन्म से होती। कोई भी ऐसी घटना उसके सामने आती है, तो कलम चलने लगती है। इस मूल सृजनात्मकता को कोई बदल नहीं सकता है।
प्र- पूंजीवादिता के इस युग में जब सभी प्रकाशक फायदे के लिए काम कर रहे है। तो इससे साहित्य को कितना फायदा या नुकसान हुआ है?
उ- इससे लेखकों को कम फायदा हुआ है। प्रकाशक वहीं छापते हैं जो बिकती है। फिर वह पहले अपना देखते हैं और बाद में लेखक का। यह एक तरह का व्यवसाय है। जिन लेखकों की पुस्तकें प्रकाशक छापते हैं, उनमें से अधिकतर को सरकार खरीदती है। उन्हें लाइब्रेरियों में ले जाकर ंडंप कर दिया जाता है। इससे प्रकाशक तो कमा लेता है, लेकिन लेखक का कोई फायदा नहीं होता।  लेखक को तभी फायदा होगा जब उसकी पुस्तक पाठक तक पहुंच। पढ़ी जाए। नही ंतो इस तरह पुस्तकें छापने का कोई मतलब नहीं है।
प्र- इसके लिए क्या होना चाहिए?
उ- प्रकाशित पुस्तकें पाठकों तक पहुंचे, इसके लिए जरूरी है किताबें सस्ती छपेें। काउंटर पर बिके। इसके लिए जरूरी है कि यहां भी केरल जैसा लेखकों का सहकारी प्रकाशन हो। ऐसी व्यवस्था केरल में छोड़कर कहीं और नहीं है। इसमें भी समर्पित लेखकों का होना जरूरी है। तभी इसका फायदा होगा। वैसे अपने यहां पढ़ने की प्रवृत्ति बहुत कम है। हिंदी बेल्ट में तो इसका बहुत ही अभाव दिखता है। यहां के लोग पैसा बटोरने और राजनीति में ज्यादा ध्यान देते हैं। यह बेल्ट विकृति राजनीति से ग्रस्त हो गया है। यहां पढ़ने की परिपाटी नहीं है। लोग पढ़ने पर बहुत कम खर्च करते हैं। पश्चिम बंगाल में लोग सबसे ज्यादा पढ़ते हैं। वहां लगभग हर घर में आप लाइब्रेरी देख सकते हैं। इससे हमें सीख लेनी चाहिए। हमें रूस से भी सीखना चाहिए। वहां लोग अपने एक-एक खाली मिनट पढ़ने में इस्तेमाल करते हैं।
प्र- आपकी आने वाली पुस्तक कौन सी है?
उ- संस्मरण, अज्ञेय के पत्रों का संकलन, आलोचना आने वाली है।


पुरस्कार
उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का हिंदी गौरव सम्मान 2007
उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का साहित्य भूषण सम्मान 2000
भारत मित्र संगठन मास्को, रूस का पूश्किन सम्मान 2003
दस्तावेज पत्रिका को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा 1988 और 1995 का सरस्वती सम्मान
उत्तर प्रदेश सरकार का शिक्षक श्री सम्मान 2008
अनेक पुस्तकें हिंदी संस्थान उत्तर प्रदेश द्वारा पुरस्कृत।


गोरखपुर से प्रकाशित दस्तावेज त्रैमासिक पत्रिका का 1978 से संपादन।
 अब तक प्रकाशित पुस्तकें
11 शोध एवं आलोचना ग्रंथ
16 पुस्तकों का संपादन
2 यात्रा संस्मरण
1 लेखकों के संस्मरण
1 साक्षात्कार

शब्द के लिए बुरा वक्त
बहुत बुरा वक्त है यह शब्द के लिए
मैं अपने लाल-लाल शब्दों के साथ
पहुंचना चाहता हूं धमनियों के रक्त तक
मैं अपने उजले-उजले शब्दों के साथ
पहुंचना चाहता हूं स्तनों के दूध तक
रास्ते में मिलते हैं बटमार
जो शब्दों को कर देते हैं
निष्पंद और बेकार
बहुत बुरा वक्त है यह शब्द के लिए
मैं चाहता हूं
कि जब मैं कहूं आग
जो जलने लगे शहर
जब मैं कहूं प्यार
तो बच्चे सटा दें अपने नर्म-नर्म गाल
मेरे होंठों से
कैसे संभव होगा यह
मैं नहीं जानता
मगर मेरे कवि मित्रों
सोचो इस पर
कि कैसे संभव होगा यह

यह कविता आखर अनंत कविता संग्रह से है।

2 टिप्‍पणियां:

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

acchhi jaankari di. aur bahut se aise prashn poochhe gaye jo ham sab ke liye prateeksha rat the aur jawab mile.

Dilip ने कहा…

thanks for compliment.

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Indian journalist, working in Amar Ujala, Gorakhpur