मंगलवार, 3 जनवरी 2017

एक रिकार्ड सीता की धरती के नाम

आज पूरे देश के लिए पानी के लिए मारामारी की स्थिति है। गर्मियों में समस्या इतनी गहरा जाती हैै कि लोग प्यास से दम तोड. देते हैं। महाराष्ट्र के लातूर जिले में तो पिछली गर्मियों में पानी का संकट इतना गंभीर हो गया था कि इसके लिए पानी रेल चलानी पड़ी थी। इसके जरिए वहां पानी पहुंचाया गया। इस तरह की स्थिति के बाद भी लोग चेत नहीं रहे हैं। ऐसा संकट नहीं आए, यह काम बिहार के सीतामढ़ी जिले के लोगों ने किया है। यहां वाटर रिचार्ज को लेकर लोग इस कदर जागरूक हैं कि देश को राह दिखा रहे हैं। लोगों के लिए एक प्रेरणा की तरह हैं।
चार युगों में से एक सतयुग, जिसमें भगवान राम ने जन्म लिया था। माता सीता ने जन्म लिया था। उस समय बारिश नहीं होने के चलते राजा जनक के राज्य में त्राहि-त्राहि मच गई थी। भीषण अकाल पड़ने से जनता तबाह थी। भूखी मर रही थी। ऐसे में राजा जनक ने एक ऋषि के कहने पर महायज्ञ शुरू किया। साथ ही उन्होंने सोने के हल से खेत की जुताई शुरू की तो उस खेत में हल एक घड़े से टकराया। उसमें से माता सीता निकलीं। रामायण की यह कथा सभी जानते हैं। और पानी लोगों की जिंदगी के लिए कितना महत्वपूर्ण है, यह भी मानते हैं। लेकिन उसे बचाने के लिए कोई प्रयासरत नहीं है। लेकिन सीतामढी यानी माता सीता की जन्मस्थली के लोग इसकी कीमत अच्छी तरह से समझते हैं। तभी तो इस जिले में जगह-जगह भूगर्भ जल के रिचार्ज की व्यवस्था है। यहां एक बूंद पानी लोग जाया नहीं होने देना चाहते हैं। पानी को लेकर लोग इतने जागरूक हैं कि इसे लिम्का बुक आॅफ रिकार्ड में दर्ज किया गया है।
पहले सीतामढी में यह स्थिति थी कि यहां गर्मियों मेें लोग पानी के लिए तरसते थे। जल स्रोत सूख जाते थे। आसपास के जिलों का भी हाल कुछ ऐसा ही था। जो हैंडपंप 50 फीट पर पानी देते थे, उनका जल स्तर इतना गिर गया कि 200 फीट तक बोर करना पड़ रहा था। इस समस्या को यहां के लोगों ने समझा और पानी बचाने की मुहिम में कंधा से कंधा मिलाकर चल पड़े। एक के साथ एक होते कारवां बन गया। यहां का हर एक इंसान बच्चा हो या जवान पानी बचाने की कवायद में लग गया। यही कारण है कि आज सीतामढ़ी में जगहज-जगह वाटर रिचार्ज की व्यवस्था देखी जा सकती है। घर बनवाते समय भी बहुत से लोग वाटर रिचार्ज के लिए एक अलग से टैंक जरूर बनवाते हैं। जिले के लोगों ने जल संरक्षण के लिए 1 दिन में 2168 वाटर रिचार्ज टैक का निर्माण कर लिम्का बुक आॅफ रिकार्ड में नाम दर्ज करा लिया। इसकी पहल पृथ्वी दिवस के एक दिन यानी 21 अप्रैल 2016 को की गई। एक दिन में इसका निर्माण होने के कारण इसे रिकार्ड में शामिल किया गया। यह निश्चित ही बिहार ही नहीं पूरे देश के लिए गौरव की बात है।
इस तरह हुई शुरूआत
जिले में 21 अप्रैल 2016 को जिला जल एवं स्वच्छता समिति ने यूनिसेफ के सहयोग से इसका निर्माण किया। इसें न केवल सरकारी स्कूल वरन मदरसे व निजी स्कूल, आंगनबाड़ी केंद्र, स्वास्थ्य केंद्र, थाना परिसर और प्रखंड कार्यालयों में वाटर रिचार्ज टैंक का निर्माण किया गया। इस बारे में आयुक्त का कहना है कि सही देखभाल हो तो भूजल स्तर में बढ़ोतरी होगी। जल संकट का सामना नहीं करना पड़ेगा। वैसे तो सरकारी निर्माण कार्यों की सही देखभाल नहीं होने से अक्सर कोई भी योजना दम तोड़ देती है। इसे देखते हुए डीएम ने इनकी सफाई और देखभाल की जिम्मेदारी संबंधित संस्थान के प्रमुख को दी है। साथ ही स्कूलों में दूसरे और चैथे शनिवार को स्वच्छता दिवस मनाने की घोषणा की है। इस दिन स्कूल में टैंक की सफाई के साथ-साथ बच्चों को स्वच्छता का पाठ भी पढ़ाया जाता है। टैंक से निकाले गए कचरे को गड्ढा खोदकर जमा किया जाता है। डीएम का कहना है कि जब मैं खुले में शौच से मुक्ति के लिए चलाए जा रहे अभियान के साथ जिले का दौरा कर रहा था तो पाया कि जगह-जगह पानी का जमा है। पानी बर्बाद हो रहा है। वहीं जिले के कई हिस्सों में जल संकट था। इसे देखते हुए पानी के बचाव के लिए अभियान शुरू किया गया। यह अभियान पूरे बिहार के साथ देश के लिए एक अनुकरणीय पहल है। लोगों को इससे सीख लेने की जरूरत है।
डीएम का कहना है कि देश में यह पहली बार है कि जब जल संरक्षण को लेकर इतना बड़ा प्रयास किया गया। इन टैक के माघ्यम से गंदगी के कारण फैलने वाले रोगों पर भी अंकुश लगेगा। स्कूलों से शुरू होने वाले इस पहल के कारण इसका सीधा प्रभाव बच्चों पर होगा। उनके माध्यम से जल संरक्षण और स्वच्छता का संदेश जन-जन तक पहुंचेगा। इस पह के लिए जिले के 11000 शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया गया। साथ ही 5 लाख बच्चों को भी इसके फायदों के बारे में बताया गया। एक टैंक के निर्माण की लागत 2500 से 5000 के बीच आई। उन्होंने कहा कि ग्रामीण इलाकों में पीने के पानी के रूप में 85 प्रतिशत भूजल का इस्तेमाल होता है, परंतु विगत कुछ सालों से इसमें गिरावट आई। इसी को ध्यान में रखकर भूजल स्तर को रिचार्ज करने के लिए इस पहल की शुरूआत हुई। वह बताते हैं कि इस पहल से हम एक साल में 500 पानी के ट्रेनों के बराबर लगभग 26 करोड़ लीटर जल संरक्षित कर सकेंगे।
इस तरह बनाते टैंक
भूजल-संरक्षण और वॉटर रिर्चाज के लिए जिस टैंक का निर्माण किया जाता है, उसके लिए जल स्तोत्रों के पास एक गहरा गड्ढा खोदा जाता है। उसमें नलों का प्रयोग किया हुआ जल जाता हैं और जमीन के भूजल स्तर को रिर्चाज करता है। गंदगी रोकने के लिए भी उसमें उपाय किया जाता है। इससे इनके  आसपास गंदगी नहीं होती और पानी का समुचित प्रबंधन होता है।
स्वच्छता अभियान में भी पीछे नहीं
सीतामढ़ी स्वच्छता अभियान में भी पीछे नहीं है। यहां की चार पंचायतों को खुले में शौच से मुक्त किया गया है। यहां की सिरोली, मरपा, हरिहरपुर, नानपुर दक्षिणी पंचायत को यूनिसेफ और जिला प्रशासन के सहयोग से यह उपलब्धि हासिल हुई है। इन पंचायतों में जगह-जगह शौचालय बनवाए गए है, ताकि लोगों को खुले में शौच जाने के लिए मजबूर न होना पड़े। साथ ही इसके लिए लोगों को जागरूक भी किया गया है।

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Indian journalist, working in Amar Ujala, Gorakhpur