<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-7525434177690299792</id><updated>2012-05-11T11:20:48.359-07:00</updated><title type='text'>Apna jagat</title><subtitle type='html'>share our feelings</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://apnajagat.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnajagat.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Dilip</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17422124411163277795</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-7Ms04kWGge8/TgjX3Z4FFrI/AAAAAAAAAEM/8R0UK0uJTgE/s220/100_7031.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>16</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7525434177690299792.post-8534684342883533812</id><published>2012-04-13T01:02:00.006-07:00</published><updated>2012-04-13T01:03:08.343-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7525434177690299792-8534684342883533812?l=apnajagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnajagat.blogspot.com/feeds/8534684342883533812/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7525434177690299792&amp;postID=8534684342883533812' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/8534684342883533812'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/8534684342883533812'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnajagat.blogspot.com/2012/04/normal-0-false-false-false.html' title=''/><author><name>Dilip</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17422124411163277795</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-7Ms04kWGge8/TgjX3Z4FFrI/AAAAAAAAAEM/8R0UK0uJTgE/s220/100_7031.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7525434177690299792.post-4610114341080089487</id><published>2011-11-26T10:57:00.000-08:00</published><updated>2011-11-26T10:57:53.787-08:00</updated><title type='text'>पानी दे रहा मौत</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-dQiVUvifnbQ/TtE2nVxifOI/AAAAAAAAAFo/k74jMuBFjRM/s1600/encephalitis.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="228" src="http://4.bp.blogspot.com/-dQiVUvifnbQ/TtE2nVxifOI/AAAAAAAAAFo/k74jMuBFjRM/s320/encephalitis.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;गेरखपुर जिले के ग्रामसभा अडि़लापार में इंसेफलाइटिस से कुछ बच्चों की मौत हो गई। यहां जांच किया गया तो पता चला कि जलजनित इंसेफेलाइटिस के वायरस के कारण यह मौत हुई। महराजगंज के सिसवा में तीन लोग अज्ञात बीमारी से मर गए। डाक्टरों ने जांच की तो पता चला कि 500 घरों में से 125 घरों का पानी पीने लायक नहीं है। यह जहर से कम नहीं है। ऐसी स्थिति पूर्वांचल के लगभग हर जिलों की है। &lt;br /&gt;पूर्वांचल को पानी का कटोरा कहा जाता है। इसका कारण यहां भूगर्भ जल का स्तर काफी उंचा होना है। महज 20 फीट पर पानी आसानी से उपलब्ध हो जाता है। यही कारण है कि हर गांव और घरों में 30 से 40 फीट पर हैंडपंप गड़े है। प्यास बुझाने वाले यही हैंडपंप अब लोगों की जिंदगी ले रहे हैं। इसका कारण इनका प्रदूषित जल है। इस क्षेत्र मंें प्रदूषण का इतने खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है कि इंसेफेलाइटिस के वायरस उसमें भी समा गए हैं। ये वायरस पूरी तरह से नए हैं। यही कारण है कि इस साल इनसे ज्यादा बच्चे मर रहे हैं। &lt;br /&gt;पूर्वांचल के गोरखपुर और बस्ती मंडल के लगभग सभी जिलों में प्रदूषण के कारण उपजे इंसेफेलाइटिस के मच्छरों के लार्वा जमीन के अंदर तक पहंुच गए हैं। यही कारण है कि टीकाकरण के बाद भी इंसेफेलाइटिस के मरीजों की संख्या घटने का नाम नहीं ले रही है। अब सरकार ने इस बीमारी से निपटने के लिए एक नया अभियान शुरू किया है। यह है घरों में लगे हैंडपंपों को उखाड़ना और लोगों का इसका जल पीने रोकना है। पिछले कई महीनों से पूर्वांचल के जिलों में घरों में कम गहराई में लगे हैंडपंप उखाड़े जा रह हैं। शासन ने इस तरह का आदेश दिया है। यह गरीब लोगों के लिए समस्या बन गया है। उनके लिए सरकारी इंडिया मार्का हैंडपंप की व्यवस्था नहीं की जा रही है और उपर से उनका हैंडपंप उखाड़ा जा रहा है। बहुत विरोध के बाद ऐसे हैडपंपों पर लाल निशान लगाने के साथ उसके मालिकों से यह लिखित रूप में लिया जाने लगा कि वे इसके जल का प्रयोग पीने में नहीं करेंगे। &lt;br /&gt;जहां तक इंसेफेलाइटिस की बात है तो पहले जापान इंसेफेलाइटिस यहां मौत का कारण था। इसका इलाज खोजा गया तो इसके वायरस नए रूप मेें सामने आ गए। रूप बदल चुके ये वायरस कितने प्रकार के हैं, इस अनुमान अभी तक न तो डाक्टर लगा पाए हैं और नही वैज्ञानिक। हालांकि यह पुष्टि हो गई है कि यह जलजनित रोग भी है।&amp;nbsp; इससे सभी के कान खड़े हो गए हैं। समस्या यह है कि गरीब लोग कौन सा पानी पिएं। जलकल की सप्लाई तो शायद ही किसी गांव में है, उपर से इंडिया मार्का हैंडपंप भी पर्याप्त नहीं हैं। ऐसे में गरीब या तो पानी बिना मर जाए या वह पानी पीकर इंसेफेलाइटिस से बीमार होकर। &lt;br /&gt;इस बीमारी के लिए जिम्मेदार एंटेरोवायरस से बचाव के लिए अभी तक कोई टीका उपलब्ध नहीं है। इस बीमारी की रोकथाम ही एक तरीका है। इसके वायरस पानी के जरिए आंतों में प्रवेश करते हैं। आंत से रक्त में जाकर शरीर के विभिन्न अंगों को प्रभावित करते हैं। आंतों में वायरस की संख्या बढ़ती है तो वे शौच के जरिए बाहर आकर पानी या मिटटी में मिल जाते हैं। 2008 में सेंटर फार डिजीज कंटोल एंड प्रिेवशन अमेरिका की टीम ने बीआरडी मेडिकल कालेज में भर्ती मरीजों की जांच मंें पाया कि अधिकतर इंसेफेलाइटिस मरीजों में एंटेरोवायरस है। टीम ने कहा कि अमेरिका में भी इस रोग का प्रकोप&amp;nbsp; था, लेकिन जागरूकता और बचाव से काबू पा लिया गया। &lt;br /&gt;मेडिकल कालेज परिसर स्थित नेशनल इंस्टीटयूट आफ वायरोलाजी की गोखरपुर शाखा के निदेशक डाक्टरा मिलिन्द गोरे का कहना है कि बचाव ही एकमात्र उपाय है। और कुछ नहीं किया जा सकता। &lt;br /&gt;अब यहां के पानी की स्थिति को देखें तो पूर्वांचल में कई नदियां बहती हैं। इनमें राप्ती, रोहिन और आमी आदि हैं। ये भी प्रदूषण की मार झेल रही हैं। आमी का पानी तो पीने लायक नहीं बचा है। यह बस्ती, संतकबीर नगर होते हुए गोरखपुर में राप्ती में आकर मिलती है। इसकी जांच पिछले दिनों केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड ने की तो इसका पानी खतरनाक माना। इसमें भी इंसेफेलाइटिस के वायरस समा चुके हैं। हालत यह है कि इस नदी के आसपास बसे गांवों का जलस्स्तर भी इससे दूषित हो गया है। हैंडपंपों से काला पानी आता है। &lt;br /&gt;आमी बचाने को लेकर आंदोलन कर रहे विश्व विजय सिंह का कहना है कि आमी नदी के तीन किमी के दायरे में भूजल दूषित हो चुका है। 100 फीट तक इंडिया मार्का हैंडपंप का पानी पीने लायक नहीं है। ऐसे में लोगों के सामने मुसीबत खड़ी हो गई है। उनका कहना है कि बस्ती, संतकबीर नगर और गोरखपुर के 108 किमी के दायरे में 200 गांव नदी के प्रदूषित होने के कारण संकट में हैं। &lt;br /&gt;गोरखपुर महानगर की बात करें तो यहां शहर के बीच में रामगढ़ताल है। कहने को यह ताला है, लेकिन इसका पानी नाले की तरह हो गया है। इसके आसपास मोहददीपुर,, रूस्तमपुर आदि मुहल्ले बसे हैं। यहां जितने भी हैंडपंप लगे हैं अगर उनका पानी कुछ देर रख दिया जाए तो वह पीला पड़ जाता है। यहां तक की सप्लाई का पानी भी साफ नहीं आता है। इस स्थिति में लोग या तो घरों में एक्वागार्ड लगवाएं या पानी खरीदकर पीएं। अमीरों के लिए तो कोई बात नहीं है, लेकिन जो गरीब हैं वे इसका खर्च कैसे उठाएंगे। महानगर के ही चिलुआताल में नगर निगम अपना कूड़ा डालता है। यह ताल गारबेज डंपिंग यार्ड बन चुका है। इससे मच्छर तो पैदा हो ही रहे हैं, इंसेफंेलाटिस जैसी बीमारियां भी फैल भी रही हैं।&lt;br /&gt;आमी नदी को बचाने को लेकर आंदोलन चला रहे विश्वविजय सिंह का कहना है कि सरकार यहां पानी तो पीने लायक नहीं है। गरीब या तो पानी पीकर मरेगा या बिना पानी के। सरकार इस पर ध्यान नहीं दे रही है। वह सिर्फ इंसेफेलाइटिस से लड़ने की बात कहती है। उसके मूल समस्या की जड़ को खत्म नहीं करती। &lt;br /&gt;कैंपियरगंज में राप्ती और रोहिन नदियों का पानी प्रदूषित हो चुका है। इस क्षे़त्र के भाजपा नेता और गोरखपुर विश्वविद्वालय के पूर्व अध्यक्ष समीर कुमार सिंह का कहना है कि इस क्षेंत्र के 300 गांव प्रदूषित जल की वजह से इंसेफेलाइटिस की चपेट में हैं।&lt;br /&gt;इंसेफेलाइटिस के कहर पर हर साल हायतौबा मचती है। इसके खूनी पंजे की गूंज लखनउ से लेेकर दिल्ली तक जाती है, लेकिन होता कुछ नहीं है। यहां तक की पिछले दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंसेफेलाइटिस पर हो रहीं मौतों को संज्ञान में लेते हुए 15 दिनों के भीतर दिल्ली में विशेषज्ञों की बैठक बुलाने का आदेश राज्य सरकार को दिया। इसके साथ ही बैठक का निर्णय 30 अक्टूबर को कोर्ट मंें देने को कहा।&lt;br /&gt;इसके अलावा राज्य मानवाधिकार आयोग ने भी मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य और बीआरडी मेडिकल कालेज सहित गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर और महराजगंज के सीएमओ को नोटिस भेज इंसेफेलाइटिस के मरीजों के लिए पर्याप्त चिकित्सा व्यवस्था एवं अन्य सुविधाओं के बारे में पूछा। एक बेड पर तीन मरीजों के होने पर कड़ा रूख अपनाया। पिछले दिनों आयुर्विज्ञान पीठ अनुसंधान केंद्र मदुरई के वैज्ञानिकों की टीम यहां आई और जेई प्रभावित जिलों का दौरा कर मच्छरों के घनत्व और उनकी प्रजाति पर अध्ययन किया। इससे उनकी वृद्वि रोकने के प्रयास होंगे।&lt;br /&gt;क्यों नहीं रूक रहा मौतों का सिलसिला&lt;br /&gt;जेई से मौतों का सिलसिलसा क्यों नहींे रूक रहा इस पर गहन विचार करने की जरूरत है। इसमें कहीं न कहीं लापरवाही है। अब तो जेई कई नए वायरस मौत दें रहे हैं। इनके रोकथाम के लिए एक उपाय होता है तो दूसरा रूप धर लेते हैं। इन मौतों के लिए हम सिर्फ पूर्वांचल के पानी को ही दोषी नहीं दे सकते। इसमें इलाज में लापरवाही भी कम नहीं है। अब मेडिकल कालेज में इलाज की सुविधा ही देख लें तो 33 सालों पर्याप्त बेड तक नहीं है। हाल यह है कि बाल रोग विभाग के अधीन 226 बेड हैं। इतने बेडों पर हमेशा करीब 500 से ज्यादा मरीज रहते हैं। इनके इलाज के लिए 34 स्टाफ हैं। इन डाक्टरों से 24 घंटे इलाज संभव नहीं है। संसाधन देखें तो इस बीमारी से पीडि़त अधिकतर बच्चे मानसिक रोगी हो जाते हैं। उकने पुर्नवास के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। मेडिकल कालेज में राज्य सरकार द्वारा स्थापित मनोविकास कंेद्र अभी शुरू नहीं हुआ है। हालांकि र्मेिडकल कालेज को पीआरएम विभाग बनाने के लिए 51-51 लाख रूपये मिले हैं। जिसमंे से केवल छह लाख 28 हजार ही खर्च हुए हैं। जेई टीकाकरण का हाल भी बुरा है। मरीजों को दवाएं बाहर से लानी पड़ती हैं।&lt;br /&gt;इंसेफेलाइटिस पर सरकार की नींद नहीं टूट रही है तो जनता खुद सामने आ चुकी है। पिछले दिनों इंसेफेलाइटिस को इमरजेंसी घोषित करने के लिए पूर्वांचल के सात जिलों में ख्ूान से खत लिखने का अभियान चलाया गया। लोगों ने खून से खत लिखकर सरकार को भेजा। इंसेफेलाइटिस उन्मूलन अभियान के चीफ कैम्पेनर डाक्टर आरएन सिंह ने सभी लोगों से इस मुहिम में जुटने को कहा।&lt;br /&gt;क्या है इंसेफेलाइटिस &lt;br /&gt;गांव के बहुत से लोगों को नहीं मालूम की यह बीमारी क्या है। कोई इसे नउकी बीमारी कहता है तो कोई दिमागी बुखार। कोई इसे जापानी इंसेफेलाइटिस कहता है। वैसे यह रोग वाइरस से होती है। बीआरडी मेडिकल कालेज के बाल रोग विभाग के प्रमुख डा. केपी कुशवाहा कहते हैं कि यहां दो तरह के वाइरस पाए जाते हैं। एक जापानी इंसेफेलाइटिस वाइरस और दूसरा इंट्रो वाइरस। अधिकतर बच्चों में इंट्रो वाइरस के लक्षण पाए जा रहे हैं,&lt;br /&gt;जबकि जापानी इंट्रो वाइरस के लक्षण वाइरस कम बच्चों में पाए जा रहे हैं।&lt;br /&gt;लक्षण- सिरदर्द, बुखार, मानसिक अस्वस्थता&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7525434177690299792-4610114341080089487?l=apnajagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnajagat.blogspot.com/feeds/4610114341080089487/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7525434177690299792&amp;postID=4610114341080089487' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/4610114341080089487'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/4610114341080089487'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnajagat.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='पानी दे रहा मौत'/><author><name>Dilip</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17422124411163277795</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-7Ms04kWGge8/TgjX3Z4FFrI/AAAAAAAAAEM/8R0UK0uJTgE/s220/100_7031.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-dQiVUvifnbQ/TtE2nVxifOI/AAAAAAAAAFo/k74jMuBFjRM/s72-c/encephalitis.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7525434177690299792.post-8667963079522151672</id><published>2011-10-24T12:07:00.000-07:00</published><updated>2011-10-24T12:07:03.402-07:00</updated><title type='text'>प्रेम का दीप जलाएं</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-zEcaJtQfCC4/TqW3RA7DosI/AAAAAAAAAFU/AJXLfc4sKkI/s1600/deepavali-happy.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://3.bp.blogspot.com/-zEcaJtQfCC4/TqW3RA7DosI/AAAAAAAAAFU/AJXLfc4sKkI/s320/deepavali-happy.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;एक दीप दूर कर देता है अंधेरा&lt;br /&gt;वह जलता है दूसरों के लिए &lt;br /&gt;अपने लिए नहीं करता उजाला&lt;br /&gt;इसी तरह हमें भी जलना होगा&lt;br /&gt;दूसरों के लिए&lt;br /&gt;दीपक बनकर&lt;br /&gt;तभी इस जीवन की सार्थकता है&lt;br /&gt;तभी दुनिया से दूर होगा अंधेरा&lt;br /&gt;फैलेगा प्रेम का प्रकाश&lt;br /&gt;आओ इस दीवाली पर ऐसा ही दीप जलाएं&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7525434177690299792-8667963079522151672?l=apnajagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnajagat.blogspot.com/feeds/8667963079522151672/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7525434177690299792&amp;postID=8667963079522151672' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/8667963079522151672'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/8667963079522151672'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnajagat.blogspot.com/2011/10/blog-post_24.html' title='प्रेम का दीप जलाएं'/><author><name>Dilip</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17422124411163277795</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-7Ms04kWGge8/TgjX3Z4FFrI/AAAAAAAAAEM/8R0UK0uJTgE/s220/100_7031.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-zEcaJtQfCC4/TqW3RA7DosI/AAAAAAAAAFU/AJXLfc4sKkI/s72-c/deepavali-happy.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7525434177690299792.post-7519324895828355392</id><published>2011-10-16T12:01:00.000-07:00</published><updated>2011-10-16T12:01:54.244-07:00</updated><title type='text'>बीमारी का प्राकृतिक इलाज</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-vHuzGenfK1c/TpsqEJoj1uI/AAAAAAAAAFM/gj-VWxeMs2Q/s1600/mud.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://1.bp.blogspot.com/-vHuzGenfK1c/TpsqEJoj1uI/AAAAAAAAAFM/gj-VWxeMs2Q/s320/mud.jpg" width="221" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;गोरखपुर पूर्वांचल के इस पिछड़े इलाके में बहुत सी ऐसी&amp;nbsp; चीजें हैं जो इसे विश्व पटल पर चमका रहीं हैं। आरोग्य मंदिर उन्ही में से एक है। यहां ऐसे रोगियों का इलाज किया जाता है जो हर तरह से निराश हो चुके होते हैं। जीवन खत्म सा लगता है। यहां प्रकृति के सानिध्य में प्राकृतिक तरीके से हो रहा इलाज बरबर ही लोगों को चैंकाता है। साथ भी यह बताने के लिए काफी है कि जंगलों में रहने वाले आदिवासी अपना इलाज निश्चित ही इसी तरह से करते होंगे। गोरखपुर की इस विशिष्ट पहचान केंद्र से विदेशों के बहुत से मरीज फायदा उठा चुके हैं।&lt;br /&gt;दुनिया में बीमारों को ठीक करने के लिए इलाज की कई पद्वतियां मौजूद हैं। एलोपैथी से इलाज की सीमाएं अनंत है। इसके अपने साइड इफेक्ट हैं। इसके अलावा होम्योपैथी, आयुर्वेद, यूनानी और अन्य पद्वतियां भी है। शरीर पांच तत्वों से बना है। शरीर जब रोगग्रस्त होता है तो इसका इलाज अगर इन्ही तत्वों से किया जाए तो अभूतपूर्व फायदा होता है। इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं है। आयुर्वेद के जरिए इलाज में इसी को प्रमुख रखा गया है। &lt;br /&gt;गेरखपुर में ंआरोग्य मंदिर में इलाज इसी प्राकृतिक चिकित्सा पद्वति के आाधार पर किया जाता है। इसकी स्थापना 1940. में विटठलदास मोदी ने की थी। अंग्रेजी शासनकाल के उस दौर में इलाज की बहुत सुविधा नहीं थी। विटठलदास एक बार बीमार पड़े तो एलोपैथी से कोई लाभ नहीं हुआ। तब वह प्राकृतिक चिकित्सा से रोग मुक्त हुए। यह पद्वति उन्हें इतनी भायी कि वह इसके दीवाने से हो गए। यहीं से इनका झुकाव इस तरफ हुआ। मार्च 2000 में उनकी मौत के बाद उनके बेटे डाक्टर विमल कुमार मोदी इसे चला रहे हैं। &lt;br /&gt;करीब 70 सालों से प्राकृतिक चिकित्सा को कंद्र चल रहा है। अब तक इजारों लोग यहां से निरोग होकर जा चुके हैं। इसकी ख्याति देश-विदेश में फैली हुई है। पूरी तरह नेचल के करीब उसी तरह से बने इस अनोखे प्राकृतिक चिकित्सालय मेें 100 शैयाओं की सुविधा है। रोगियों के रहने के बने हर कमरे में पूरी तरह हवादार हैं। इलाज के लिए अलग-अलग कक्ष बने है। रोगी जब यहां आता है तो उसकी काउंसलिंग की जाती है। बातचीत में पता किया जाता है कि उसे किस तरह की बीमारी है। वैज्ञानिक उपाय भी बताए जाते हैं। इसके बाद शुरू होता है इलाज। &lt;br /&gt;यहां रोग कि हिसाब से इलाज की विधियां हैं। जैसे उपवास। इसमें उपवास कुछ इस तरह करायाजाता है कि रोगी को किसी तरह की कमजोरी महसूस नहीं होती है। दूसरा तरीका है दुग्ध कल्प और मटठा कल्प। इससे पाचन संबंधी अनेक रोग दूर हो जाते हैं। &lt;br /&gt;जलोपचार में जल, भाप, बर्फ का प्रयोग इलाज में किया जाता है। कटि स्नान, पैर का गर्म स्नान, रीढ का स्नान, गीली चादर का बंधन स्नान आदि। सूर्य और वायु स्नान। मिटटी के द्वारा भी उपचार किया जाता है। इसके अलावा मालिश और अन्य तरीके से भी यहां रोगी ठीक किये जाते हैं। हर उपचार के लिए छोटे-मोटे यंत्र या बर्तन बनाए गए हैं। &lt;br /&gt;आरोग्य मंदिर के संचालक डाक्टर विमल कुमार मोदी का कहना है कि मनुष्य जब प्रकृति संबंधी नियमों का उल्लंघन करता है तो शरीर रोगग्रस्त हो जाता हैं। आज की आधुनिक जीवनशैली में अधिकतर लोग किसी ने किसी रोग से पीडि़त हैं। प्राकृतिक चिकित्सा के जरिए हर रोग दूर करने के साथ शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाते है। शरीर को पूरी तरह से विषमुक्त करते है। वह कहते हैं कि इलाज के दौरान रोगी हमारे बताये नियमों, तरीकों का कितना पालन करता है यह महत्वपूर्ण। इसी से वह जल्दी ठीक होता है&lt;br /&gt;आरोग्य मंदिर में इलाज करा रहे मुंबई के 37 वर्षीय परेश गोयल साफटवेयर इंजीनियर है। कुछ महीने पहले उन्हें पेटमें दर्द हुआ। दवा कराई ठीक नहीं हुआ। बीमारी बढ़ती गई।एक के बाद दूसरे, तीसरे करते हुए परेश ने मुंबई के सभी नागीगिरामी डाक्टरों से इलाज करा लिया।विभिन्न प्रकार के 45 टेस्ट डाक्टरों ने करा लिया, लेकिन यह डाइगनोस्ट नहीं कर पाए कि पेट में दर्द का कारण क्या है। इसके बाद उन्हें आरोग्य मंदिर के बारे में पता चला। वह यहां इलाज कराने पहुंच गए। यहां 15 दिन लगातार इलाज के बाद उन्हें फायदा हुआ। पेट में दर्द कम हो गया। धीरे-धीरे वह ठीक हो गए। वह यहां एक महीने तक रहे। परेश का कहना है कि यहां इलाज में फायदा धीरे-धीरे होता है, लेकिन वह स्थायी होता है। प्रकृति के साथ रहकर प्रकृति द्वारा दी गई वस्तुओं से इलाज से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है। इसके इलाज में बड़े धैर्य की जरूरत होती है। &lt;br /&gt;यहां इलाज करा रहे लखनउ के सौरभ सिंघल वह शख्स हैं जिनका विश्वास एलोपैथी से लगभग टूट सा गया है। उनकी बीमारी की शुरूआत पेट में कब्ज से हुई। यह बढ़ी और दर्द तक पहुंच गई। पहले वह एलोपैथी की शरण में गए। चूंकि इनके पिता स्वास्थ विभाग में बड़े अधिकारी हैं, इसलिए बड़े से बड़े डाक्टर की देखरेख में इलाज शुरू हुआ। कई जांच के बाद डाक्टरों ने आपरेशन किया। फायदा कुछ नहीं हुआ। उपर से पेट खाना पचाने वाला एंजाइम बनना बंद हो गया। बाक्सिंग में यूपी चैपियन रहे सौरभ की परेशानी बढ़ गई। उन्हें समझ में नहीें आ रहा था कि क्या करें। इसके बाद वह योग की शरण में गए। बाबा रामदेव की आयुर्वेदिक दवाएं लीं। फायदा जीरो। जिसने जो देसी दवा बताई इलाज किया। पर कुछ नहीं हुआ। जुलाई 2009 में वह पहली बार आरोग्य मंदिर आए। उस समय उनका वजन जरूरत से ज्यादा 97 किलो था। 15-16 बार लैटिन जाना पड़ता था। यहां 108 दिन इलाज कराया। इस दौरान 85 दिन तक बिना अन्न खाए रहे। इससे इनकी बीमारी में बहुत सुधार हुआ। और शरीर में चुस्ती-फुर्ती भी आई। कंप्यूटर इंजीनियर सौरभ वापस काम पर लग गए। करीब तीन साल तक सब ठीक रहा। 2011 में फिर प्राब्ल्म बढ़ी तो 9 जुलाई को यहां आ गए। इस बार फिर इनका वनज 102 किलो हो गया था। जुलाई से वह यहां पर हैं। इनका उपचार उपवास, रसाहार, मटठा कल्प से शुरू हुआ। सौरभ बताते हैं कि यहां आकर उनकी विल पावर मजबूत होती है। वह रोजाना दो घंटे ध्यान करते हैं। सुबह से रात तक विभिन्न चरणों में इलाज होता है। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7525434177690299792-7519324895828355392?l=apnajagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnajagat.blogspot.com/feeds/7519324895828355392/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7525434177690299792&amp;postID=7519324895828355392' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/7519324895828355392'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/7519324895828355392'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnajagat.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='बीमारी का प्राकृतिक इलाज'/><author><name>Dilip</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17422124411163277795</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-7Ms04kWGge8/TgjX3Z4FFrI/AAAAAAAAAEM/8R0UK0uJTgE/s220/100_7031.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-vHuzGenfK1c/TpsqEJoj1uI/AAAAAAAAAFM/gj-VWxeMs2Q/s72-c/mud.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7525434177690299792.post-8648332822750865637</id><published>2011-06-27T01:58:00.000-07:00</published><updated>2011-06-27T01:58:19.970-07:00</updated><title type='text'>जरा याद करो कुर्बानी</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-1bx4yycFpS8/TghFupXVeoI/AAAAAAAAAEE/zg-mSKr51Es/s1600/rani.png" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/-1bx4yycFpS8/TghFupXVeoI/AAAAAAAAAEE/zg-mSKr51Es/s320/rani.png" width="281" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;देश पर जान देने वाले लोगों को हम भूल गए। भूल गए उनकी पीढि़यों को जो गुमनामी के अंधेरे में हैं। 15अगस्त और 26 जनवरी को हम कुछ शहीदों को याद कर भूल जाते हैं। यह सोचने की जहमत नहीं उठाते कि उनके परिजन कहां और किस हालत में हैं। स्वतंत्रता आंदोलन की जो हस्तियां राजनीति में आ गईं, उनकी परिवार और पीढि़यों को तो लगा याद रखे हुए हैं, लेकिन उन्हें हमारी पीढ़ी का शायद ही कोई जानता हो, जिन्होंने सही मायने में देश के लिए जान दी। हमारी नई जेरनेशन तो उनके नाम तक नहीं जानती है। उसके पास टाइम नहीं है कि वह इस बारे में सोचे। वह अपने करियर के पीछे इस कदर भाग रही है कि मां-बाप तक पीछे छूट जाते हैं। फिर उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन के शहीदों ओर उनके परिवार वाले कहां याद रहेंगे। ऐसे ही लोगों को झकझोरने और गुमनामी में खो चुके ऐसे लोगों को सामने लाने का काम किया है शिवनाथ झा ने। वरिष्ठ पत्रकार और लेखक शिवनाथ झा इस काम में कई सालों से लगे हैं। वे इसे ‘आंदोलन एक पुस्तक से’ के जरिए मुहिम का रूप दे चुके हैं। इस सीरिज की पांचवी पुस्तक ‘इंडियन मोर्टियर्स एंड देयर डिसेंडेंटस 1857-1947’ जनवरी में लोगों के सामने होगी। 400 से अधिक पेजों की यह पुस्तक वह उधम सिंह की तीसरी पीढ़ी के लोगों को सहायता दिलाने के लिए ला रहे हैं। उनका परिवार बुरी हालत में इस समय जी रहा है। इस पुस्तक में शिवानाथ झा ने मंगल पांडेय, चन्द्रशेखर आजा, सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त, चापेकर बंधु, जतीन्द्र नाथ मुखर्जी, अजीमुल्ला खा, अशफाउल्ला खां, राम प्रसाद बिस्मिल सहित 35 शहीदों को शामिल किया है।&lt;br /&gt;शिवनाथ झा से जब दिलीप जायसवाल की बात हुई तो उन्होंने बताया कि पुस्तक के जरिए उनके आंदोलन की शुरूआत शहनाई वादक बिस्मिल्ला खां को सहायता दिलाने से शुरू हुई। यह 2002 की बात है। उसी समय उन्होंने आंदोलन एक पुस्तक से की मुहिम शुरू की। तब से यह आंदोलन पड़ाव दर पड़ाव आगे बढ़ रहा है। सीरिज की पांचवीं बुक वह शहीदों की गुमनाम पीढि़यों की सहायता के लिए ला रहे हैं। उन्हें हम भूल गए। सरकार भी सुध नहीं ले रही है। जिनकी वजह से हम आजादी की खुली हवा में सांस ले रहे हैं, उन्हें सिर्फ श्रद्वांजलि देने से काम नहीं चलेगा, उनकी पीढि़यों केा गुमनामी से बाहर लाकर काम करना होगा। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;उधम सिंह- &lt;/strong&gt;इस शहीद नाम हम भला कैसे भूल सकते हैं। ये वहीं उधम सिंह हैं, जिन्होंने जलियावाला बाग हत्याकांड का बदला जनरल डायर से लिया था। उनकी तीसरी पीढ़ी आज किस हालत में है यह आप नहीं जानते होंगे। उनके प्रपौत्र जीत सिंह आजकल दिहाड़ी मजदूर का काम पंजाब के सनमगरू में करते हैं। सिर पर ईंट, गारा ढोते हैं। परिवार चलाने के लिए उन्हें यह करना पड़ता है।उनके दो बेटों में से एक जसपाल कपड़े की दुकान पर काम करते हैं। इस शहीद परिवार की सुध तो सरकार ने नहीं ली, लेकिन शिवनाथ अपनी पुस्तक उन्ही की सहायता के लिए लेकर आ रहे हैं। &lt;br /&gt;तात्याटोपे- तात्याटोपे को तो आप जानते ही होगे, जिन्होंने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में प्रमुख भूमिका निभाई। उनकी तीसरी पीढ़ी के विनायक राव टोपे अपनी पत्नी सरस्वती देवी और तीन बच्चों प्रगति, तृप्ति और आशुतोष के साथ कानपुर से 20 किमी दूर बिठूर में रहते थें। वहां वे किराना की दुकान चलाते थें। यह बात जब मीडिया में जून 2007 को आई तब तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने प्रगति और तृप्ति को रेलवे में जाॅब देने का आश्वासन दिया। इसके बाद उन्हें सहारा और सहायता मिली।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बहादुर शाह जफर-&lt;/strong&gt; मुगलों के अंतिम शासक और 1857 की क्रांति का नेतृत्व करने वाले बहाुदर शाह जफर परिवार की 56 वर्षीय सुल्ताना बेगम तो पश्चिम बंगाल के हाबड़ाके एक स्लम एरिया में रहती थीं। वहां वे चाय की दुकान चलाकर अपना परिवार पाल रही थीं। सुल्ताना बेगम पति मुहम्मद बदर बख्त की मौत 1980 के बाद सरकार ने उन्हें रहने के लिए टाली गंज में एक आवास दिया था, लेकिन लोकल गुंडों ने उन्हें परेशान करना शुरू कर दिया। उन्हें उसे फलैट से भगा दिया गया। उन्हें सहायता दिलाने का काम शिवनाथ ने किया। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;झांसी की रानी- &lt;/strong&gt;खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी। भुजाएं फड़का देेने वाला यह देशभक्ति गीत लोगों की जुबान पर तो है, लेकिन रानी लक्ष्मीबाई के परिवार को लोग भूल गए। वह अपने दत्तक पुत्र दामोदर राव को बांधे युद्व लड़ी थीं। दामोदार राव की अगली पीढ़ी को लोग जानते नहीं होंगे। वे मध्य प्रदेश के इंदौर में एक गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं। तलवार से खेलने वाली पीढि़यों के वंशज आज कंप्यूटर चला रहे हैं। दामोदार राव की प्रपौत्री गायत्री साफटवेयर इंजीनियरिंग की छात्रा हैं। उनका परिवार भी अच्छी हालत में नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बटुकंेश्वर नाथ दत&lt;/strong&gt;्त- भगत सिंह के साथ मिलकर असेंबली में बम फेंकने वाले क्रातिकारी बटुकेश्वर दत्त को आजादी केा बाद लोग भूल गए। उनकी सुध सरकार को भी नहीं रही। उन्होंने गुमनामी की अंधेरे में 1965 में दिल्ली के एम्स में दम तोड़ दिया था। उनकी बेटी बागची आज उनकी यादों को जिंदा रखे हुए हैं। भगत सिंह के साथ फांसी पर चढ़ाए गए सुखदेव के परिजन भी खामोश जिंदगी गुजार रहे हैं। आजादी में अपने तीने बेटों की आहुति दे चुके पुणे का चापेकर परिवार के लोग अब साफटवेयर इंजीनियर हंैं। उनके आसपास वाले भी नहीं जानते कि यह शहीदों का परिवार हैं। चंद्रशेखर आजाद के दूर के वंशज गुड़गांव और दिल्ली में हैं। अनुशीलन समिति से जुड़े रहे क्रांतिकारी जतीन्द्रनाथ मुखर्जी के पोते पृथ्वीचन्द्रनाथ मुखर्जी पेरिस में रह रहे  हैं। सत्येन्द्रनाथ बोस को अंग्रेजों ने तिरंगा फहराने पर फांसी दे दी थी। उनकी परिजन सागरिका घोष पश्चिम बंगाल के तुमलुक में रहती हैं। &lt;br /&gt;इस पुस्तक इसी तरह बहुत से शहीद परिवारों को खोजकर सामने लाया गया है, जो गुमनामी में जी रहे हैं।&lt;br /&gt;देश पर जान देने वाले लोगों को हम भूल गए। भूल गए उनकी पीढि़यों को जो गुमनामी के अंधेरे में डूबे हुए हैं। वक्त के साथ उन पर दुखों की मोटी परत चढ़ी हुई है। स्वतंत्रता आंदोलन की जो हस्तियां राजनीति में आ गईं, उनकी परिवार और पीढि़यों को तो लगा याद रखे हुए हैं, लेकिन उन्हें हमारी पीढ़ी का शायद ही कोई जानता हो, जिन्होंने सही मायने में दखे के लिए जान दी। हमारी नई जेरनेशन तो उनके नाम तक नहीं जानती है। गुमानामी में खो चुके ऐसे लोगों को सामने लाने का काम किया है शिवनाथ झा ने। वे सराकर एवं समाज को झकझोरने का कम कर रहे। इसके लिए वे आंदोलन एक पुस्तक से भारतीयों के सामने लाए हैं, इस सीरीज की बुक इंडियन मार्टर एंड देयर निगलेक्टेड डिसेंट में कई शहीदों के परिवार को सामने लाएं हैं, जिन्हें लोग भूल चुके हैं। युवा पीढ़ी के पास टाइम नहीं है कि वह इस बारे में सोचे। वह अपने करियर के पीछे इस कदर भाग रही है कि मां-बाप तक पीछे छूट जाते हैं। फिर उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन के शहीदों ओर उनके परिवार वाले कहां याद रहेंगे।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;उधम सिंह-&lt;/strong&gt; इस नाम को देश के बहुत से लोगों सुने तो होंगे, लेकिन नहीं जानते कि वे कौन हैं। ये वहीं उधम सिंह हैं, जिन्होंने जलियावाला बाग हत्याकांड का आदेश देने वाले कू्रर जनरल डायर को जान से मारा था। उनके पोते जीत सिंह आजकल दिहाड़ी मजदूर का काम पंजाब के सनमगरू में करते हैं। उनके दो बेटों में से एक जसपाल कपड़े की दुकान पर काम करते हैं। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;तात्याटोप&lt;/strong&gt;े को तो आप जानते ही होगे, जिन्होंने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में प्रमुख भूमिका निभाई। उनकी तीसरी पीढ़ी के विनायक राव टोपे अपनी पत्नी सरस्वती देवी और तीन बच्चों प्रगति, तृप्ति और आशुतोष के साथ कानपुर से 20 किमी दूर बिठूर में रहते हैं। वहां वे किराना की दुकान चलाते हैं। यह बात जब मीडिया में जून 2007 को आई तब तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने प्रगति और तृप्ति को रेलवे में जाॅब देने का आश्वासन दिया। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मुगलों &lt;/strong&gt;के अंतिम शासक बहाुदर शाह जफर परिवार की वुल्ताना बेगम तो पश्चिम बंगाल के हाबड़ा के एक स्लम एरिया में रहती हैं। वहां वे चाय की दुकान चलाकर अपना परिवार पाल रही हैं। सुल्ताना बेगम पति मुहम्मद बदर बख्त की मौत 1980 के बाद सरकार ने उन्हें रहने के लिए टाली गंज में एक आवास दिया था, लेकिन लोकल गुंडों ने उन्हें परेशान करना शुरू कर दिया। उन्हें उसे फलैट से भगा दिया गया। &lt;br /&gt;शिवनाथ झा बताते हैं कि शहीदों के वंशजों के खोजना इतना आसान नहीं था। वह भी अनुशीलन समिति से जुड़े रहे जतीन्द्रनाथ मुखर्जी जैसे लोगोें के वंशजों को। जतीन्द्रनाथ को अंग्रेजों ने फांसी पर चढ़ा दिया था। इनका सुराग लगाने के लिए शिवनाथ ंझा कहां-कहां नहीं गए। देश के कई हिस्सों की खाक छानी। अंत में जतीन्द्रनाथ के पोते पृथ्वीचन्द्र मुखर्जी का पता चला कि वह पेरिस में हैं। इनकी स्थिति अन्य शहीदों के वंशजों से अच्छी है।&lt;br /&gt;शिवनाथ बताते हैं कि शहीदों पर लोग लंबे-लंबे भाषण तो बहुत देते हैं, उनके वंशजों को उचित सम्मान देने की बात होती है, लेकिन जब उनके लिए कुछ करने की बात आती है तो सभी पीछे हट जाते हैं। सरकार भी इस पर ध्यान नहीं देती है। असेंबली बम कांड में भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव शामिल थे। तीनों क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने फांसी पर चढ़ा दिया था। पार्लियामेंट में भगत सिंह की तस्वीर तो लगी है, लेकिन राजगुरू और सुखदेव का नहीं। इन दोनों शहीदों को सरकार याद तक नहीं करती। जब उनके साथ यह किया जा रहा है तो उनके वंशजों की सरकार कहां तक सुध लेगी समझा जा सकता है। शिवनाथ बताते हैं कि उधम सिंह के वंशजों जीत सिंह और अन्य की सहायत के लिए वह अपनी नई पुस्तक ला रहे हैं। इस पुस्तक से जो भी कमाई होगी वह उनके वंशजों को दी जाएगी। इस आंदोलन को लेकर लोग बात तो बहुत करते हैं। इसकी तारीफ भी करते हैं, लेकिन जब सहायता की बात आती है तो मुश्किल से कोई सामने आता है। इसी कारण इस बुक को पब्लिश करने मेें आर्थिक दिक्कतों का सामना पड़ रहा है। वह बताते हैं कि एक बुक की कीमत 2100 रूपये है। लोग इसे खरीद कर शहीद परिवार की मदद कर सकते हैं।&lt;br /&gt;जानें शिवनाथ झा को&lt;br /&gt;पटना यूनिवर्सिटी से पीजी किए वरिष्ठ पत्रकार और लेखक शिवनाथ झा इस समय गाजियाबाद में रहते हैं। वह मूलतः बिहार के दरभंगा जिले में मैथिली ब्राहमण परिवार में 10 जनवरी 1959 को जन्मे शिवनाथ का बचपन परेशानियों में गुजरा। उन्होंने अखबार बेचकर अपनी पढ़ाई की। एमजे अकबर जैसे पत्रकारों के साथ काम कर चुके शिवनाथ कभी भी अपने पुराने दिन को नहीं भूलते। उनकी वाइफ नीना झा एजूकेशन से जुड़ी होने के बाद भी पति के इस आंदोलन में पूरी तरह से जुड़ी हुई हैं। वह उन्हें हर तरह की सहायता देती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7525434177690299792-8648332822750865637?l=apnajagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnajagat.blogspot.com/feeds/8648332822750865637/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7525434177690299792&amp;postID=8648332822750865637' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/8648332822750865637'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/8648332822750865637'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnajagat.blogspot.com/2011/06/blog-post_27.html' title='जरा याद करो कुर्बानी'/><author><name>Dilip</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17422124411163277795</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-7Ms04kWGge8/TgjX3Z4FFrI/AAAAAAAAAEM/8R0UK0uJTgE/s220/100_7031.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-1bx4yycFpS8/TghFupXVeoI/AAAAAAAAAEE/zg-mSKr51Es/s72-c/rani.png' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7525434177690299792.post-3707818465048413890</id><published>2011-06-26T12:26:00.000-07:00</published><updated>2011-06-26T12:26:11.851-07:00</updated><title type='text'>इस जुनून को सलाम</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-mp8j0nuPLIM/TgeHqVA3JaI/AAAAAAAAAD8/fs8E1rWsuJw/s1600/IMG_2614.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://4.bp.blogspot.com/-mp8j0nuPLIM/TgeHqVA3JaI/AAAAAAAAAD8/fs8E1rWsuJw/s320/IMG_2614.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;दिल में देशभक्ति और शहीदों के लिए कुछ करने का जज्बा हो तो इंसान को घर-परिवार नहीं बांध सकता। वह सबकुछ छोड़ इसी में जी-जान से जुट जाता है। अपना जीवन देशसेवा के लिए अर्पित कर देता है। देश के लिए ऐसे ही जुनून से जुटने वाले एक शख्स हैं हीरालाल यादव। वैसे तो वे उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के कौड़ीराम के निवासी हैं, लेकिन पूरा परिवार मुंबई में रहता है। वैसे उन्हंें एक क्षे़त्र के दायरे में नहीं बांधा जा सकता। क्योंकि वह पूरे देश के हैं। हीरालाल पूर्वांचल की माटी के वह हीरा हैं, जो अपनी चमक पूरे देश में फैला रहे हैं। संघर्षों के बल पर मुकाम हासिल करने वाले इस शख्स ने अब अपना पूरा जीवन देश की हिफाजत में शहीद हुए लोगों को समर्पित कर दिया है। ये देशभर में शहीदों के घर जाते हैं और उनके दुःखों को साझा करते हैं। 26-11 की आतंकी घटना में शहीद एनएसजी कमांडो संदीप उन्नीकृष्णन के घर भी ये पहुंचे। उनके पिता से मिले तो वे काफी प्रभावित हुए। दोनों ने इंडिया गेट से गेटवे आफ इंडिया तक साइकिल यात्रा भी की। इस यात्रा के दौरान वह जिन शहरों से गुजरे, वहां लोगों ने शहीद पिता के लिए पलक पांवड़े बिछा दिए। लोग पैर छूते थे। ऐसा नजारा देख उन्नीकृष्णन के पिता को यह अहसास हुआ कि उन्होंने बेटा खोया नहीं है। हीरालाल इस तरह की अब तक 35 यात्राएं कर चुके हैं। शहीदों और देशप्रेम के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए दर्जनों जगह अपनी कविताओं, शहीदों के पत्रों आदि की प्रदर्शनी लगा चुके हैं। &lt;br /&gt;हीरालाल यादव के संघर्षों की एक लंबी दास्तां है। 1980-81 में गोरखपुर यूनिवर्सिटी से एमए करने के बाद वह नौकरी की तलाश में उधार रूपये लेकर मुंबई गए। यहां फल बेचना शुरू किया। एक मिल में 5 रूपये रोजाना पर काम भी किया। इसी दौरान उन्हें लोकल ट्रेन में एक 17 साल का लड़का मिला। वह ठीक से बोल नहीं पाता था। वह पीलीभीत का रहने वाला था। वह पांच माह के प्रयास के बाद उन्होंने उसे उसके घर पहुंचाया। तब उन्हें लगा कि वह दुनिया का कोई भी कार्य कर सकते हैं। &lt;br /&gt;1997 में आजादी की स्वर्ण जयंती वर्ष में सबसे पहले मुंबई से शहीद भगत सिंह के गांव साइकिल यात्रा की। यह यात्रा 82 दिन की थी। यह मदर टेरेसा को भी समर्पित रहा। इस यात्रा के दौरान वह बाघा बार्डर, जम्मू, जलियावालाबाग आदि जगहों पर गए। लोगों को देशभक्ति और शहीदों के बारे में बताया। &lt;br /&gt;इस सफलता के बाद 1998 में उन्होंने नशा निशेध संकल्प यात्रा शुरू किया। इसकी यात्रा की प्रेरणा उन्हें खुद से मिली। वह बताते हैं कि बहुत सिगरेट, बीड़ी पीते थे। एक दिन उनका छोटा बेटा जो करीब चार साल का था, वह भी मुंह में बीड़ी लगाए&amp;nbsp; था। यह देख वह सकते में आ गए। इसी के साथ उन्होंने नशा छोड़ दिया और इसके प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए चल पड़े। 103 दिन की यात्रा में वह देश के चार महानगरों मुंबई, कोलकाता, दिल्ली और चेन्नई गए। &lt;br /&gt;1999 में कारगिल युद्व में शहीद सैनिकों को श्रद्वांजलि देने के लिए सलाम सैनिक यात्रा शुरू की। 42 दिन तक चली इस यात्रा को बहुत सफलता मिली। यात्रा के दौरान वह कारगिल शहीद के कई परिवारों से मिले। इसमें राजस्थान के दो शहीदों को याद करते हुए वह बताते हैं कि जयपुर के कैप्टन अमित भारद्वाज अपने खानदान के पहले व्यक्ति थे जो सेना में गए और देश के लिए शहीद हो गए। उनका शव शहीद होने के 56वें दिन घर पहुंचा। कुछ इसी तरह शहीद स्क्वायडन लीडर अजय आहूजा की कहानी है। वह कोटा राजस्थान के निवासी थे। &lt;br /&gt;चैथी 12 दिन की छोटी यात्रा बाबा आम्टे के लिए निकाली। पांचवीं अन्ना हजारे के लिए निकाली।&amp;nbsp; छठवीं यात्रा के दौरान वह थाइलैंड, वियतनाम, कंबोडिया और लाओेस तक गए। युद्वबंदियों के लिए भी वह यात्रा निकाल चुके हैं। वह कहते हैं कि 71 के भारत-पाक युद्व में भारत को तो विजय मिल गई, लेकिन बहुत से युदबंदियों को रिहा नहीं कराया जा सका। वह आज भी पाकिस्तान की जेलों में बंद हैं। कई तो वहीं मर गए। 2006 में इनके लिए निकाली यात्रा में वह युद्वबंदियों के 10-12 परिवारों से मिले। इस यात्रा के दौरान वह मुंबई, अंडमान निकोबार, कोलकाता, रांची आदि जगहों पर गए।&lt;br /&gt;इसी जुनून में 24 मई 2010 को हीरालाल 26-11 को मुंबई में आतंकियों से लोहा लेते हुए ताज होटल में शहीद होने वाले एनएसजी कमांडो संदीप उन्नीकृष्णन घर बंगलुरु पहुंचे। संदीप के पिता ने अपनी पीड़ा हीरालाल से कही। हीरालाल ने बताया कि जब संदीप के पिता को उन्होंने अपने मिशन के बारे में बताया तो उन्होंने मेहमान के रूप में घर में ही रहने को कहा। उन्होंने वहां संदीप के नाम का एक पीपल का पौधा भी लगाया। जब वह उनके घर से निकलने लगे तो 10 किमी साइकिल चलाकर उन्हें सड़़़क तक छोड़ने आए। तभी उन्होंने लंबी साइकिल यात्रा की इच्छा जताई। प्रस्ताव मिलने पर उन्होंने 26 अक्टूबर से 26 नवम्बर 2010 को इंडिया गेट से एक साथ साइकिल यात्रा शुरू की। दोनों एनएसजी के मुख्यालय से पलवल, आगरा होते हुए पूना पहुंचे। उसके बाद गेटवे आफ इंडिया के पास ताज होटल गए। जिस कमरे में संदीप को गोली लगी थी। वहां पर उन्होंने दिनभर उसी कमरे में रहकर उपवास भी रखा। इस यात्रा में उन्हें बहुत ही सफलता मिली। हर जगह लोगों का हुजूम इनका स्वागत करने के लिए पहुंच जाता था। लोग शहीद पिता के पैर छूते थे। &lt;br /&gt;हीरालाल इसके अलावा अपनी कविताओं के जरिए भी देशभक्ति के प्रति लोगों को जागरूक करते हैं। युद्वबंदियों की पीड़ा का विषय इनकी कविताओं में होता है। यह अपनी कविताओं, शहीदों पत्रों, फोटो आदि की प्रदर्शनी भी स्कूलो, यूनिवर्सिटी आदि जगहों पर लगाते हैं। अब तक वह करीब 165 जगह प्रदर्शनी लगा चुके हैं। उनके इसी काम को देखते हुए पिछले दिनों उन्हें गोरखपुर के बड़हलगंज में आयोजित सरयू महोत्सव में सरयू रत्न से सम्मानित किया गया। &lt;br /&gt;हीरालाल बताते हैं कि देश और देश के लिए शहीद हुए लोगों के लिए काम कर अच्छा लगता है। इसी काम के जुनून में वह अपना परिवार मुंबई में छोड़ चुके हैं। दो बेटे हैं। एक बेटा एचडीएफसी बैंक में काम करता है। दूसरा एनिमशन का कोर्स कर रहा है। वह अपना खर्च खुद निकालता है। पत्नी मुंबई में फल का स्टाल लगाती है। अपना पूरा जीवन देश और शहीदोें के लिए समर्पित कर चुके हीरालाल चाहते हैं कि सभी में देशभक्ति की भावना जगे। सभी देश के लिए आगे आएं। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7525434177690299792-3707818465048413890?l=apnajagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnajagat.blogspot.com/feeds/3707818465048413890/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7525434177690299792&amp;postID=3707818465048413890' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/3707818465048413890'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/3707818465048413890'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnajagat.blogspot.com/2011/06/blog-post_664.html' title='इस जुनून को सलाम'/><author><name>Dilip</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17422124411163277795</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-7Ms04kWGge8/TgjX3Z4FFrI/AAAAAAAAAEM/8R0UK0uJTgE/s220/100_7031.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-mp8j0nuPLIM/TgeHqVA3JaI/AAAAAAAAAD8/fs8E1rWsuJw/s72-c/IMG_2614.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7525434177690299792.post-2268943197258838630</id><published>2011-06-26T12:08:00.000-07:00</published><updated>2011-06-27T01:08:59.775-07:00</updated><title type='text'>एक नदी की मौत</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-_qvccKBq3OM/Tgg6Y6PEfzI/AAAAAAAAAEA/WyQfZuMT9j8/s1600/0919.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="213" src="http://2.bp.blogspot.com/-_qvccKBq3OM/Tgg6Y6PEfzI/AAAAAAAAAEA/WyQfZuMT9j8/s320/0919.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;नदियों को जीवनदायिनी कहा जाता है। इनके किनारे ही दुनिया की कई बड़ी सभ्यताएं फलीफूलीं। नदियों के पानी का उपभोग नहाने-धोने के साथ ही खेती के लिए किया जाता है। लेकिन आज जो स्थिति नदियों की है वह बहुत ही दुखदायी है। कई नदियां सूख गई, कई सूखने के कगार पर हैं। कई ऐसी हैं जो नाले में बदल गई हैं। उनका पानी जीवनदायिनी नहीं, जीवन लेने वाला बन गया है। ऐसी नदियों का पानी कोई छूता तक नहीं। आमी नदी भी उनमें से एक है। गौतम बुद्व से लेकर कबीरदास को तर कर चुकी इस नदी की कोख में आज जहर फलफूल रहा है। इसका पानी इतना जहरीला हो गया है कि छूने से बीमारी हो जाती है। इसके पानी का यही जहर लोगों में गुस्से के रूप में उस समय फूटा जब लखनउ से पर्यावरण विभाग और प्रदूषण नियंत्रण बोेर्ड के अधिकारी इसकी जांच करने पहुंचे। मामला 20 अप्रैल को हुआ। राज्य के मुख्य पर्यावरण अधिकारी डा. डीसी गुप्ता, क्षेत्रीय पर्यावरण अधिकारी कौशल किशोर एवं सहायक वैज्ञानिक डा. सुरेश चंद्र शुक्ला को कटका के ग्रामीणों ने उस समय बंधक बना लिया जब ये लोग छताई पुल पर आमी नदी के पानी का नमूना लेने जा रहे थे। ग्रामीणों ने अधिकारियों की पिटाई करने के साथ मुंह पर कालिख पोती और साड़ी पहनाया। काफी मुश्किल के बाद प्रशासन इन्हें छुड़ा पाया। ग्रामीण इस बात से गुस्सा थे कि हर बार जांच टीम आती है और आमी का पानी साफ होने के बजाय और काला हो जाता है। कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं होता। ग्रामीणों के इस गुस्से की गूंज लखनउ से लेकर दिल्ली तक पहुंची। यहां केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की टीम दो मई को जांच करने पहंुची। यह पहला मौका रहा जब पूर्वांचल में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की टीम जांच करने आई। टीम ने संतकबीरनग, गीडा और आमी के किनारे बसे गांवों का जायजा लिया। इन जगहों से पानी के नमूने लिए। कई फैक्टियों की जांच हुई। टीम आमी नदी का पानी देखकर चैंक गई। टीम के मुखिया सुपरिंटेंडेंट इंजीनियर गुरूनाम सिंह ने कहा, ये नदी तो लगती ही नहीं। सिर्फ इतनी टिप्पणी काफी है इस नदी का पूरा सच जानने के लिए। टीम अपने साथ तीन दर्जन नमूने लेकर लौट गई। इसकी रिपोर्ट कब तक आएगी और कब कार्रवाई होगी, इस बारे में कहा नहीं जा सकता। &lt;br /&gt;जीवनदायिनी रही यह नदी इतनी प्रदूषित कैसे हो गई, इसकी हकीकत जानने के लिए हमें लौटना होगा 20 साल पहले। हमें यादों के पन्ने उलटने होंगे। सिद्वार्थनगर के सिकहरा ताल से यह नदी निकली है। वहां से संतकबीरनगर और गोरखपुर होते हुए सोहगौरा के पास राप्ती नदी में मिलती है। इस दौरान यह नदी करीब 180 किलोमीटर का सफर तय करती है। 20 साल पहले यह नदी पूरी तरह साफ थी। पानी में आक्सीजन का स्तर भी मानक के अनुसार चार मिलीग्राम प्रतिलीटर था। इस नदी के दम तोड़ने की कहानी ठीक इसी के बाद से शुरू होती है। पूर्वांचल को औद्योगिक नक्शे पर उभारने के लिए बने गीडा में फैक्टियों के लगने का सिलसिला शुरू हुआ। इन उद्योगों का गंदा पानी आमी में गिरकर जाने लगा। किसी भी फैक्टी ने टीटमेंट प्लांट लगाया तो किसी ने नहीं। जिन्होंने लगाया उनका प्लांट ठीक से काम नहीं करता या फिर वे चलाते ही नहीं। इसके अलावा संतकबीरनगर में लगे कई उद्योगों का पानी भी इसे गंदा करने लगा। स्थिति यह हो गई कि आमी नदी कुछ ही सालों में मरने लगी। &lt;br /&gt;मदन मोहन मालवीय इंजीनियरिंग कालेज के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर और पर्यावरणविद डा. गांेविंद पांडेय ने इस नदी पर काफी शोध किया है। उनका कहना है कि आज आमी के पानी में घुलनशील आक्सीजन का स्तर प्रति लीटर 1.8 मिलीग्राम तक पहुंच गया है। कहीं-कहीं यह शून्य तक है। उनका कहना है कि नदी की कोख में ही मछलियां, झींगा, केकड़ा, कछुए और अन्य जलीय जीव मर चुके हैं। पानी के अंदर की वनस्पतियां जहरीली हो चुकी हैं। स्थिति इतनी खराब है कि आमी के किनारे बसे गांवों में लगे हैंडपंपों से भी पीला पानी आता है। नदी के पानी से उठती सड़ांध से इसके किनारे खड़ा होना मुश्किल है। सटे गांवों में लगे हैंडपंपों से भी पीला पानी आता है। डा. पांडेय का कहना है कि आमी में बायोकेमिकल आक्सीजन डिमांड बीओडी, केमिकल आक्सीजन डिमांड सीओडी, टर्बिडिटी, फिकल कोलीफार्म, फलोटिंग मैटर यानी तैरने वाले पदार्थ और रंग-गंध कुछ भी मानक के अनुरूप नहीं है।&lt;br /&gt;देखा जाए तो आमी की हत्या इंसान की इच्छाओं ने किया। औद्योगिकीकरण की लालसा में हम भूल गए कि सिर्फ गंगा ही हमारी माता नहीं है अन्य नदियां भी माता है। जिस तरह गंगा की सफाई के लिए केंद्र करोड़ों रूपये खर्च कर रही है, उसी तरह हर क्षेत्र में इस तरह की नदियों के लिए ऐसा होना चाहिए। आमी को बचाने के लिए न तो कोई पार्टी आई और न ही कोई संस्था। सरकार चुप्पी मारकर बैठी रही। कई शिकायतों के बाद सिर्फ जांच टीम आई और चली गई। ऐसे में आगे आए इससे जुड़े गांव के लोग, शिक्षक, डाक्टर और अन्य। आमी बचाओ मंच की स्थापना की गई। यह कोई रजिस्टर्ड संस्था नहीं, लोगों का मंच है। जब प्रदेश सरकार के अधिकारी जांच करने पहुंचे तो इसी मंच लोगों और ग्रामीणों ने उन्हें बंदी बना लिया। इसके बाद प्रशासन जागा। पुलिस ने इस मंच के अध्यक्ष विश्वविजय सिंह सहित करीब 100 ग्रामीणों पर मुकदमा दर्ज किया। इसके बाद तो कई दलोें के लोग कटका गांव पहुंचने लगे। आंदोलन होने लगा। प्रदर्शन हुए। गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ भी वहां पहुंचे और कहा कि अधिकारी आमी नदी क्या इसके किनारे लगे हैंडपंपों को पानी पीकर दिखाएं। कटका में योगी एक-एक ग्रामीण के घर गए और लोगों की पीड़ा सुनी। अब यह आंदोलन बड़ा रूप ले चुका है। आशा है यह नदी फिर जीवनदायिनी हो जाएगी। इसको नया जीवन मिलेगा। &lt;br /&gt;ये फैक्टियां गंदा कर रहीं नदी&lt;br /&gt;1- इंडियन ग्लाइकार्ड लिमिटेड गीडा, यह शराब बनाने की फैक्टी है।&lt;br /&gt;2- मेमर्स अंबे, लारी और बथवाल। ये तीनों कपड़ा बनाने की मिले हैं।&lt;br /&gt;3- रैना पेपर बोर्ड लिमिटेड संतकबीरनगर। &lt;br /&gt;4- बजाज सुगर मिल, संतकबीरनगर। &lt;br /&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;आमी की ऐतिहासिकता-&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;गौतम बुद्व- 534 ईसा पूर्व जब गौतम बुद्व ने गृहत्याग कर घर से निकले तो इसी तट पर पहुंचे। उन्होंने यहीं अपने राजसी वस्त्रों, केशों का त्याग किया। इसी नदी में स्नान किया। आमी नदी को प्रमाण कर उन्होंने कहा, हे मां शांति की खोज में यदि सफल हुआ तो तुम्हारा दर्शन करने फिर आउंगा। ज्ञान प्राप्ति के बाद वे यहां आए भी।&lt;br /&gt;गुरू गोरखनाथ- नाथ संप्रदाय के गुरू गोरखनाथ की तपोभूमि आमी नदी की तलहटी रही। यही उन्होंने अंतिम समय व्यतीत किए। &lt;br /&gt;कबीरदास- 15वीं शताब्दी में कबीरदास काशी छोड़कर मगहर आ गए। आमी नदी के तट पर उन्होंने अंतिम संास ली। यहीं पर उनका नदी किनारे परिनिर्वाण स्थल बना है। &lt;br /&gt;मुहम्मद हसन- 1857 में मुहम्मद हसन के नेतृत्व में लोगों ने अंगे्रजी सेना के साथ युद्व कर उन्हें पराजित किया था। छह माह तक गोरखपुर आजाद रहा। &lt;br /&gt;गुरूनानक देव- इस नदी के तट पर वह भी आज चुके हैं।&lt;br /&gt;-इसी नदी के तट पर संतकबीरनगर जिले में कोपिया गांव बसा है। यहां 2400 वर्ष पुराना कांच का बर्तन बनाने का कारखाना मिला है। इस पर अभी शोध जारी है। &lt;br /&gt;-आमी नदी के किनारे बसे सोहगौरा गांव में 3000 वर्ष अभिलेख मिले हैं। &lt;br /&gt;&lt;b&gt;कार्रवाई नहीं हुई तो सत्याग्रह &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;आमी की दुदर्शा देख हर किसी का दिल खौल सकता है। इसके पानी से पले-बढे लोेगोें का दिल अगर इसकी स्थिति देख न उबले ऐसा हो ही नहीं सकता। तभी तो आमी को बचाने के लिए बिना कहे लोग जुड़ने लगे। कारवां अपने आप बन गया। आमी बचाओ मंच की स्थापना लोगों ने आमी के लिए की। यह कोई एनजीओ नहीं लोगों का मंच है, जिसके बैनर तले आंदोलन चल रहा है। इस मुददे को लेकर इसके अध्यक्ष विश्वविजय सिंह से बातचीत हुई, पेश है प्रमुख अंश-&lt;br /&gt;-आमी बचाओ आंदोलन से कब और क्यों जुड़े?&lt;br /&gt;-2006 में छात्र राजनीति से निकलने के बाद कुछ सामाजिक कार्य करने की सोच हमने आमी को बचाने की मुहिम शुरू की। मेरे गांव हरिहरपुर के पास से यह नदी बहती है। इसी के पानी में पला-बढ़ा। इसकी दुदर्शा देख रहा नहीं गया और आगे आया।&lt;br /&gt;इसे लेकर पहला आंदोनल कब किया?&lt;br /&gt;-2006 में डीएम आफिस गोरखपुर पर धरना-प्रदर्शन किया गया। इसके बाद नदी में ब्लीचिंग पाउडर फिटकरी डालो अभियान चला। &lt;br /&gt;-आंदोलनों से कितनी सफलता मिली?&lt;br /&gt;- कोई सफलता नहीं मिली। प्रदूषण नियंत्रण विभाग के अधिकारी आए, जांच किए और चले गए। जो उद्योेग गंदगी फैला रहे थे, उन्हें सिर्फ नोटिस जारी की गई। इसके बाद कुछ नहीं हुआ। &lt;br /&gt;-आमी अहिंसा का संदेश देने वाले गौतम बुद्व से जुड़ी रही हैं। फिर आप लोगों ने प्रदूषण बोर्ड के अधिकारियों को बंधक बनाकर क्यों पीटा?&lt;br /&gt;- हम लोगों ने हिंसा का सहारा नहीं लिया। कई बार अधिकारी आए, कुछ नहीं किया। इस बार भी आए तो उन्हीं उद्योगपतियों की गाड़ी से घूम रहे थे और उन्हीं के यहां नाश्ता, भोजन किया। ऐसे में वे क्या कार्रवाई करते। यही देख लोग भड़क उठे। यह जनता का स्वाभाविक आक्रोश था। यहां के लोगों ने पांच सालों तक बुद्व का रास्ता अपनाया। अब स्वतंत्रता सेनानी हसन अली और बंधु सिंह का रास्ता अपना रहे हैं।&lt;br /&gt;-आगे इसे लेकर आपकी क्या योजना है? &lt;br /&gt;- केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जांच के बाद भी कार्रवाई नहीं हुई तो सत्याग्रह किया जाएगा। सरकारी लगान नहीं देंगे और सरकारी कार्यों का बहिष्कार होगा। &lt;br /&gt;आंदोलन की कहानी&lt;br /&gt;5 जून 1994 को बरवलमाफी गांव में एक कार्यक्रम में तत्कालीन कमिश्न और डीएम से पहली बार ग्रामीणों ने शिकायत की। &lt;br /&gt;पूर्व ब्लाक प्रमुख चतुर्भुजा सिंह ने हाईकोर्ट मंें एक याचिका दाखिल कर प्रदूषण पर रोक लगाने की मांग की। हाईकोर्ट ने प्रदूषणकारी कारखानों को बंद करने का निर्देश दिया। &lt;br /&gt;25 मई 2007 को मंजू सिंह ने हाईकोर्ट में एक और याचिका दाखिल की। इसमें गोरखपुर और संतकबीरनगर के प्रशासन और प्रदूषणकारी कारखानों को नोटिस जारी हुआ। &lt;br /&gt;14 जनवरी 2009 को मकर संक्रांति के दिन हजारों लोगों ने आमी में एक मुटठी फिटकरी और ब्लीचिंग पाउडर डालकर अभियान चलाया।&lt;br /&gt;प्रदूषण से प्रभावित गांवों के लोगों ने संघर्ष समितियां बनाई। आमी बचाओ मंच का गठन किया गया। धरना, कार्यक्रम शुरू हुआ।&lt;br /&gt;13 फरवरी को कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी दिग्विजय सिंह और प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा ने प्रभावित क्षेत्र का दौरा किया। &lt;br /&gt;20 अप्रैल को ग्रामीणों प्रदूषण अधिकारियों के साथ दुव्र्यवहार किया।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;ये तो हाल है&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;18 जुलाई 2009 प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने आरटीआई के तहत बताया कि आमी का पानी इंसान क्या जानवरों के पीने लायक भी नहीं है।&lt;br /&gt;8 सितंबर 2009 को बोर्ड ने माना कि आमी के पानी में आक्सीजन नहीं रह गया है।&lt;br /&gt;छह अप्रैल 2010 प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने आमी को प्रदूषित बताते हुए राज्य मुख्यालय से रैना पेपर मिल को बंद करने की संस्तुति की, लेकिन मिल को केमिकल टीटमेंट प्लांट लगाने का समय देकर मिल चलाए रखने की अनुमति दे दी गई। &lt;br /&gt;19 मई 2010 गीडा के मुख्य कार्यपालक अधिकारी ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को पत्र लिखकर गीडा क्षेत्र के उद्योगों में प्रदूषण मानकों की जांच करने को कहा।&lt;br /&gt;20 मई 2010 प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने गीडा क्षेत्र के तीन उद्योगों को प्रदूषण नियंत्रण के मानकों के अनुसार सही नहीं पाया। कोई कार्रवाई नहीं हुई।&lt;br /&gt;सात अप्रैल 2011 सिटी मजिस्टेट ने आमी क्षेत्र के कई गांवों में हैंडपंपों के पानी की जांच की। उन्होंने डीएम को भेजी रिपोर्ट में कहा कि स्थिति खतरनाक स्तर को पार कर चुकी है। इस पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7525434177690299792-2268943197258838630?l=apnajagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnajagat.blogspot.com/feeds/2268943197258838630/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7525434177690299792&amp;postID=2268943197258838630' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/2268943197258838630'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/2268943197258838630'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnajagat.blogspot.com/2011/06/blog-post_26.html' title='एक नदी की मौत'/><author><name>Dilip</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17422124411163277795</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-7Ms04kWGge8/TgjX3Z4FFrI/AAAAAAAAAEM/8R0UK0uJTgE/s220/100_7031.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-_qvccKBq3OM/Tgg6Y6PEfzI/AAAAAAAAAEA/WyQfZuMT9j8/s72-c/0919.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7525434177690299792.post-5563422626612318457</id><published>2011-06-25T02:39:00.005-07:00</published><updated>2011-06-26T11:50:07.109-07:00</updated><title type='text'>गुटबंदी का कोई इलाज नहीं</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-UmUDjYt8LLc/TgWurm88bLI/AAAAAAAAAD4/XoYI9IXToxE/s1600/100_7035.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://3.bp.blogspot.com/-UmUDjYt8LLc/TgWurm88bLI/AAAAAAAAAD4/XoYI9IXToxE/s320/100_7035.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;पूर्वांचल की माटी ने एक से एक साहित्य सृजनकार पैदा किए हैं। वे अपनी प्रतिभा से पूरे विश्व को साहित्य रस में डुबोते हैं। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को जब बिड़ला फाउंडेशन 2010 का व्यास सम्मान देने की घोषणा हुई तो यहां की प्रतिभा ने एक बार फिर लोगों को चमत्कृत कर दिया। परमानंद श्रीवास्तव के बाद वह पूर्वांचल के दूसरे साहित्यकार थे, जिन्हें इस पुरस्कार से नवाजा गया। विश्वनाथ जी को पुरस्कार मिलने की घोषणा के साथ ही उनका मोबाइल और लैंडलाइन फोन घनघनाने लगा। हर शुभचिंतक उन्हें बधाई देने लगा। पत्रकारों के फोन आने लगे, इंटरव्यू और बातचीत के लिए। मैं भी उनमें से एक था। आखिर उनसे समय मिला और पहुंच गया उनके घर। इससे पहले मैं उनसे मिला नहीं था। मन में एक सवाल था लकदक व्यक्तित्व होगा। सम्मान मिलने के बाद उसमें और भी निखार आया होगा। मन में कुछ हिचकिचाहट थी, लेकिन जब मिला तो ऐसा लगा जैसे हम पहली बार नहीं मिले हैं। बिल्कुल सरल और साधारण व्यक्तित्व, जो किसी को भी आकर्षित कर जाए। जब हम पहुंचे तो वह जिस हालत और जिस कपड़े में थे, उसी में चले आए। सामने वाले पर प्रभाव डालने के लिए कोई विशेष कपड़ा नहीं पहना। शरीर पर साधारण कुर्ता और लुंगी। बात करने का लहजा इतना सरल, साफ कि हर बात आसानी से समझ में आ जाए। पूरे इंटरव्यू के दौरान कहीं नहीं लगा कि वह हड़बड़ी में हैं। बोलने की स्पीड उतनी ही थी, जितनी मैं आसानी से लिख सकूं। कुल करीब एक घंटे के इंटरव्यू के दौरान साहित्य चर्चा के रस में डुबता-उतराता रहा। पेश है उनसे बातचीत के कुछ खास अंश। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रश्न- 2008 में प्रकाशित कविता संग्रह फिर भी कुछ रह जाएगा के लिए व्यास सम्मान मिलने पर कैसा महसूस कर रहे हैं?&lt;br /&gt;उत्तर- खुशी हो रही है। सबसे खुशी की बात यह है कि यह पुरस्कार सर्वसम्मति से मिला है। यह कविता संग्रह 12 सालों की मेहनत के बाद आई। कई विषयों पर लिखने के बाद इसे एक किताब का रूप दिया। इससे पहले 1991 में आखर अनंत कविता संग्रह आया था। अन्य चीजों के मुकाबले कविता लिखना कठिन काम है। &lt;br /&gt;प्र-क्या लेखकों के लिए पुरस्कार जरूरी होता है?&lt;br /&gt;उ- बिल्कुल होता है। इससे लेखक का उत्साह बढ़ता है। मनोबल बढ़ता है। इससे लगता है कि उसके काम को स्वीकृति मिल रही है। वैसे कोई भी लेखक पुरस्कार के लिए नहीं लिखता है। &lt;br /&gt;प्र- जिस कविता संग्रह के लिए आपको पुरस्कार मिला है, उसे किस वर्ग को फोकस किया गया है?&lt;br /&gt;उ- इसमें हमारे समय के समाज का वर्णन है। उपभोक्तावाद, स्त्री और दलित विमर्श और भारतीय मूल्य पर इसमें फोकस किया गया है। इस कविता संग्रह में उपेक्षित और संघर्षशील मनुष्य है। &lt;br /&gt;प्र- अब तक आपकी कितनी किताबें और कविता संग्रह आ चुके हैं?&lt;br /&gt;उ- अब तक पांच कविता संग्रह आ चुके हैं। पहला 1970 में चीजों को देखकर, दूसरा साथ चलते हुए 1976, तीसरा बेहतर दुनिया के लिए 1985, चैथा आखर अनंत 1991 और पांचवा जिस पर पुरस्कार मिला।&amp;nbsp; साथ चलते हुए कविता संग्रह में आपातकाल और बांग्लादेश युद्व को आप पा सकते हैं। जो इसमें लिखा गया है, वैसी ही स्थिति उस समय भारत और बांग्लादेश के नागरिकों की थी। &lt;br /&gt;प्र- लेखकों की गुटबंदी को लेकर अक्सर बात सामने आती है। देखा जाता है कि पुरस्कार देने में भी गुटबंदी हावी रहती है।&amp;nbsp; क्या आप भी किसी गुट में शामिल हैं?&lt;br /&gt;उ- गुटबंदी का कोई इलाज नहीं है। लेखक का काम लिखना होता है। उसे गुटबंदी से कोई मतलब नहीं होना चाहिए। गुटबंदी लेखक की सृजनात्मक क्षमता को नष्ट करता है। हां लेखकों में विचार की विभिन्नता होनी चाहिए। मैं किसी गुट में शामिल नहीं हूं। वैसे हम किसी को गुटबंदी से मुक्त नहीं करा सकते। यह लोकतं़त्र का एक अनिवार्य अंग है।&lt;br /&gt;प्र- कहा जाता है कि आप प्रगतिशील खेमे के बाहर के लेखक हैं, इस बारे में आप का क्या कहना है?&lt;br /&gt;उ- प्रगतिशीलता मेरी रचानाओं में आप पा सकते हैं। प्रगतिशील मुझे अपने खेमे से बाहर का मानते हैं और गैर प्रगतिशील अपने खेमे में। मैं पहले ही कह चुका हूं कि किसी खेमे में नहीं हूं। &lt;br /&gt;प्र-आप साहित्य अकादमी के हिंदी&amp;nbsp; भाषा के संयोजक हैं। आम साहित्यकारों के लिए आप क्या कर रहे हैं?&lt;br /&gt;उ- इसके लिए हम छोटे-छोटे नगरों में कार्यक्रम का आयोजन कराने की कोशिश है। ऐसे आयोजनों में प्रतिभावान लेखकों को जोेड़ा जाए। इस तरह के आयोजन के जरिए 600 लेखकों को जोड़ चुका हूं। हम हिंदी भाषा की सर्वश्रेष्ठ पुस्तकों को छापने हैं जिन्हें अन्य प्रकाशक नहींे छापते। इस पद पर मैं 2012 तक रहूंगा। कोशिश है कि जहां तक संभव हो सके आम लेखकों के लिए अच्छा काम करूं।&lt;br /&gt;प्र- नई पीढ़ी के युवा का रूझान साहित्य की तरफ कम हो रहा है। क्या इससे साहित्य का नुकसान नहीं हो रहा है?&lt;br /&gt;उ- देखिए आज की युवा पीढ़ी टेक्निकल एजूकेशन की तरफ भाग रही है। उसके उपर टेक्नोलाजी का दबाव ज्यादा है। लेकिन ऐसा नहीं है कि इससे साहित्य को नुकसान पहुंच रहा है। नये लेखक नहीं आ रहे हैं। जिसके अंदर सृजनात्मक क्षमता है, वह बाहर आती ही है, चाहेें वह कहीं भी रहे। एक लेखक के अंदर सृजनात्कता जन्म से होती। कोई भी ऐसी घटना उसके सामने आती है, तो कलम चलने लगती है। इस मूल सृजनात्मकता को कोई बदल नहीं सकता है।&lt;br /&gt;प्र- पूंजीवादिता के इस युग में जब सभी प्रकाशक फायदे के लिए काम कर रहे है। तो इससे साहित्य को कितना फायदा या नुकसान हुआ है?&lt;br /&gt;उ- इससे लेखकों को कम फायदा हुआ है। प्रकाशक वहीं छापते हैं जो बिकती है। फिर वह पहले अपना देखते हैं और बाद में लेखक का। यह एक तरह का व्यवसाय है। जिन लेखकों की पुस्तकें प्रकाशक छापते हैं, उनमें से अधिकतर को सरकार खरीदती है। उन्हें लाइब्रेरियों में ले जाकर ंडंप कर दिया जाता है। इससे प्रकाशक तो कमा लेता है, लेकिन लेखक का कोई फायदा नहीं होता।&amp;nbsp; लेखक को तभी फायदा होगा जब उसकी पुस्तक पाठक तक पहुंच। पढ़ी जाए। नही ंतो इस तरह पुस्तकें छापने का कोई मतलब नहीं है। &lt;br /&gt;प्र- इसके लिए क्या होना चाहिए? &lt;br /&gt;उ- प्रकाशित पुस्तकें पाठकों तक पहुंचे, इसके लिए जरूरी है किताबें सस्ती छपेें। काउंटर पर बिके। इसके लिए जरूरी है कि यहां भी केरल जैसा लेखकों का सहकारी प्रकाशन हो। ऐसी व्यवस्था केरल में छोड़कर कहीं और नहीं है। इसमें भी समर्पित लेखकों का होना जरूरी है। तभी इसका फायदा होगा। वैसे अपने यहां पढ़ने की प्रवृत्ति बहुत कम है। हिंदी बेल्ट में तो इसका बहुत ही अभाव दिखता है। यहां के लोग पैसा बटोरने और राजनीति में ज्यादा ध्यान देते हैं। यह बेल्ट विकृति राजनीति से ग्रस्त हो गया है। यहां पढ़ने की परिपाटी नहीं है। लोग पढ़ने पर बहुत कम खर्च करते हैं। पश्चिम बंगाल में लोग सबसे ज्यादा पढ़ते हैं। वहां लगभग हर घर में आप लाइब्रेरी देख सकते हैं। इससे हमें सीख लेनी चाहिए। हमें रूस से भी सीखना चाहिए। वहां लोग अपने एक-एक खाली मिनट पढ़ने में इस्तेमाल करते हैं। &lt;br /&gt;प्र- आपकी आने वाली पुस्तक कौन सी है?&lt;br /&gt;उ- संस्मरण, अज्ञेय के पत्रों का संकलन, आलोचना आने वाली है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुरस्कार&lt;br /&gt;उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का हिंदी गौरव सम्मान 2007&lt;br /&gt;उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का साहित्य भूषण सम्मान 2000&lt;br /&gt;भारत मित्र संगठन मास्को, रूस का पूश्किन सम्मान 2003&lt;br /&gt;दस्तावेज पत्रिका को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा 1988 और 1995 का सरस्वती सम्मान&lt;br /&gt;उत्तर प्रदेश सरकार का शिक्षक श्री सम्मान 2008&lt;br /&gt;अनेक पुस्तकें हिंदी संस्थान उत्तर प्रदेश द्वारा पुरस्कृत। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोरखपुर से प्रकाशित दस्तावेज त्रैमासिक पत्रिका का 1978 से संपादन। &lt;br /&gt;&amp;nbsp;अब तक प्रकाशित पुस्तकें&lt;br /&gt;11 शोध एवं आलोचना ग्रंथ&lt;br /&gt;16 पुस्तकों का संपादन &lt;br /&gt;2 यात्रा संस्मरण&lt;br /&gt;1 लेखकों के संस्मरण&lt;br /&gt;1 साक्षात्कार &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शब्द के लिए बुरा वक्त&lt;br /&gt;बहुत बुरा वक्त है यह शब्द के लिए&lt;br /&gt;मैं अपने लाल-लाल शब्दों के साथ&lt;br /&gt;पहुंचना चाहता हूं धमनियों के रक्त तक&lt;br /&gt;मैं अपने उजले-उजले शब्दों के साथ&lt;br /&gt;पहुंचना चाहता हूं स्तनों के दूध तक&lt;br /&gt;रास्ते में मिलते हैं बटमार&lt;br /&gt;जो शब्दों को कर देते हैं&lt;br /&gt;निष्पंद और बेकार&lt;br /&gt;बहुत बुरा वक्त है यह शब्द के लिए&lt;br /&gt;मैं चाहता हूं&lt;br /&gt;कि जब मैं कहूं आग&lt;br /&gt;जो जलने लगे शहर&lt;br /&gt;जब मैं कहूं प्यार&lt;br /&gt;तो बच्चे सटा दें अपने नर्म-नर्म गाल &lt;br /&gt;मेरे होंठों से &lt;br /&gt;कैसे संभव होगा यह &lt;br /&gt;मैं नहीं जानता&lt;br /&gt;मगर मेरे कवि मित्रों &lt;br /&gt;सोचो इस पर&lt;br /&gt;कि कैसे संभव होगा यह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कविता आखर अनंत कविता संग्रह से है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7525434177690299792-5563422626612318457?l=apnajagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnajagat.blogspot.com/feeds/5563422626612318457/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7525434177690299792&amp;postID=5563422626612318457' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/5563422626612318457'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/5563422626612318457'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnajagat.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='गुटबंदी का कोई इलाज नहीं'/><author><name>Dilip</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17422124411163277795</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-7Ms04kWGge8/TgjX3Z4FFrI/AAAAAAAAAEM/8R0UK0uJTgE/s220/100_7031.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-UmUDjYt8LLc/TgWurm88bLI/AAAAAAAAAD4/XoYI9IXToxE/s72-c/100_7035.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7525434177690299792.post-1586624272405645592</id><published>2011-02-27T00:31:00.000-08:00</published><updated>2011-03-03T00:35:01.333-08:00</updated><title type='text'>बालीवुड से कम नहीं भोजीवुड</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="https://lh4.googleusercontent.com/-pW8GN6u05Es/TW9SFITczmI/AAAAAAAAADs/qgVKRd1pvNc/s1600/dangal.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" l6="true" src="https://lh4.googleusercontent.com/-pW8GN6u05Es/TW9SFITczmI/AAAAAAAAADs/qgVKRd1pvNc/s1600/dangal.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;सीडी, फिल्मों के चैनल्स और मल्टीप्लेक्स के इस दौर में सिंगल सिनेमा स्क्रीन दम तोड़ रहे हैं। इस दौर में एकल पर्दे वाले सिनेमाघरों के लिए भोजपुरी फिल्में प्राणवायु लेकर आई हैं। जो सिनेमाहाल बंदी की कगार पर पहुंच गए थे या फिर भारी घाटे में जैसे-तैसे चल रहे थे, अब उनमें एक जान सी आ गई है। यह जान किसी और ने नहीं भोजपुरी सिनेमा ने डाली है। बात सिर्फ भोजपुरी बेल्ट की करें तो यहां के सिनेमाघर न केवल भोजपुरी फिल्मों के सहारे चल रहे हैं, बल्कि सरकार को अच्छा-खासा मनोरंजन कर भी दे रहे हैं। गोरखपुर के अधिकतर सिनेमाघरों में तो भोजपुरी फिल्में ही चल रही हैं। देवरिया के सिनेमाघर तो कभी-कभी हिंदी फिल्में लगाते हैं। इसका कारण भी है। कम खर्च में कमाई की गारंटी। जो हिंदी फिल्में उन्हें लाखों रूपये में खरीदनी पड़ती हैं, वहीं भोजपुरी फिल्म उन्हें कम पैसे में मिल जाती है। लिहाजा खर्च आसानी से निकल जाता है और दर्शक भी खूब मिलते हैं। यह सिर्फ&amp;nbsp; भोजपुरी बेल्ट के सिनेमाघरों पर लागू नहीं होती है। दिल्ली, मुंबई, पंजाब, गुजरात और पश्चिम बंगाल सहित अन्य उन जगहों के भी सिनेमाघरों में भोजपुरी फिल्में कमाई का साधन बन गई हैं। बिहार और झारखं में 372 सिनेमाहाल हैं, जिनमें से 180 में भोजपुरी फिल्में चलती रहती हैं। मुंबई के 32 सिनेमाहालों में भोजपुरी फिल्में दिखाई जाती है। बिहार-झारखंड मोशन पिक्चर एसोसिएशन के प्रवक्ता रजंन सिन्हा का कहना है कि भोजपुरी फिल्मों पर औसतन हर साल 100 करोड़ रूप्ये खर्च होता है और 125 करोड़ का व्यवसाय होता है।&lt;br /&gt;पूर्वांचल के एक सिनेमाघर के मैनेजर का कहना है कि जबसे भोजपुरी फिल्में आई हैं, दर्शकों का सूखा खत्म सा हो गया है। हमें तो लग रहा था कि सिनेमाहाल बंद करना पड़ेगा और यहां काम करने वाले कर्मचारी की रोजी-रोटी छिन जाएगी, लेकिन षुक्र है भोजपुरी फिल्मों को जिसने हमें बेरोजगार होने से बचा लिया। गोरखपुर के कई सिनेमाघरों मे तो साल में एक-दो हिंदी फिल्में लगती हैं।&lt;br /&gt;देवरिया के चार सिनेमाहालों में से दो पहले ही बंद हो चुके हैं। दो भी बंदी की कगार पर थे, लेकिन भोजपुरी फिल्मों का दौर शुरू होने के बाद से उन्हें दर्शक मिलते लगे हैं। इन सिनेमाघरों में भी अब कभी-कभार हिंदी फिल्में लगती हैं। सूरज टाकिज के मैनेजर का कहना है कि अगर भोजपुरी फिल्में न होती तो यहां कब का ताला लग लगा होता।&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="https://lh3.googleusercontent.com/-8T9UUIE5X64/TW9SO71It7I/AAAAAAAAADw/UFiR8xyvef0/s1600/ganga_kinare_mora_gaon.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" l6="true" src="https://lh3.googleusercontent.com/-8T9UUIE5X64/TW9SO71It7I/AAAAAAAAADw/UFiR8xyvef0/s1600/ganga_kinare_mora_gaon.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इतना ही नहीं भोजपुरी फिल्मों ने अपना जलवा इंटरनेशनल स्तर पर आयोजित फिल्म फेस्टिवल में भी दिखाया। 21 मिनट की डिप्लोमा भोजपुरी फिल्म उधेड़बुन को बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल 2008 के लिए चुना गया। बाद में इसे राश्टीय अवार्ड में बेस्ट शार्ट फिक्शन फिल्म का अवार्ड मिला। &lt;br /&gt;भोजपुरी फिल्मों के दर्शक&lt;br /&gt;भोजपुरी फिल्मों के दर्शक देश के साथ विदेषों में भी है। पूरे विष्व में करीब 18 करोड लोग भोजपुरी बोलते एवं समझते हैं। पूर्वांचल और बिहार के अलावा देश के जिन हिस्सों मसलन पंजाब, दिल्ली, मुंबई इत्यादि जगहों पर भोजपुरी भाषी काम धंधा आदि कारणों से रह रहे हैं, वे ये फिल्में देखते हैं। इसके अलावा मारीशस, गुयाना, वेस्टइंडीज, फिजी, नेपाल, दुबई, इंडोनेषिया, नीदरलैंड में भी भोजपुरी बोलने समझने वाले हैं। &lt;br /&gt;बिजनेस&lt;br /&gt;भोजपुरी फिल्मों का बिजनेस आजकल बूम पर है। पहले कई सालों में भोजपुरी की एक फिल्म बनती थी, लेकिन आज स्थिति बिल्कुल अलग है। अब हर सप्ताह भोजपुरी की एक फिल्म रिलीज होती है। मुंबई बेस्ड पिफल्म पब्लिशर्स अशोक भाटिया का कहना है कि औसतन अब साल में करीब 50 भोजपुरी फिल्में बन रही हैं। इन फिल्मों की अधिकरत शूटिंग भोजपुरी भाषी क्षे़त्रों में किया जा रहा है। बनारस, गोरखपुर, बलिया, कुशीनगर, जौनपुर के साथ बिहार के पटना, आरा, बेतिया और हाजीपुर में हो रही है। कई फिल्मों की शूटिंग तो विदेषों में भी हो रही है। इन फिल्मों की बढती डिमांड को देखते हुए इन जगहों पर भी स्टूडियो की आवश्यकता महसूस की जा रही है। गोरखपुर में तो फिल्म सिटी बनाने की घोषणा हो चुकी है। इसके लिए भोजपुरी फिल्म डेवलपमेंट अथारिटी का प्रस्ताव तैयार किया गया है। इसे भोजपुरी फिल्म इंडस्टी के अनुभवी लोगों ने तैयार किया है। फिल्म सिटी के निर्माण के लिए गोरखपुर आद्यौगिक विकास प्राधिकरण यानी गीडा एवं जीडीए में जमीन तलाश की जा रही है। प्रदेश के महानिदेशक पर्यटन अवनीश कुमार अवस्थी ने अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में पत्र लिखकर इसके लिए जमीन उपलब्ध कराने को कहा था। यहां भोजपुरी फिल्म सिटी के साथ फिल्म टेनिंग इंस्टीटयूट एवं विजुअल कम्युनिकेशन सेंटर की स्थापना की जाएगी। अवनीश अवस्थी ने बताया कि गोरखपुर से फिल्म सिटी के लिए जो प्रस्ताव मिला है उसे फिल्म परिषद का भेजा जा रहा है। वही इस बारे में निर्णय लेगी। बिहार के आरा में तो एक स्टूडियो बन भी रहा है। &lt;br /&gt;जहां तक भोजपुरी फिल्मों के पूरे मार्केट की बात है तो आजकल अनुमानतः इसका मार्केट करीब 125 करोड़ रूपये से ज्यादा का है। अगर इसमें भोजपुरी एलबम को भी जोड़ दिया जाए तो यह आंकडा और भी बढ जाएगा। भोजपुरी की एक फिल्म बनाने में की लागत करीब एक करोड रूप्ये है। यह बालीवुड की फिल्मों के मुकाबले कुछ भी नहीं है। इतनी कम लागत में फिल्म बनने पर वितरक से सिनेमाहालों तक पहुंचने में काफी कम कीमत आती है। बालीवुड की जो फिल्म कई लाखों रूप्ये में सिनेमाहाल के पर्दे पर उतरती है, वहीं भोजपुरी की फिल्म महज लाख, दो लाख में मिल जाती है। सिनेमाहालों में यह फिल्म लगती है तो वहां भी टिकट की कीमत 10 से 25 रूप्ये तक होती है। कम कीमत में बालीवुड के मसालों से भरी भोजपुरी फिल्म जमकर चलती है। यही कारण है भोजपुरी की फिल्मों के फलाप होने का रेषियो बहुत ही कम है।&lt;br /&gt;फिल्म निर्माता आलोक कुमार का कहना है कि भोजुपरी फिल्में लोगों को इसलिए आकर्शित कर रही हैं क्योंकि इसमें एक्षन से लेकर हर तरह का मसाला होता है। उनका कहना है कि आजकल भोजपुरी फिल्में 70-80 के दषक की बालीवुड फिल्मों का नया रूप है। उनका कहना है कि बालीवुड फिल्में जहां करोडों की लागत में बनती हैं, वहीं भोजपुरी फिल्में सिर्फ 70 से 80 लाख में बन जाती हैं। भोजपुरी के बडे स्टार रवि किषन और मनोज तिवारी 20 से 25 लाख प्रति फिल्म मेहनताना लेते हैं। उनका कहना है कि हम बजट कंटोल में रखते हैं। क्योंकि हर पूरे देष के सिनेमाघरों तक नहीं पहुंच सकते। यही कारण है कि कम समय में फिल्मों की षूटिंग भी पूरी कर लेते है। आलोक कुमार ने अपनी दो फिल्मों ‘राजा भोजपुरिया’ और ‘हो गईल बा प्यार ओढ़निया वाली से’ की षूटिंग 100 दिने में पूरी कर ली थी।&lt;br /&gt;भोजपुरी फिल्मों से करीब 70 निर्माता, निर्देषक और कलाकार जुड़े हुए हैें। इससे करीब एक लाख लोगों का रोजगार मिला हुआ है। इसमें उन कलाकारों को भी काम मिल रहा है हिंदी फिल्मों में असफल हो गए। यहां उनकी फिल्में खूब चल रही हैं। इससे बाहर रोजगार की तलाश मेें जाने वालों का सिलसिला भी रूका है। स्थिति तो यह है कि बाहर के लोगों को यहां काम मिल रहा है। बहुत से हिंदी कलाकार भोजपुरी में काम कर रहे हैं।&lt;br /&gt;अरूणेश ‘नीरन’ महामंत्री विश्व भोजपुरी मंच&lt;br /&gt;अरूणेश नीरन भोजपुरी माटी से जुडे वो शख्स हैं, जो इस भाषा की उन्नति के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। देवरिया में पहला विश्व भोजपुरी सम्मेलन कराने का श्रेय इन्हें हैं। शिक्षक, साहित्यकार नीरन जी त्रैमासिक पत्रिका समकालीन भोजपुरी साहित्य के संपादक भी हैं। भोजपुरी के विकास के लिए ये भोजपुरी भाषी कई देशों की यात्रा भी कर चुके हैं। इनका कहना है कि भोजपुरी भाषा को संविधान में जगह नहीं दी गई है, इसके बाद भी इसका विकास हो रहा है। क्योंकि यह देष नहीं स्वदेष की भाशा है। आचार, विचार, संस्कार की भाषा है। भोजपुरी में जो मिठास है, वह किसी भाषा में नहीं है। उनका कहना है कि करोडों लोग भोजपुरी बोलते हैं। बिना किसी संरक्षण, दबाव के इसका विकास हो रहा है तो यह भोजपुरी प्रेमियों की देन है। इसमें आई अपसंस्कति, फूहड गानों के बारे में इनका कहना है कि लोकप्रियता का संबंध बाजार से होता है, और जिसका बाजार से संबंध होता है, उसमें अपसंस्कति आ जाती है। ऐसा ही भोजपुरी के साथ हुआ है। लेकिन ऐसी चीजें ज्यादा दिन तक नहीं चलती हैं। एक समय के बाद यह अपने आप खत्म हो जाती है। इससे भोजपुरी भाषा को कोई नुकसान नहीं होने वाला है। उनका कहना है कि गाली भोजपुरी की विशेष पहचान है। शादी-विवाह में महिलाएं मिलकर इसे गाती हैं। ऐसा नहीं होने पर बाराती रूठ तक जाते हैंे। वास्तव में भोजपुरी भाषा से जुडी है गाली। जो फूहड़ नहीं होती। इसमें गाली का भी आदर दिया जाता है। &lt;br /&gt;गोपाल राय, भोजपुरी गायक&lt;br /&gt;भोजपुरी में गायकों की लंबी लिस्ट है। कोई अपने फूहड गानों के लिए चर्चित है तो कोई भोजपुरी माटी और संस्कति से जुडे गानों के लिए। गोपाल राय उनमें से एक हैं। इनके दर्जनों एलबम मार्केट में धूम मचा रहे हैं। भोजपुरी वासी लोगों के दिल छू रहे हैं। 2002 में इनका ‘बड़का घराना’ एलबम आया जो काफी पसंद किया गया। इनका कहना है कि ॅफूहड़ गानों ने भोजपुरी को काफी नुकसान पहुंचाया है। ऐसे लोग इसमें आ गए हैं, जिनका मकसद सिर्फ कमाना है। उन्हें न तो ठीक से भोजपुरी की समझ है और न ही वे संगीत एवं गायकी की जानकारी है। बस पैसा कमाने के लिए एलबम निकाल लेते हैं। बहुत को तो कोई नहीं मिलता तो वे खेत आदि बेचकर अपनी कंपनी बना लेते हैं और कुछ लोगों को जुटाकर एलबम बनाते हैं। इस तरह की 25 से अधिक कंपनियां खुल गई हैंे। वास्तव में ये लोग भोजपुरी केा नुकसान पहुंचा रहे हैंे। उनका मकसद सिर्फ पैसा कमाना है। गोपाल राय कहते हैं कि इन्हीं लोगों के कारण एलबम का मार्केट पहले के मुकाबले चैथाई रह गया है। &lt;br /&gt;भरत शर्मा ‘ब्यास’ गायक&lt;br /&gt;भोजपुरी गायन के एक प्रमुख स्तंभ भरत शर्मा ब्यास ऐसी शख्सियत हैं, जिनकी जितनी तारीफ की जाए कम है। जब भोजपुरी में फूहड़ता का दौर चल रहा था, एक से एक अष्लील गानों के एलबम धड़ाधड़ मार्केट में आ रहे थे, उस दौर में भी भरत साफ-सुथरे गानों के जरिए लोगों के दिल में छाए रहे। भोजपुरी गायन में इन्हें किषोर कुमार कहा जा सकता है।&lt;br /&gt;भरत जी का पहला एलबम 1989 में ‘दाग कहां से पड़ी’ आर सीरीज ने रिलीज किया। इसके निर्माता मउ के महेन्द्र पांडेय रहे। यह वह दौर था जब भोजपुरी के एलबमों की षुरूआत हुई थी। इस एलबम के गाने इतने हिट हुए कि उसी साल टी सीरिज कंपनी ने भरत को अपने एलबम में काम करने के लिए बुलाया। टी सीरिज के लिए उन्होंने राम ने बिगड़िये जेकर, राजा पीये गांजा, आइले मोरे सजनवां एलबम किया। यह इतना हिट रहा कि टी सीरिज वाले इनके दीवाने हो गए। टी सीरिज से अब तक इनके 200 एलबम आ चुके हैं। आज भी यह टी सीरिज से जुड़े हैं।&lt;br /&gt;भोजपुरी में देवी गीत का एलबम भरत को एक अलग पहचान देती है। ‘सातों बहिनिया’ देवी गीत एलबम 92-93 में आया था। आज भी यह सुना जाता है। नवरात्र में तो भोजपुरी इलाके में इसके गाने जोर-षोर से बजते हैं। भोजपुरी में पहला निर्गुन गाने का श्रेय भी भरत जी को जाता है। ‘गवना के साड़ी’ निर्गुन गाना एक अलग ही पहचान देता है।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;इसके अलावा ये कई फिल्मों में काम कर चुके हैं। ‘भाई होखे त भरत निहर’ 2008 , मेरा पिया घर आया ओ रामजी कर चुके हैं। इ कईसन प्रीत में काम कर रहे हैं, जो जल्द ही रिलीज होगी।&lt;br /&gt;सीपी भटट, हास्य अभिनेता &lt;br /&gt;भोजपुरी फिल्मों के परेष रावल, राजपाल यादव कहे जाने वाले सीपी भट्ट लगातार दो हिट फिल्में देकर दर्शकों का दिल जीत चुके हैं। आज उस मुकाम पर पहुंच चुके हैं, जहां पहुंचने की ख्वाहिष बड़े-बड़ों को होती है। वह अब तक 30 फिल्मों में काम कर चुके हैं। ‘भइया के साली ओढ़निया वाली’ 19 अगस्त को पूरे यूपी में एक साथ रिलीज हुई। पहले ही दिन इस फिल्म को जबरदस्त रिस्पांस मिला। बिहार में यह पहले ही रिलीज हो चुकी है। वहां यह फिल्म सुपरहिट रही। बालीवुड फिल्म दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे और हम आपके हैं कौन की मिश्रण यह फिल्म है। पूरी तरह से लव स्टोरी और कामेडी मसाले से भरी इस फिल्म में सीपी ने जूठन का किरदार निभाया है। फिल्म का हीरो जिस लड़की से प्यार करता है, उसके पिता उससे शादी करने को तैयार नहीं होते हैं। जूठन हीरो-हिरोइन को मिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस फिल्म में सीपी ने अपनी अदाकारी का लोहा मनवा दिया है। इस फिल्म के में पवन सिंह, शुभि शर्मा, ऋतु पांडेय, अनु शर्मा जैसे कलाकार हैं। प्रियांशु के डाइरेक्शन में बनी इस मसाला मूवी लोगों को भा रही है।&lt;br /&gt;सीपी की एक फिल्म ‘जला देब दुनिया तोहरे प्यार में’ इंटरनेषनल कान फिल्म फेस्टिवल के लिए चुनी गई। इसका निर्माण अमेरिकी कंपनी पन फिल्म ने किया था। सुधीर कदम इसके प्रोडयूसर हैं। इनकी पहली फिल्म पिया तोसे नैना लागे रही। भोजपुरी की सबसे महंगी फिल्म ‘गंगा, जमुना, सरस्वती’ में भी ये काम कर रहे हैं। करीब चार करोड़ की लागत से इसका निर्माण हो रहा है। इसके निर्माता आलोक सिंह हैं। इसमें दिनेष लाल निरहुआ, रवि किशन और मनोज तिवारी जैसे कलाकार भी हैं। ये हिंदी फिल्म ईएमआई, कूल नहीं हाट हैं हम और चालू में भी काम कर चुके हैं। कई में काम भी कर रहे हैं। इसके अलावा वह विज्ञापन में भी काम कर चुके हैं। &lt;br /&gt;गोरखुर के सहजनवां निवासी सीपी पंाच साल की उम्र से थियेटर कर रहे हैं।&amp;nbsp; 2005-06 से फिल्मों में काम कर रहे हैं। इनकी पहली फिल्म ‘पिया तोसे नैना लागे है’। 2001 में डामा में इन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुस्कार भी मिल चुका है। इनका गोरखपुर से विशेष जुड़ाव रहा है।&amp;nbsp; यहां के अंगार परिवार, युवा संगम नाट्य संस्था से ये जुड़े रहे हैं। इसके लिए काफी थियेटर किया। इनके पिता भी मशहूर रंगकर्मी रह चुके हैं। भाई भी रंगकर्मी हैं। &lt;br /&gt;भोजपुरी फिल्मों का इतिहास&lt;br /&gt;1962 में भोजपुरी का पहला सिनेमा ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़ैबो’ और 1964 में ‘बिदेसिया’ बनी। जनवरी 1961 में नज़ीर हुसेन के नेतृत्व में गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो फिल्म का निर्माण शुरू हुआ।, कुन्दन कुमार को, जो बनारस के थे, निर्देशक की जिम्मेवारी सौंपी गयी। 16 फरवरी 1962 को पटना के ऐतिहासिक शहीद स्मारक पर भोजपुरी की पहली फिल्म का मुहूर्त संपन्न हुआ। यह फिल्म अद्भुत रूप से सफल हुई। कर्णप्रिय धुनों में गूंथे ‘हे गंगा मइया तोहे पियरी चढ़ैबो..’, सोनवा के पिंजरा मंे बंद भइल हाय राम...’, ‘काहे बंसुरिया बजवल....’ जैेसे इस फिल्म के गीतों से पूर्वोत्तर भारत (आशय उत्तर भारत से है) का गांव-गांव गूंज उठा। पांच लाख की पूंजी से बनी इस फिल्म ने लगभग 75 लाख का व्यवसाय किया।‘ इसके बाद तो भोजपुरी फिल्मों की लाइन लग गई। 1961 से 1967 के बीच ‘बिदेसिया’, ‘लागी नाही छूटे राम’, ‘नइहर छूटल जाय’, ‘हमार संसार’, ‘बलमा बड़ा नादान’, ‘कब होइहें गवनवा’....‘सोलहो सिंगार करे दुलहिनिया’ बनीं। इसी दौर में ‘कमसार फिल्म्स’ के बैनर तले नज़ीर हुसेन की फिल्म ‘हमार संसार’ भी आई। एक फिल्म ‘मितवा’ प्रदर्षित हुई। 1970 में उत्तर प्रदेष और 1972 मंे बिहार में प्रदर्शित हुई। लंबे अंतराल के बाद भोजपुरी फिल्मों का रंगीन दौर शुरू हुआ। भोजपुरी फिल्म निर्माण यह दौर 1977 से 1982 तक चला। ‘दंगल’, ‘बलम परदेसिया’, ‘धरती मइया’, और ‘गंगा किनारे मोरा गांव’ जैसी फिल्मों की सफलता ने यह स्थापित किया की भोजपुरी फिल्मों का दर्शक वर्ग है। पहले दौर में ‘बिदेसिया’ जैसी हिट फिल्म के निर्माता बच्चूभाई शाह ने भोजपुरी की पहली रंगीन फिल्म ‘दंगल’ (1977) बनाई। फिल्म के पात्र और कथा लगभग वही थी। लेकिन रंग के अलावा मिस इंडिया प्रेमा नारायण भी इस फिल्म में अतिरिक्त आकर्षण थी। यह वह समय है जब भारतीय फिल्म फलक पर ‘शोले’ आकर जा चुकी थी। दंगल में ‘शोले’ की तर्ज पर घोड़े पर सवार डकैतों का पकड़ने का लंबा चेज सीन था। डाकू का नाम ‘कालिया’ था जो संवाद अदायगी में विशिष्ट शैली अपनाता है। उसकी डेन शोले के गब्बर से कम नहीं थी। ‘भेड़ों की लड़ाई’ और ‘कुश्ती’ जैसे खास स्थानीय ‘तमाशा’ की चीजें डाली गई थीं। नदीम-श्रवण की जोड़ी का ताजातरीन संगीत था। ऐसा कहा जाता है कि नदीम श्रवण का परिचय भी फिल्मी दुनिया को इसी फिल्म की बदौलत हुआ। फिल्म हिट रही। ‘दंगल’ की सफलता के बाद नज़ीर हुसेन ने ‘कमसार फिल्म्स’ के अपने बैनर तले पूना फिल्म इंस्टीट्युट से अभिनय के स्नातक राकेश पांडेय को लेकर ‘बलम परदेसिया’ नाम की फिल्म बनाई। लास्ट एंड फाउंड फारमूले की इस फिल्म ने रजत जयंती मनाई। इसमें चित्रगुप्त का संगीत का जादू सिर चढ़ कर बोला। मो. रफी की आवाज में ‘गोरकी पतरकी रे मारे गुलेलवा जियरा उड़ि-उड़ि जाये...’ से भोजपुर की गलियां गुलजार हुईं। हालांकि भोजपुरी बाजार की हालत नरम देखकर नज़ीर साहब ने बहुत कम दामों पर ही उसके राइट बेच दिये थे। &lt;br /&gt;इसके बाद आरा के रहनेवाले सिनेमा वितरक अशोक चंद जैन की फिल्म ‘धरती मइया’ ने स्वर्ण जयंती और ‘गंगा किनारे मोरा गांव’ ने हीरक जयंती मनाई। यह फिल्म पटना के अप्सरा सिनेमा हाॅल में 30 सप्ताह तक चली। इस फिल्म ने 50 लाख रुपये का व्यवसाय किया। मुबई के मशहूर सिनेमा हाॅल ‘मिनवा‘ में चार सप्ताह तक हाउसफुल चली। ऐसा दावा किया जाता है कि भोजपुरी फिल्म की यह पहली है जिसका प्रदर्शन माॅरीशस में हुआ और अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के लिए इसका चयन किया गया। अशोक चंद जैन बताते हैं कि 20 फरवरी से 28 फरवरी तक माॅरीशस में आयोजित द्वितीय विश्व भोजपुरी सम्मेलन में इसका प्रदर्शन हुआ। ‘‘नदिया के पार को आप भले ही भोजपुरी मानंे लेकिन मैंने सिर्फ उसमें ‘क्या’ की जगह ‘का’ और ‘क्यांे’ की जगह ‘काहे’ कर दिया है। अन्यथा व्याकरण के लिहाज फिल्म पूरी तरह से हिन्दी है। भोजपुरी लगती इसलिए है कि इसमें कल्चर उत्तर का है। पूर्वी यु.पी., मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार आदि की संस्कृति लगभग समान है। इसलिए वह लोगांे का अपनी फिल्म लगी। जहां तक गीतों का सवाल है ....सांची कहे तोरे आवन से हमरे अंगना में आइल बहार भौजी.....यह अवधी में भी है। यही और गानों के साथ भी है।’ &lt;br /&gt;1983 में मोहनजी प्रसाद ने ‘हमार भौजी’, 1984 में राज कटारिया की ‘भैया दूज’, 1985 में लालजी गुप्त की ‘नइहर की चुनरी’ और मुक्तिनारायण पाठक की ‘पिया के गांव’, 1986 में लक्ष्मण शाहाबादी की पत्नी रानी श्री द्वारा प्रस्तुत ‘दूल्हा गंगा पार के’, ने भोजपुरी फिल्मों का व्यवसाय बढ़ाया। भोजपुरी सिनेमा के रजत जयंती वर्ष 1987 मेें मुक्तिनारायण पाठक की फिल्म ‘पिया के प्यारी’ आई। जिसका गीत ‘अंगुरी में डंसले बिया नगिनिया हे रे सखी सैंया के बोलाइ द’ शोहरत और सफलता का कारण बना। नब्बे का दशक भोजपुरी फिल्मों के सन्नाटे का दौर रहा है। 1993 में आकाश जोगी की फिल्म ‘महुआ’ में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने भी अभिनय किया। लोगों ने इस को खारिज कर दिया। &lt;br /&gt;2000 के बाद एक बार फिर से भोजपुरी फिल्मों में उछाल आया है। इस नये उभार के अगुआ निर्माता निर्देशक मोहन जी प्रसाद माने जाते हैं। फिलहाल ‘सैंया हमार’, ‘सैंया से करि द मिलनवा हे राम’ और ‘गंगा जइसन माई हमार’ जैसी फिल्मों के जरिये वे दर्शकों को एक बार फिर से सिनेमाहाॅल में बुलाने मे सफल रहे हैं। इस दौर में बरसों बाद सुजीत, राकेश पांडे, कुणाल सिंह के बाद रवि किसन जैसा नायक भोजपुरी को मिला है। भोजपुरी फिल्मों के इस नये दौर पर स्थानीय मीडिया भी चहक रहा है। खबरों के शीर्षक गौर करने लायक हैं इस उभार का ही परिणाम है कि विश्वनाथ शाहाबादी के बेटे भी फिर से अपेक्षाकृत बड़े बजट की फिल्म लेकर आये हैं ‘गंगा जइसन पावन पिरीतिया हमार’। हाजीपुर के सुनील बूबना तो भोजपुरी में अब तक की सबसे बड़े बजट वाली फिल्म ‘सोहागन बना द सजना’ हमार लेकर आ रहे हैं। इस फिल्म का बजट एक करोड़ बताया जाता है (आम तौर पर भोजपुरी फिल्मों का औसत बजट 25-30 लाख है)। बूबना अपनी म्युजिक कंपनी भी लांच कर रहे हैं। ‘कन्या दान’ और अजय सिन्हा की फिल्म ‘ससुरा बड़ा पैसे वाला’ की सफलता ने एक बार फिर से भोजपुरी फिल्म बाजार में जोश भर दिया है। आलम यह है कि अशोक चंद जैन ने अपनी पंद्रह साल पहले घोषित फिल्म ‘गंगा के पार सैंया हमार’ को पूरा कर रिलीज कर दिया है। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7525434177690299792-1586624272405645592?l=apnajagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' 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शिकार महिला ने&lt;br /&gt;विधायक की चाकू मारकर हत्या कर दी। जिस तरह से सेक्स, बलात्कार के&lt;br /&gt;हाईप्रोफाइल मामले सामने आ रहे हैं, वह निश्चित रूप से आने वाले समाज के&lt;br /&gt;लिए ठीक नहीं है। ऐसे ही मामले फूलन देवी बनाते हैं। हथियार उठाने एवं&lt;br /&gt;कानून को हाथ में लेने को मजबूर करते हैं।&lt;br /&gt;शीलू कांड की शुरूआत मध्य प्रदेश से होती है। वहीं एक पुलिस वाला शीलू&lt;br /&gt;को जबरन उठाकर ले जाता है। शीलू के पिता जो बसपा का मेंबर था और&lt;br /&gt;उसकी विधायक पुरूषोत्तम नरेश द्विवेदी से संपर्क था, उसने इस बारे में&lt;br /&gt;विधायक से गुहार लगाई। विधायक उस पुलिस वाले से शीलू को छुड़ाकर&lt;br /&gt;अपने घर लाए। यहां उन्होंने उसको शरण दी। वह विधायक के घर काम करने&lt;br /&gt;लगी। एक-दो दिन बाद विधायक ने शीलू के साथ बलात्कार किया। शारीरिक&lt;br /&gt;शोषण का यह क्रम कई दिनों तक चला। शीलू किसी तरह विधायक की पत्नी&lt;br /&gt;की सहायता से 12 दिसंबर को उनकी राइफल लेकर भाग गई। इस पर विधायक ने&lt;br /&gt;अपने गुर्गों को उसे पकड़ने के लिए भेजा। दो दिन बाद शीलू को पकड़कर&lt;br /&gt;लाया गया। बताया जाता है कि विधायक अपने नौकर के साथ शीलू की शादी&lt;br /&gt;कराना चाहते थे। कुछ भी हो मामला बिगड़ता देख विधायक ने शीलू को&lt;br /&gt;घर से पैसे और मोबाइल चुराने के आरोप में जेल भिजवा दिया। यह&lt;br /&gt;मामला तब उछला, जब बांदा से कांग्रेस के विधायक विवेक सिंह ने मामले में&lt;br /&gt;पहल की। उन्होंने पुरूषोत्तम नरेश द्विवेदी का चेहरा बेनकाब करने में पूरा&lt;br /&gt;योगदान दिया। मामला जब मीडिया में उछला तो मायावती ने कार्रवाई करते का&lt;br /&gt;आदेश देते हुए विधायक को पार्टी से निलंबित कर दिया।&lt;br /&gt;15 जनवरी को शीलू की रिहाई कोर्ट आदेश पर हुई।&amp;nbsp; रिहा होने पर उसका&lt;br /&gt;लोगों और राजनीतिक पार्टियों जोरदार स्वागत किया। इसी के साथ शीलू&lt;br /&gt;को लेकर राजनीति चमकाने का दौर भी शुरू हो गया। सपा ने तो उसे अपनी&lt;br /&gt;फूलन देवी बता दिया। भाजपा, कांग्रेस सभी इस मामले में अपनी रोटियां&lt;br /&gt;सेंकने लगेे। रिहा होने के बाद शीलू अपने गांव शाहवाजपुर पिता के घर&lt;br /&gt;चली गई। वहां भी नेताओं का आना-जाना लगा रहा। कोई ऐसी स्थिति न&lt;br /&gt;उत्पन्न हो जाए, इसलिए मायावती ने शीलू की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह से&lt;br /&gt;टाइट कर दी। पूरे शाहवाजपुर गांव को छावनी में बदल दिया गया। शीलू&lt;br /&gt;जहां भी जाती, उसके साथ पुलिस रहती। यहां तक की उसके गांव से बाहर जाने&lt;br /&gt;पर भी एक तरह से रोक लगा दी गई। शीलू से मिलने के लिए महिला आयोग&lt;br /&gt;से लेकर कई राजनीति लोग पहुंचे। सभी उसे न्याय दिलाने की बात कह रहे&lt;br /&gt;हैं। पर सवाल यह है कि क्या शीलू को न्याय मिल सकेगा। उसके भविष्य का क्या&lt;br /&gt;होगा। दलित की बेटी प्रदेश में राज कर रही है और एक दलित की बेटी के&lt;br /&gt;साथ ही उनके ही विधायक बलात्कार करते करते हैं, क्या यह प्रदेश की&lt;br /&gt;कानून-व्यवस्था की कहानी नहीं बयां करती। फिलहाल जो भी हो शीलू को&lt;br /&gt;न्याय मिलना ही चाहिए।&lt;br /&gt;पति तो बलात्कार के काबिल नहीं&lt;br /&gt;पति पर लगे आरोप पर विधायक पुरूषोत्तम नरेश द्विवेदी की पत्नी आशा&lt;br /&gt;देवी बचाव में मीडिया के सामने आईं। लखनउ में उन्होंने कहा कि पति तो&lt;br /&gt;रेप करने के काबिल नहीं हैं। शुगर, ब्लड पे्रशर, और किडनी खराब होने&lt;br /&gt;की वजह से वह दुराचार नहीं कर सकते। उन्हें विरोधियों ने फंसाया है।&lt;br /&gt;उन्हांेने पति का मेडिकल एवं डीएनए टेस्ट कराने की बात कही। आशा देवी ने&lt;br /&gt;कहा कि न्याय नहीं मिला तो वह आत्महत्या कर लेंगी। शीलू के चरित्र पर सवाल&lt;br /&gt;उठाते हुए विधायक की पत्नी ने कहा कि वह 12 दिसंबर को उसके घर से भागी&lt;br /&gt;और 14 दिसंबर को पकड़ी गई। दो दिन वह कहां रही, इसकी जांच होनी&lt;br /&gt;चाहिए। विधायक की पत्नी ने पति के बचाव में जिस तरह के बयान दिए वह पति&lt;br /&gt;धर्म के अनुकूल है। एक बेबस लड़की शीलू को बचाने के लिए घर से भगाने&lt;br /&gt;में मदद उन्होंने ही की थी। विधायक पत्नी के बयान पर शीलू ने कहा कि वह&lt;br /&gt;ऐसा क्यों कह रही हैं मुझे नहीं पता। यह बयान अचरज भरा है।&lt;br /&gt;न्याय नहीं मिला तो उठा लूंगी बंदूक&lt;br /&gt;शीलू को लेकर राजनीति का दौर भी शुरू हो गया है। सभी दल के नेता&lt;br /&gt;उससे मिलने पहुंचने लगे। जब उसे जेल से रिहा किया गया तो उसका जमकर&lt;br /&gt;स्वागत किया गया। सपा ने शीलू को पार्टी का फूलन देवी घोषित कर दिया।&lt;br /&gt;खुद शीलू ने कहा कि अगर उसे न्याय नहीं मिला तो वह बंदूक उठा लेगी और&lt;br /&gt;अपना बदला लेगी। शीलू का यह तल्ख बयान निश्चित ही आंख खोलने वाला है।&lt;br /&gt;शीलू का न्याय से विश्वास क्यों उठा, यह सभी जानते हैं। जिस पुलिस पर&lt;br /&gt;जनता के रक्षा की जिम्मेदारी होती है, उसी ने उसके साथ जबरदस्ती की।&lt;br /&gt;विधायक के इशारे पर चोरी का केस लगा जेल भेज दिया गया। यहां तक कि&lt;br /&gt;जेलर ने भी उसके साथ न्याय नहीं किया। हालांकि इस मामले में मुख्यमंत्री&lt;br /&gt;मायावती ने पांच दोषी अफसरों को निलंबित कर दिया। इनमें मामले के&lt;br /&gt;विवेचक राधेश्याम शुक्ला, तात्कालिक कार्यवाहक थानाध्यक्ष अब्दुल जब्बार,&lt;br /&gt;सीओ अतर्रा राजेंद्र यादव, अपर पुलिस अधीक्षक बांदा लालाराम और बांदा&lt;br /&gt;के जेलर ज्ञान प्रकाश हैं। इन सभी पर कार्रवाई सीबीसीआईडी के आरोप पत्र&lt;br /&gt;पर हुई है। इसमें कहा गया है कि राधेश्याम शुक्ला और अब्दुल जब्बार ने&lt;br /&gt;विवेचना कार्य में देरी व लापरवाही, सीओ राजेंद्र यादव व अपर पुलिस&lt;br /&gt;अधीक्षक लालाराम ने शिथिल पर्यवेक्षण और लापरवाही तथा जेलर ने अपने&lt;br /&gt;अधीनस्थों की शिकायत पर ध्यान नहीं दिया। अधीनस्थों ने जेलर से बताया&lt;br /&gt;कि शीलू के साथ बलात्कार हुआ है, इसके बाद भी जेलर ने उसका मेडिकल&lt;br /&gt;नहीं कराया और न ही इसकी जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दी।&lt;br /&gt;हालांकि बांदा के एसपी पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। अब जब उपर से लेकर&lt;br /&gt;नीचे तक सभी सरकारी मशीनरी में भ्रष्ट ही भ्रष्ट बैठे हों तो न्याय की&lt;br /&gt;उम्मीद करना संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में कोई हथियार उठाकर न्याय के&lt;br /&gt;लिए विद्रोह की बात करे तो बहुत गलत नहीं होगा। हालांकि बाद में शीलू&lt;br /&gt;ने कहा कि कोर्ट से न्याय मिल रहा है, इसलिए खुश हूं। अब बागी नहीं बनना&lt;br /&gt;चाहती।&lt;br /&gt;यहां तो शीलू ही शीलू हैं&lt;br /&gt;बांदा जिले में सिर्फ एक नहीं कई शीलू निषाद हैं, जो बलात्कार की&lt;br /&gt;शिकार हुई हैं। इनकी संख्या करीब 100 है। इन्हें न्याय नहीं मिला है।&lt;br /&gt;यहां के एक वकील का कहना है कि यहां रसूखदार कई गरीब लड़कियों एवं&lt;br /&gt;महिलाओं का अपहरण कर चुके हैं। बहुत से मामलों में पुलिस बदमाशों,&lt;br /&gt;राजनीतिक एवं भूस्वामियों के दबाव में कुछ नहीं करती है। जिला मुख्यालय&lt;br /&gt;से 70 किमी दूर नदुआ गांव निवासी केला की पत्नी माया को 2005 में कुछ&lt;br /&gt;बदमाशों ने अपहरण कर लिया। केला ने नरैनी पुलिस को अपहरणकर्ताओं का&lt;br /&gt;नाम बताया, लेकिन पुलिस ने सहायता करने के बजाय उसे ही पुलिस स्टेशन से&lt;br /&gt;धक्का देकर बाहर कर दिया। जब वह अपनी पत्नी को छुड़ाने खुद उस बदमाश के&lt;br /&gt;घर गया तो केला को मारपीट कर भगा दिया गया। एक साल बाद बदमाश फिर&lt;br /&gt;आए और उसकी 14 वर्षीय बेटी मीनू को उठा ले गए। केला फिर पुलिस स्टेशन&lt;br /&gt;गया, लेकिन सुनवाई नहीं हुई। वह एसपी और डीएम से भी मिला, लेकिन&lt;br /&gt;सिर्फ आश्वासन मिला। कार्रवाई नहीं हुई। चार साल बीत गए, लेकिन केला की&lt;br /&gt;पत्नी और बेटी का पता नहीं है।&lt;br /&gt;दो माह पहले नगवा गांव निवासी दिलधन पठान की बेटी के साथ बलात्कार किया&lt;br /&gt;गया, लेकिन पुलिस ने कुछ नहीं किया। अलबत्ता एक बलात्कारी की लाश खेत में&lt;br /&gt;मिलने पर पुलिस ने उसे और उसके तीन बेटों को ही पकड़ लिया। ऐसी ही&lt;br /&gt;कहानी चितरोगाकुलपुर के नीलम, लच्छिया कोरवल की प्रियंका, कोलावल की&lt;br /&gt;संगीता और महुआ गांव की प्रिया की है।&lt;br /&gt;ये नेता अययाश&lt;br /&gt;प्रदेश की राजनीति में बहुत से ऐसे नेता रहे हैं जो इस तरह के&lt;br /&gt;आरोपों में घिरे एवं जेल गए। महराजगंज के लक्ष्मीपुर से विधायक अमर&lt;br /&gt;मणि त्रिपाठी का नाम कौन भूल सकता है। कवयित्री मधुमिता शुक्ला के साथ&lt;br /&gt;अवैध संबंध और फिर गर्भवती होने पर उसकी हत्या में अमर मणि पत्नी के&lt;br /&gt;साथ आजीवन जेल की सजा भुगत रहेे हैं। अमर मणि को सजा दिलाने में&lt;br /&gt;मधुमिता की बहन निधि ने पूरा साहस दिखाया।&lt;br /&gt;फैजाबाद से मिल्कीपुर के विधायक आनंद सेन की कहानी भी कुछ कम नहीं है।&lt;br /&gt;जब वह मंत्री थे तो शशि नामक छात्रा के साथ उनके अंतरंग संबंधों की&lt;br /&gt;चर्चा हुई। बाद में शशि की हत्या हो गई। सुल्तानपुर के सपा विधायक&lt;br /&gt;अनूप सांडा ने अपने क्षेत्र की एक महिला समरीन के प्यार में आत्महत्या की&lt;br /&gt;कोशिश की। समरीन के साथ उन्होंने खूब गुलछर्रे उड़ाए। अनूप की पत्नी&lt;br /&gt;ने इस मामले में उन्हंें बाहर निकाला।&lt;br /&gt;महराजगंज जिले के सपा विधायक श्रीपत आजाद भी सेक्स स्कैंडल एवं महिला&lt;br /&gt;उत्पीड़न मामले में फंसकर जेल की यात्रा कर चुके हैं। उन पर उस महिला को&lt;br /&gt;जलाकर मारने का आरोप है।&lt;br /&gt;राममोहन गर्ग को तो आप जानते ही होंगे। मत्स्य विभाग निगम के अध्यक्ष&lt;br /&gt;रहे गर्ग को राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त था। उन पर सीमा चैधरी नामक महिला&lt;br /&gt;ने लगातार पांच साल तक दुराचार करने का आरोप लगाया। उसने प्रेमी के साथ&lt;br /&gt;मिलकर अंतरंग क्षणों की सीडी भी तैयार कर ली थी। इसी स्कैंडल में उनकी&lt;br /&gt;लालबत्ती चली गई।&lt;br /&gt;बदायूं के बसपा विधायक योगेंद्र सागर पर बीए की छात्रा ज्योति शर्मा ने&lt;br /&gt;शारीरिक शोषण करने का आरोप लगाया। अदालत ने उनके खिलाफ गैर&lt;br /&gt;जमानती वारंट जारी किया, लेकिन उनकी गिरफतारी&amp;nbsp; नहीं हो सकी।&lt;br /&gt;मेरठ की शिक्षिका कविता चैधरी का मामला तो बहुत ही चर्चा में रहा है।&lt;br /&gt;मुलायम सिंह यादव के शासन में मंत्री रहे रालोद नेता मेराजुददीन इसमें&lt;br /&gt;फंसे। उनकी सीडी देशभर में देखी गई। उन्हें रालोद के महासचिव पद से&lt;br /&gt;इस्तीफा देना पड़ा था। इसमें तत्कालीन बेसिक शिक्षा मंत्री किरनपाल सिंह&lt;br /&gt;और मंत्री चैधरी बाबूलाल का नाम भी सामने आया था।&lt;br /&gt;बुलंदशहर के डिबाई से बसपा विधायक भगवान शर्मा उर्फ गुडडू पंडित पर&lt;br /&gt;फर्रूखाबाद की शोध छात्रा शीतल ने दुराचार का आरोप लगाया। किसी तरह वह&lt;br /&gt;इस मामले से बचे।&lt;br /&gt;नारायण दत्त तिवारी का मामला तो आपको याद ही होगा। याद नहीं तो हम&lt;br /&gt;बता देते हैं, वह यूपी के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। 86 साल उम्र में&lt;br /&gt;उन्हें एक-दो नहीं तीन महिलाओं के साथ दिसंबर 2009 में रासलीला रचाते&lt;br /&gt;हुए पकड़ा गया था। एक तेलगू टीवी चैनल ने स्टिंग आपरेशन की क्लिप जब&lt;br /&gt;चलाई तो हड़कंप मच गया। इसके बाद उन्होंने आंध्र प्रदेश के राज्यपाल पद&lt;br /&gt;से इस्तीफा दे दिया था। उन पर एक और आरोप है। शेखर नामक युवक खुद&lt;br /&gt;को उनका बेटा बताता है। हालांकि नारायण दत्त तिवारी इससे इंकार करते&lt;br /&gt;हैं। कोर्ट ने इस मामले मेें अब उनका डीएनए टेस्ट कराने का आदेश दिया&lt;br /&gt;है। अगर टेस्ट मेें आरोप सही साबित हुए तो एनडी तिवारी का बुढ़ापा&lt;br /&gt;निश्चित ही खराब होगा।&lt;br /&gt;बिहार भी कम नहीं&lt;br /&gt;सेक्स स्कैंडल मामले में सिर्फ यूपी ही आगे नहीं है। बिहार भी इस मामले&lt;br /&gt;में कुछ कम नहीं है। यहां भी एक नहीं कई मंत्री, विधायक, सांसद सेक्स की&lt;br /&gt;दुनिया में डूबकर फंस चुके हैं। पिछले दिनों ऐसे ही एक मामले में&lt;br /&gt;शारीरिक शोषण की शिकार एक महिला ने भाजपा विधायक राजकिशोर&lt;br /&gt;केसरी की हत्या कर दी। रूपम पाठक नामक महिला ने विधायक को उनके ही आवास&lt;br /&gt;पर चार जनवरी को जनता दरबार में चाकू घोंपकर हत्या कर दी।&lt;br /&gt;इस मामले की तह में जाएं तो सनसनीखेज रहस्य सामने आते हैंै। रूपम का&lt;br /&gt;राजकिशोर से पुराना नाता था। वह एक निजी स्कूल चलाती है, जिसकी वह&lt;br /&gt;प्राचार्य है। विधायक ने ही उसके स्कूल का उदघाटन किया था और दो लाख&lt;br /&gt;रूपये विधायक निधि से फंड भी दिया था। करीब सात महीने पहले रूपम ने&lt;br /&gt;विधायक पर यौन शोषण की रिपोट दर्ज कराई थी, लेकिन बाद में उसने&lt;br /&gt;कोर्ट में अपना आरोप वापस ले लिया था। बाद में उसने इसी आरोप में&lt;br /&gt;उनकी क्यों हत्या कर दी, यह सवाल सभी को मथ रहा है। उसने केस दबाव या&lt;br /&gt;स्वेच्छा से वापस लिया यह तो वही जानती है। फिलहाल इस हत्या में पत्रकार&lt;br /&gt;नवलेश पाठक की भी गिरफतारी हुई है। उनकी पत्नी रीता रूपम के स्कूल में ही&lt;br /&gt;टीचर हैं। मामले में रूपक का आरोप है कि विधायक कइ बार उनका यौन&lt;br /&gt;शोषण किया। रूपम का यह भी आरोप है कि विधायक के गुर्गों ने भी&lt;br /&gt;उसके स्कूल मेें ही उससे यौन संबंध बनाए। इस तरह मामला सामने आने के&lt;br /&gt;बाद निश्चित ही नीतिश सरकार की जमकर किरकिरी हुई। जिस सुशासन के नाम पर&lt;br /&gt;वह दोबारा सत्ता में आए, इस मामले ने इस पर कालिख ही पोती है। हालांकि&lt;br /&gt;राज्य सरकार ने मामले की सीबीआई जांच की सिफारिश कर यह साफ कर दिया है&lt;br /&gt;कि वह मामले में दूध का दूध और पानी का पानी चाहती है। साथ ही वह&lt;br /&gt;विपक्षियों को केाई मौका भी नहीं देना चाहती।&lt;br /&gt;विधायक राजकिशोर की छवि के बारे में देखें तो वह पूर्णिया क्षेत्र से&lt;br /&gt;विधायक थे। वह अपने क्षेत्र में लोकप्रिय थे। उनकी लोकप्रियता ही थी कि&lt;br /&gt;वह चैथी बार जीते थे। हालांकि उनकी छवि आपराधिक नहीं थी, लेकिन&lt;br /&gt;यौन शोषण को जो आरोप उन पर लगा, वह निश्चित ही उनके दूसरे रूप को&lt;br /&gt;उजागर करता है। कोई भी महिला इस तरह किसी की हत्या नहीं कर सकती। बताया&lt;br /&gt;जाता है कि केसरी की नजर रूपम की नाबालिग बेटी पर भी थी। वह अपने साथ&lt;br /&gt;हो रहे यौन शोषण को तो सह गई, लेकिन बेटी के साथ ऐसा सोच&lt;br /&gt;उसकी रूह कांप गई। इसी कारण उसने विधायक को खत्म करने का मन बना लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7525434177690299792-4077229400215714724?l=apnajagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnajagat.blogspot.com/feeds/4077229400215714724/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7525434177690299792&amp;postID=4077229400215714724' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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left;" trbidi="on"&gt;सपा का तीन दिवसीय सातवां राज्य स्तरीय सम्मेलन। मकसद सिर्फ सपा को सत्ता में वापस लाना। तीनों दिन मंच से जो भी नेता बोले, उसने सिर्फ सपा को सत्ता में लाने का आहवान किया। बसपा को उखाड़ फेंकने को कहा। कांग्रेस को कोसा। सपा ने अपना सम्मेलन कहने को तो पूर्वांचल के गोरखपुर में किया, लेकिन यहां की समस्याओं और पूर्वांचल राज्य की मांग से उनका कोई सरोकार नहीं रहा। अलग से पूर्वांचल राज्य के लिए तो मुलायम ने साफ मना कर दिया। पूर्वांचल की कई समस्याओं में से एक बाढ़ की याद भी सम्मेलन के अंतिम दिन कुछ समय के लिए आई। पूर्वांचल में सम्मेलन का मुख्य लक्ष्य यहां की सीटों पर कब्जा जीत हासिल करना है। सपा को मालूम है कि अगर वह यहां बीस हो गई तो प्रदेश की सत्ता में आने से उसे कोई नहीं रोक सकता। इस सम्मेलन में एक खास बात और रही कि प्रदेश का नेतृत्व अखिलेश सिंह यादव को दिया गया। उन्हें दोबारा राज्य अध्यक्ष घोषित किया गया। राहुल गांधी जिस तरह कांग्रेस को प्रदेश में आगे बढ़ाने के लिए काम कर रहे हैं, उसी तरह उनके मुकाबले अखिलेश को खड़ा किया गया है। अमर सिंह को लेकर पूरे तीन दिन में बहुत कम ही चर्चा हुई। आजम खां ने जरूर उन पर प्रहार किया, लेकिन अन्य नेता बहुत नहीं बोले। &lt;br /&gt;गोरखनाथ की धरती पर सपा के सम्मेलन ने कई तरह के निहितार्थ खड़े किए। पूर्वांचल के गोरखपुर, देवरिया, बस्ती, कुशीनगर, सिद्वार्थनगर और संतकबीर नगर जिले में भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ की खासी पकड़ है। इन जिलों में वह हियुवा के जरिए हिंदुत्व की भावना खड़ी कर अपनी जमीन काफी मजबूत कर चुके हैं। इन जगहों पर करीब दो दर्जन से अधिक विधानसभा की सीटें हैं। इन अगर पूरे पूर्वांचल की विधानसभा सीटों को देखा जाए तो उनकी संख्या करीब 150 के पास पहुंचती है। इन सीटों पर सभी दलों की नजर है। सपा भी जानती है कि अगर इनमें से अधिक सीटें उसकी झोली में चली गईं तो वह प्रदेश की सत्ता में आ सकती है। यही कारण रहा कि पूर्वांचल की धरती को सम्मेलन के लिए चुना गया। वैसे सपा ने पूर्वाचल राज्य की बात को नकार यहां की जनता के मन में एक टीस&amp;nbsp; भर दी है।&amp;nbsp; क्योंकि यह आंदोलन धीेरे-धीरे जोर पकड़ता जा रहा है। अमर सिंह और पीस पार्टी ने इसे स्वीकार कर लिया है। बसपा भी इसके लिए तैयार है। पूर्वाचल राज्य पर सपा का इंकार उसे नुकसान पहुंचा सकता है। वैैसे सपा ने सम्मेलन में 15 एजेंडे वाला आर्थिक व राजनैतिक प्रस्ताव पास कर यहां के लिए लोगोें को आकर्षित करने का काम किया है। उसने पूर्वांचल के लिए विेशेष पैकेज की बात भी कही है। &lt;br /&gt;सपा युवाओं का खास तरजीह दे रही है। तीन दिन के सम्मलेन के मेन फोकस मेें युवा ही रहे। जितने भी नेता बोले, युवाओं को ललकारा। उन पर ही भरोसा जताया। सपा के थिंक टैंक की नयी रणनीति युवाओं के भरोसे ही पार करने की है। सपा को मालूम है मिशन 2012 तभी सफल होगा जब युवा साथ दें। तभी तो प्रदेश की बागडोर अखिलेश के हाथों में दी गई है। सम्मेलन में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने पूर्वांचल की धरती से सत्ता परिवर्तन का शंखनाद किया। मुलायम को मालूम है कि सत्ता की चाबी उन्हें यही से मिलनी है। अगर यहां मैदान मार लिया तो बाकी का काम आसान हो जाएगा। मिस्र में मुबारक की तरह सूबे की तानाशाह मुख्यमंत्री को गद्दी छोड़कर भागने के लिए मजबूर करने की उनकी ललकार यह बताती है कि वह कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं। इसके लिए हिंसा का सहारा नहीं लेने की बात भी हुई। सपा मुखिया ने कहा कि लाठी खाओ, जेल जाओ, हंगामा करो, लेकिन इस तानाशाह और भ्रष्टाचारी सरकार को उखाड़ फेंको। अपंग बना दो बसपा सरकार को, यह ताकत सिर्फ तुम में है। सीमा का मुद्दा उठाते हुए केंद्र सरकार को घेरने की पुरजोर कोशिश की। देश की सीमा संकट में है और सरकार मौन है। सरकारें सत्ता बचाने की फिक्र में है जबकि सपा देश बचाने की सोच रखती है। चीन ने देश की जमीन पर कब्जा करने का नक्शा बना लिया है। पाकिस्तान का आगे कर आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है। &lt;br /&gt;कहां गया आजम का तेवर&lt;br /&gt;सम्मेलन में आजम खां उस तेवर में नहीं दिखे जिसके लिए वो जाने जाते हैं। इस बार उनका भाषण काफी संयमित रहा। ऐसा कोई बयान नहीं दिया जो सपा के लिए मुसीबतें खड़ी करे। शायद इसका कारण उनके उपर शुरू किया गया राजद्रोह का मुकदमा रहा। भाषण में उन्होंने इसका जिक्र भी किया। उन्होंने मुलायम की जमकर तारीफ की। कहा कि मैंने मुलायम को छोडकर किसी को कुछ भी नहीं समझा, परन्तु साजिश के तहत उन्हें भी मुलायम से अलग कर दिया। अपने ऊपर बदायूं में दर्ज देशद्रोह के मुकदमे पर उन्होंने कहा, कि वे कैसे कह सकते हैं कश्मीर हिन्दुस्तान का हिस्सा नहीं है। उन्हें औरंगजेब का हिन्दुस्तान चाहिए, जिसमें पूरा कश्मीर और रंगून शामिल था। आजम ने गुलाम नबी आजाद को देश के मुसलमानों का नेता होने से इंकार किया। मो. अली जौहर विवि पर भी अपनी भड़ास निकाली। अपने पूरे भाषण में उन्होंने मुसलमानों को पूरी तरह रिझाने का काम तो किया ही साथ ही ऐसा कुछ नहीं कहा, जिससे बहुसंख्यक वर्ग बिदके। पूरा भाषण विधानसभा चुनाव को देखते हुए दिया। आजम ने कहा, कार्यकर्ताओं गरीबों को जगा दो, इंकलाब ला दो। जिसका इंतजार पूरी दुनिया कर रही है। प्रदेश के इस माहौल में हमें अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और सड़कों पर उतर कर ऐसा संघर्ष करना होगा कि सरकार की चूल्हें हिल जाए। इसका एक ही तरीका है कि कार्यकर्ता जनता के बीच जाएं। युवाओं के पीछे होगी सपाइयों की फौज, जिस तरह जयप्रकाश नारायण ने अपने आंदोलन में किया था। जेपी आंदोलन के सिपाही रहे मुलायम ने उस जंग की कामयाबी को दुहराने की अपनी मंशा जाहिर कर दी। यह भी संकेत दिया कि सपा सरकार बनने पर वे छात्रों व नौजवानों के लिए बहुत कुछ करने वाले हैं। मुलायम ने कहा कि, जब जेपी ने आंदोलन की शुरुआत की तो उनके साथ छात्र व नौजवान चले थे, परंतु कारवां बढ़ता गया। हालात ऐसे हुए कि सर्वाधिक शक्तिशाली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी टिक नहीं सकीं। &lt;br /&gt;परिवारवाद नहीं &lt;br /&gt;सपा के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि पार्टी परिवारवाद के खिलाफ है। सपा में जिस परिवार के भी लोग हैं वे सत्ता का सुख नहीं ले रहे हैं। सभी की मंशा पार्टी के विस्तार की है। क्योंकि संगठन एक परिवार की तरह होता है। युवाओं की संख्या समाजवादी पार्टी से ज्यादा किसी दल में नहीं है। आगामी चुनाव पार्टी, युवाओं के दम पर जोरदार ढंग से लड़ेगी। चीनी मिलों पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि पूर्वांचल की पहचान कभी चीनी उद्योग से हुआ करती थी। समाजवादी पार्टी की जब सरकार थी तो चीनी मिलों को फिर से पुनर्जीवित करने का प्रयास हुआ था। लेकिन बसपा सरकार ने मिलों को न सिर्फ बंद किया वरन अब उन्हें बेचकर पूर्वांचल के किसानों की भावना से खिलवाड़ कर रही है। &lt;br /&gt;अपराधी को टिकट नहीं देगी सपा&lt;br /&gt;जनता की नजर में जो अपराधी होगा, सपा विस चुनाव में उसे टिकट नहीं देगी। हाल ही में हुए चुनावों में अपराधियों अन्य दलों की सांठगांठ के हस्र से सपा ने सीख ले ली है। अपराधियों को चुनाव से दूर करने का दायित्व राजनीतिक दलों का ही है। लेकिन अपराधी की परिभाषा करनी होगी। जबरन मुकदमा लादने से कोई अपराधी नहीं होता, असली अपराधी वही होता है जिसको जनता अपराधी माने। राष्टीय महासचिव प्रो. रामगोपाल यादव अपराधिकरण को लेकर कुछ इसी तरह दृढ़ दिखे। प्रत्याशी चयन प्रक्रिया को चरणों में पूरी होने की बात कही। इसके लिए जो सूची जारी होगी, उसमें साफ चेहरों को मौका दिया जाएगा। अब सपा कैसे ऐसे चेहरों का चुनाव करेगी, यह वही जानती है। उन्होंने पिछले चुनाव में पार्टी और कार्यकर्ताओं की ओर से हुई गलती उन्होंने स्वीकार की। उन्होंने कहा कि इसकी समीक्षा की जा रही है, ताकि भविष्य में ऐसा न हो। &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7525434177690299792-1351178973549941605?l=apnajagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnajagat.blogspot.com/feeds/1351178973549941605/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7525434177690299792&amp;postID=1351178973549941605' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/1351178973549941605'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/1351178973549941605'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnajagat.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='सत्ता में वापसी का सम्मेलन'/><author><name>Dilip</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17422124411163277795</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-7Ms04kWGge8/TgjX3Z4FFrI/AAAAAAAAAEM/8R0UK0uJTgE/s220/100_7031.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7525434177690299792.post-4959701266453181852</id><published>2010-09-27T04:58:00.000-07:00</published><updated>2010-09-27T04:58:09.562-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>खूनी इंसेफेलाइटिस&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोरखपुर जिले का एक ब्लाक है भटहट। जिला मु&lt;span style="font-size: small;"&gt;ख़&lt;/span&gt;यालय से इसकी दूरी करीब 35 किमी और बाबा राघव दास मेडिकल कालेज से 20 किमी है। यहां के गुलरिहा बाजा निवासी राजेश के पूरे परिवार को इंसेफेलाइटिस ने ऐसा दर्द दिया है जो वे जीवन भर नहीं भुला पाएंगे। काफी मन्नतों के बाद राजेश के घर छह बेटियों के बाद बेटा पैदा हुआ। रक्षाबंधन के कुछ दिनों बाद ही छह बहनों का इकलौता भाई करन (3) इंसेफेलाइटिस की भेंट चढ़ गया। राजेश और उसकी पत्नी से जब उनके बेटे के बारे में पूछा तो उनकी आंखों में आंसू भर आए। गला रुंध गया। पिता की आंखों में आंसू देख सभी बेटियां रोने लगीं। उनकी हालत देख मैं कुछ पूछने की स्थिति में नहीं रहा। इस गांव के कई परिवारों पर इंसेफेलाइटिस का कहर टूटा है। कुछ ऐसी ही दर्दनाक कहानी चरगांवा ब्लाक में देखने को मिली। यह जिले से 15 किमी दूर है। यहां केजंगल पकड़ी गांव में रामजीत के बेटे कन्हैया निषाद (16) को इंसेफेलाइटिस लील गया। कन्हैया की मां सुनीता के आंसू तो बंद ही नहीं हो रहे हैं। उनकी दो बेटियां भी भाई के याद में रो पड़ती हैं। इसी गांव में जमशेद की बेटी मुस्कान (डेढ़ साल) की मौत भी इंसेफेलाइटिस से हो गई। &lt;br /&gt;ऐसी 100-200 नहीं हजारों दर्दनाक कहानियां पूर्वांचल के लगभग हर गांवों में मिल जाएंगी, जिसका कोई न कोई अपना इंसेफेलाइटिस की भेंट चढ़ चुका है। रोजना आधा दर्जन से अधिक मौतें हो रही हैं। इस साल स्थिति बहुत ही भयावह है। इंसेफेलाइटिस से मरने वालों की&amp;nbsp; संखया तेजी से बढ़ रही है। एक ही दिन में 10 लोगों की मौत के बाद यहां एक दिन में मरने वालों का पिछले तीन साल का रिकार्ड टूट गया। मेडिकल कालेज में बीते तीन साल में बीमारी से एक दिन में मरने वालों की अधिकतम संखया नौ थी। यह आंकड़ा 2009 का है। 2008&amp;nbsp;में यह संखया आठ और 2007&amp;nbsp;में छह थी। इसके बाद भी न तो प्रदेश सरकार की नींद टूटी है और न ही केंद्र सरकार की। दोनों सरकारें एक -दूसरेपर दोषारोपण कर रही हैं। इस बीमार से बचाव का जो टीका उपलब्ध है, उसे केंद्र सरकार ने भेजा। वह टीका एक्सपायरी डेट का निकला। इसे लेकर दोनों सरकारें आपस में टकरा रही हैं। इंसेफेलाइटिस पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय सितंबर 2007 में आदेश दे चुका है कि केंद्र और प्रदेश सरकार जेई उपचार एवं उन्मूलन के लिए सेंटर आफ एक्सीलेंस आफ जेई की स्थापना गोरखपुर में करें। इसके लिए आर्थिक सहायता देने का दोनों सरकारों को आदेश दिया था, लेकिन तीन साल बाद भी इस दिशा में कोई प्रयास नहीं हुआ। हालात यह है कि पिछले 32 साल से पूर्वी उत्तर प्रदेश में इंसेफेलाइटिस का कहर बरप रहा है, लेकिन सरकारें अब तक यह पता नहीं लगा पायी हैं कि मौत का कारण जेई है या वीई या फिर एईएस। यदि दोनों सरकारों ने मिलकर पिछले 32 साल में एक ठोस दीर्घकालीन&amp;nbsp;उन्मूलन कार्यक्रम बनाया होता तो संभवत: यह महामारी नहीं फैलती।&lt;br /&gt;इंसेफेलाइटिस का कहर हर साल जुलाई केमध्य शुरू होकर अक्टूबर तक चलता है। हर साल 500-600 मौतें होती हैं। इस बीमारी से जो बच जाते हैं, उनकी जिंदगी तबाह हो जाती है। मानसिक या शारीरिक रूप से अपंग होकर दूसरों पर आश्रित हो जाते हैं। ऐसी संखया करीब एक हजार होती है। यहां समुचित इलाज के लिए ले देकर बाबा राघव दास मेडिकल कालेज है। इसकी भी स्थिति बहुत ही बुरी है। यहां मरीजों को भर्ती करने के लिए जगह नहीं है। चिल्डे्रन वार्ड पूरी तरह से भरा हुआ है। एक बेड पर तीन-तीन मरीज लिटाए गए हैं। यहां उच्च न्यायालय के आदेश पर एक एपेडेमिक वार्ड बना है, जिसमे 108 बेड हैं। इस पर करीब 500 मरीज भर्ती हैं। तीमारदारों को अधिकतर दवाएं बाहर से खरीदनी पड़ती हैं। गरीब की कमर तो इसका इलाज कराने में ही टूट जाती है। औसतन एक दिन की दवा 800-900 रुपये की होती है। &lt;br /&gt;इस साल अब तक मरने वालों की संखया करीब 300 हो गई है। अब तक डेढ़ हजार से अधिक को भर्ती कराया गया है। मेडिकल कालेज में ही 300 का इलाज चल रहा है। यहां पिछले दो महीने में 132 लोगों की इंसेफेलाइटिस से मौत हो चुकी है। जुलाई में 261 भर्ती मरीजों में 46, अगस्त में 511 भर्ती मरीजों में 86 और छह सितंबर तक 158 भर्ती मरीजों में 22 की मौत हो चुकी है।&lt;br /&gt;लगातार हो रही मौतों के बाद जब काफी हो हल्ला मचा तो प्रदेश सरकार की नींद टूटी। प्रदेश के स्वास्थ्य एवं चिकित्सा मंत्री अनंत कुमार मिश्र सितंबर के दूसरे सप्ताह में यहां पहुंचे। यहां आए तो इंसेफेलाइटिस पर बैठक करने, लेकिन पीडि़तों का हाल तक नहीं जाना। वे बाल वार्ड तक नहीं गए। हालांकि इसके लिए लंबी-चौड़ी बातें खूब कहीं। उन्होंने 15 नवंबर से इंसेफेलाइटिस टीकाकरण की शुरुआत की जाएगी। उन्हें नहीं मालूम की तब तक कितनी गोद&amp;nbsp;सूनी हो जाएंगी। &lt;br /&gt;केन्द्र व प्रदेश सरकारें दोषी : मेनका &lt;br /&gt;सितंबर में ही एक कार्यक्रम में भाग लेने गोरखपुर आईं पूर्व केन्द्रीय मंत्री व भाजपा सांसद मेनका गांधी ने कहा कि इंसेफेलाइटिस को प्रदेश व केन्द्र सरकारें हल्के में ले रही हैं। जेई का ठीकरा एक-दूसरे पर फोड़ रही हैं। इस बीमारी के लिए प्रदेश व केन्द्र दोनों जिमेदार हैं। पूर्वांचल में इंसेफेलाइटिस से सैकड़ों बच्चे प्रति वर्ष मर रहे हैं, लेकिन इस मुद्दे पर केन्द्र व प्रदेश सरकार उदासीन रवैया अपनाए हुए हैं। स्वाइन लू को बढ़ा चढ़ा कर पेश किया जा रहा है, लेकिन इंसेफेलाइटिस को हल्के में लिया जा रहा है। स्वाइन लू से दो चार मरीजों की मौत के बाद हाय तौबा मच जाती है जबकि इंसेफेलाइटिस से यूपी व बिहार का एक बड़ा भाग प्रभावित है और इससे प्रति वर्ष सैकड़ों बच्चों की मौत हो रही है। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार पूर्वांचल की उपेक्षा कर रही है। &lt;br /&gt;9 सितबर को गोरखपुर -बस्ती मंडल के सातों जिलों के साथ मऊ के जिला मुखयालय पर भाजपा, हियुवा कार्यकर्ताओं ने धरना दिया। गोरखपुर में सदर सांसद योगी आदित्य नाथ के नेतृत्व में जुलूस निकाला गया। योगी ने कहा कि पिछले 32 वर्ष से पूर्वी उत्तर प्रदेश में 50 हजार से अधिक मासूमों की मौत हो चुकी है और इतने ही इस बीमारी से मानसिक और शारीरिक रूप से विकलांग हो गये हैं, फिर भी इस बीमारी के उन्मूलन के लिये कोई ठोस प्रयास नहीं किया गया। उन्होंने सवाल खड़ा किया कि स्वाइन लू और बर्ड लू के नाम पर हजारों करोड़ खर्च करने वाली सरकार जेई पर खामोश क्यों है। &lt;br /&gt;बीते 12 सितंबर को अमर सिंह यहां इंसेफेलाइटिस के मरीजों का हाल लेने मेडिकल कालेज पहुंचे। उन्होंने प्रदेश और केंद्र दोनों सरकारों को कोसा। इसके लिए उन्होंने आंदोलन चलाने की घोषणा की। साथ ही दवा के लिए दो लाख रुपये भी दिए। उन्होंने प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री को जमकर कोसते हुए कहा कि उन्हें इस पद पर बने रहने का हक नहीं है। वे यहां आए और पीडि़तों का हाल तक नहीं लिया। &lt;br /&gt;क्या है इंसेफेलाइटिस - गांव के बहुत से लोगों को नहीं मालूम की यह बीमारी क्या है। कोई इसे नउकी बीमारी कहता है तो कोई दिमागी बुखार। कोई इसे जापानी इंसेफेलाइटिस कहता है। वैसे यह रोग वाइरस से होती है। बीआरडी मेडिकल कालेज के बाल रोग विभाग के प्रमुख डा. केपी कुशवाहा कहते हैं कि यहां दो तरह के वाइरस पाए जाते हैं। एक जापानी इंसेफेलाइटिस वाइरस और दूसरा इंट्रो वाइरस। अधिकतर बच्चों में इंट्रो वाइरस के लक्षण पाए जा रहे हैं, &lt;br /&gt;जबकि जापानी इंट्रो वाइरस के लक्षण वाइरस कम बच्चों में पाए जा रहे हैं। &lt;br /&gt;लक्षण- सिरदर्द, बुखार, मानसिक अस्वस्थता &lt;br /&gt;सालवार अगस्त माह तक इंसेफे लाइटिस से भर्ती और मरने वाले मरीज&lt;br /&gt;2005 2006 2007 2008 2009 2010 &lt;br /&gt;भर्ती मौत&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; भर्ती&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; मौत&amp;nbsp;&amp;nbsp; भर्ती&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; मौत&amp;nbsp; भर्ती&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; मौत&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; भर्ती&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;मौत&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; भर्ती&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; मौत&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_5__sIV19hpA/TKCGuvM2RaI/AAAAAAAAADc/5S45ftnC3GA/s1600/encepahalitiscgorkahpurap.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" px="true" src="http://4.bp.blogspot.com/_5__sIV19hpA/TKCGuvM2RaI/AAAAAAAAADc/5S45ftnC3GA/s1600/encepahalitiscgorkahpurap.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;105&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; 311&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;743&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; 138&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; 533&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; 91&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; 924&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; 185&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; 845&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; 199&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; 1164&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; 210 &lt;br /&gt;नोट - सभी आंकड़े जनवरी से अगस्त महीने तक के हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7525434177690299792-4959701266453181852?l=apnajagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnajagat.blogspot.com/feeds/4959701266453181852/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7525434177690299792&amp;postID=4959701266453181852' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/4959701266453181852'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/4959701266453181852'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnajagat.blogspot.com/2010/09/35-20-3-15-16-100-200-10-2009-2008-2007.html' title=''/><author><name>Dilip</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17422124411163277795</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-7Ms04kWGge8/TgjX3Z4FFrI/AAAAAAAAAEM/8R0UK0uJTgE/s220/100_7031.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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है। ऐसा इसलिए हैं क्योकि&amp;nbsp;वहां एक&amp;nbsp; नहीं कई ललित मोदी हैं, जो क्रिकेट से काली कमाई करने में लगे हैं। कहा जा रहा है कि पिछले दिनों कोच्चि और पुणे की&amp;nbsp;टीमों की&amp;nbsp;बिक्रि में मोदी ने करोड़ों रुपए कमाए। अपने लोगों को फायदा पहुंचाया। आईपीएल-2 ·े मैच फिक्स थे। इन·ी जान·ारी बीसीसीआई&amp;nbsp;के &amp;nbsp;चेयरमैन शशांक&amp;nbsp;&amp;nbsp;मनोहर और शरद पवार को&amp;nbsp;न हो ऐसा हो ही नहीं सकता। तभी तो मोदी सभी&amp;nbsp;की &amp;nbsp;पोल खोलने के&amp;nbsp;अंदाज में ताल ठोके &amp;nbsp;हुए हैं। इन सभी आरोपों का&amp;nbsp;&amp;nbsp;खुलासा तो जांच होने पर ही होगा, लेकिन लाख टके&amp;nbsp;का &amp;nbsp;सवाल यह है कि &amp;nbsp;जांच कराएगा कौन? और होगा भी तो सच्चाई सामने आएगी भी, क्योकि &amp;nbsp;यहां कोई साधू तो दिखता नहीं। वैसे आयकर विभाग जांच कर रही है, लेकिन उसके दायरे सीमित हैं। &lt;br /&gt;इंडियन प्रीमियर लीग से भले ही ललित मोदी की&amp;nbsp;विदाई एक &amp;nbsp;तरह से हो गई हो, लेकीन विवाद थम जाएगा ऐसा तो नहीं लगता। इसका कारण यह है कि&amp;nbsp;इसमें जितने भी लोग जुड़े हैं, वे दूध के&amp;nbsp;धुले नहीं हैं और मोदी भी ताल ठोककर खड़े हैं कि &amp;nbsp;अभी वे गए नहीं हैं सिर्फ उन्हें निलंबित किया गया है। मोदी ने इशारों-इशारों में सबकी कलई खोलने की&amp;nbsp;बात भी कह दी है। सारा खेल पैसे का&amp;nbsp;है और इसी पैस के&amp;nbsp;कारण सभी का&amp;nbsp;दामन दागदार है। विदेश राज्य मंत्री थरूर को&amp;nbsp;इसी कारण अपना पद गंवाना पड़ा। मोदी गए, कोच्चि टीम में पैसा लगाने वालों का&amp;nbsp;खुलासा करने के कारण। इसमें थरूर की&amp;nbsp;महिला मित्र सुनंदा पुष्कर का&amp;nbsp;नाम सामने आया, जिनके&amp;nbsp;पास बिना पैसा लगा कोच्चि टीम के&amp;nbsp;19 प्रतिशत शेयर हैं। जब इसका &amp;nbsp;खुलासा मोदी ने ट्विटर पर किया तो उन्हें इस बात का&amp;nbsp;अंदाजा ही नहीं था&amp;nbsp;कि &amp;nbsp;इससे इतना बड़ा तूफान खड़ा हो जाएगा। फिलहाल क्रिकेट पैसा देने वाली ऐसी दुधारू गाय है कि हारने वाली टीम भी करोड़ों रुपए के&amp;nbsp;फायदे में रहती है। इसका &amp;nbsp;सीधा सा उदाहरण पिछला आईपीएल है, जिसमें शाहरुख खान&amp;nbsp;की &amp;nbsp;टीम कोलकाता नाइट राइडर्स फिसड्डी रहने के&amp;nbsp;बाद भी कमाई के&amp;nbsp;मामले में सबसे आगे रही। &lt;br /&gt;बात पैसों की&amp;nbsp;चल रही है तो आपको&amp;nbsp;बता दें कि&amp;nbsp;आईपीएल में अब तक &amp;nbsp;30 हजार करोड़ रुपए का&amp;nbsp;कारोबार हो चुका&amp;nbsp;है। इसका&amp;nbsp; गोरखधंधा इंडिया तक &amp;nbsp;ही नहीं मारिशस, यूरोप, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका&amp;nbsp; जैसे देशों में भी फैला है, जहां से इसमें पैसा आ और जा रहा है। अगर हम बात बीसीसीआई की करें तो 2005-06 इसकी हैसियत सिर्फ 33 करोड़ रुपए थी, जो 2007-08 में बढ़कर 1000.41 करोड़ रुपए हो गई। क्रिकेट का&amp;nbsp;यह बाजार सबसे कमाऊ बिजनेस बनकर सामने आया है। तभी तो हर कोई इसमें पैसा लगाना चाहता है। चाहें वह फिल्मी स्टार हो या फिर उद्योगपति। यह कुबेर का&amp;nbsp;ऐसा खजाना दिख रहा है, जिससे हर कोई अपना घर भर लेना चाहता है। तभी तो एक -एक&amp;nbsp;टीम को&amp;nbsp;खरीदने के&amp;nbsp; लिए बड़े-बड़े ग्रुप करोड़ों रुपए लगाने को&amp;nbsp;तैयार हैं। भले ही वे अन्य खेल के&amp;nbsp;लिए एक &amp;nbsp;फूटी कौड़ी न दें, लेकीन क्रिकेट के&amp;nbsp;लिए वे अपने खजाने का&amp;nbsp;मुंह खोलने को&amp;nbsp;तैयार हैं। पिछले दिनों हुए बिड में सहारा समूह ने 1700 करोड़ रुपए में पुणे&amp;nbsp;की &amp;nbsp;टीम खरीद ली, जबकी &amp;nbsp;&amp;nbsp;पिछले इससे पहले की&amp;nbsp;आठ टीमों&amp;nbsp;का &amp;nbsp;जो बिड तीन साल पहले हुआ था, उसमें इतना पैसा कीसी टीम के&amp;nbsp;लिए नहीं लगा। इसके &amp;nbsp;अलावा दूसरी टीच कोच्चि को&amp;nbsp;रेंदेवू स्पोट्र्स ने 1500 करोड़ रुपए में खरीदा। इसी टीम मालिक के&amp;nbsp;नाम ललित मोदी जब ट्विटर पर सामने लाए तो विवाद खड़ा हो गया। इसमें सुनंदा पुष्कर की&amp;nbsp;भागीदारी भी सामने आई, वह भी बिना पैसा लगाए। सुनंदा शशि थरूर की&amp;nbsp;करीबी हैं, इसलिए यह माना गया कि इस कंपनी को&amp;nbsp;बिड दिलाने में थरूर की&amp;nbsp;भूमिका&amp;nbsp;है। &lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;आईपीएल&amp;nbsp;की &amp;nbsp;शुरुआत की&amp;nbsp;बात करें तो 2008 में जब इंडियन क्रिकेट लीग की&amp;nbsp;शुरुआत हुई तो इसके &amp;nbsp;जवाब में इसे शुरू किया गया। इसके&amp;nbsp;गवर्निंग काउंसिल में ललित मोदी चेयरमैन, निरंजन शाह, वाइस चेयरमैन, पूर्व क्रिकेट सुनील गावसकर, रवि शास्त्री, मंसूरी अली खान पटौदी, शशांक &amp;nbsp;मनोहर, एच श्रीनिवासन, एमजी पांडेय, संजय जगदले, चिरायु अमीन, अरुण जेटली आदि लोग थे। पहले आईपीएल के &amp;nbsp;लिए आठ टीमों की&amp;nbsp;नीलामी की&amp;nbsp;गई। कुल 2853 करोड़ रुपए में। चौथे सीजन के&amp;nbsp;लिए दो और टीमों की&amp;nbsp;नीलामी की&amp;nbsp;गई, 3200 करोड़ रुपए में। इतना पैसा लगाकर कमाई किस तरह से होती है, इसका &amp;nbsp;खेल भी निराला है। सभी टीमों को &amp;nbsp;लीग द्वारा प्रसारण और कई तरह के&amp;nbsp;राइट्स बेचने से जो आय होगी, उसमें से एक &amp;nbsp;हिस्सेदारी इन्हें दी जा रही है। साथ ही टीमें व्यक्तिगत रूप से भी स्पांसर तलाश सकती हैं। टीम और खिलाडिय़ों&amp;nbsp;के &amp;nbsp;लिए प्रयोजक &amp;nbsp;खोजना कोई बड़ी बात नहीं है। उदाहरण के&amp;nbsp;लिए देखें तो आईपीएल के&amp;nbsp;सीजन एक में कुल ब्रांडों की&amp;nbsp;संख्या 40 थी, जो सीजन दो में 69 और तीन में 80 हो गई। इन्ही के&amp;nbsp;बल तो जमकर कमाई हो रही है। फिर मोदी ने तो इसे पैसा उगलने वाली ऐसी मशीन बना दिया जिससे बस दबाते जाओ और पैसा निकालते जाओ। पहले सीजन में जितनी कमाई हुई थी वह तीसरे सीजन तक &amp;nbsp;में दोगुनी हो गई। मोदी ने मैच सिनेमा हाल और बार स्क्रिनिंग के&amp;nbsp;अधिकार 330 करोड़ रुपए में बेचे। इंटरनेट अधिकार, मैच के&amp;nbsp;बाद होने वाली पार्टियां, कलर्स के&amp;nbsp;साथ करार, मोबाइल राइट्स और ग्राउंड राइट्स भी बेचे गए। इतना ही नहीं मोदी ने स्टेडियम स्क्रिन पर ओवरों के&amp;nbsp;बीच भी विज्ञापन बेच दिए। आईपीएल के&amp;nbsp;पास सेटमैक्स पर 150 सेकेंड का&amp;nbsp;एयरटाइम होता है, इसकी&amp;nbsp;कीमत 6 लाख रुपए प्रति उस सेकेंड की&amp;nbsp;दर से 90 लाख रुपए प्रति मैच हुआ। कुल 60 मैच 54 करोड़ रुपए हुए। यानी कमाई ही कमाई। कमाई का&amp;nbsp;यही लालच है कि अधिकतर आईपीएल टीम में कोई न कोई राजनेता जुड़ा है। जिस रांदेवू गु्रप में कोच्चि की&amp;nbsp; टीम खरीदी थी उसके मेंटर पूर्व मंत्री शशि थरूर बताए जाते हैं। तभी तो 11 अप्रैल को&amp;nbsp;जब मोदी ने इस टीम के&amp;nbsp;शेयर धारको&amp;nbsp;का&amp;nbsp;नाम ट्विटर पर खोला तो उसमें सुनंदा का&amp;nbsp;भी नाम था, जो थरूर की खास हैं। इसी के&amp;nbsp;बाद विवाद शुरू हो गया। इसके&amp;nbsp;बाद यह सामने आया कि&amp;nbsp;केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार की&amp;nbsp;बेटी सुप्रिया सुले के&amp;nbsp; पति सदानंद की&amp;nbsp;एक&amp;nbsp;फ्रेंचाइजी में पैसा लगा है। नागरिक &amp;nbsp;उड्यन मंत्री प्रफुल्ल पटेल की&amp;nbsp;बेटी पूर्णा पटेल पर आरोप है कि&amp;nbsp;उन्होंने आईपीएल से जुड़ी जानकारी पिता को&amp;nbsp;मेल की&amp;nbsp;। पूर्णा आईपीएल की&amp;nbsp; हॉस्पिटैलिटी मैनेजर हैं। साथ ही उन पर आरोप है कि&amp;nbsp; उन्होंने एयर इंडिया की&amp;nbsp;दिल्ली-मुंबई की&amp;nbsp;फ्लाइट जयपुर ले गई ताकि&amp;nbsp; आईपीएल खिलाडिय़ों को&amp;nbsp; वहां से लाया जा सके। इसके&amp;nbsp; अलावा इसमें रायल चैलेंजर टीम के&amp;nbsp;मालिक&amp;nbsp; विजय माल्या की&amp;nbsp;बेटी लैला महमूद का&amp;nbsp;भी नाम सामने आया है। वह ललित मोदी के&amp;nbsp;फोर सीजंस होटल के कमरे से दस्तावेज ले गई थी। हालांकि&amp;nbsp;आयकर विभाग ने वे दस्तावेज हासिल कर लिए हैं जो वह ले गई थी। लैला मोदी के&amp;nbsp;लिए ही काम करती है। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;आईपीएल पर जब विवादों का साया छा चुका&amp;nbsp;है तो इस मामले की&amp;nbsp;जांच भी हो रही है। आयकर विभाग की&amp;nbsp;टीम अब जांच में लग गई है जो पैसा लगाया गया है, वह कहां से आया है। पुणे टीम को&amp;nbsp;खरीदने वाली सहारा इंडिया के&amp;nbsp;लखनऊ स्थित ऑफिस में छापा मारा गया। इधर बांबे हाईकोर्ट ने लीग की&amp;nbsp;कमाई का&amp;nbsp;ब्योरा तलब किया है। अन्य टीमों ने आयकर का&amp;nbsp;कितना घोटाला किया है इसकि&amp;nbsp;भी जांच की&amp;nbsp;जा रही है। साथ ही सेवाकर का&amp;nbsp;मामला भी सामने आया है। कुल मिलाकर देखा जाए तो मामला करोड़ों रुपए के&amp;nbsp;घपले का&amp;nbsp;है। इसमें काली कमाई भी लगाई गई है। ऐसे-ऐसे लोग टीम&amp;nbsp;के &amp;nbsp;मालिक&amp;nbsp;हैं जो बीसीसीआई में पदाधिकारी भी हैं। मुख्य चयनकर्ता के&amp;nbsp; श्रीकांत को&amp;nbsp;ही लें तो वे चेन्नई सुपर किंग्स के&amp;nbsp;ब्रांड एंबेसेडर भी हैं। जो खिलाड़ी आईपीएल की&amp;nbsp;संचालन समिति में हैं वे ही उनकी&amp;nbsp;कमेंटरी टीम में भी हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं। इसे साफ करना ही होगा। नहीं तो भद्रजनों का&amp;nbsp; खेल&amp;nbsp;क्रिकेट&amp;nbsp;कलंकित होगा ।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7525434177690299792-1097690554488195848?l=apnajagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnajagat.blogspot.com/feeds/1097690554488195848/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7525434177690299792&amp;postID=1097690554488195848' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/1097690554488195848'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/1097690554488195848'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnajagat.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='विवादों का  आईपीएल'/><author><name>Dilip</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17422124411163277795</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-7Ms04kWGge8/TgjX3Z4FFrI/AAAAAAAAAEM/8R0UK0uJTgE/s220/100_7031.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_5__sIV19hpA/S-WuszVvOiI/AAAAAAAAADM/WWybjXhpTEA/s72-c/untitled.bmp' 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में डुबकी&amp;nbsp;लगाई. अंतिम शाही स्नान 14 अप्रैल को&amp;nbsp;था. ऐसा दुर्लभ संयोग 3333 साल बाद बना, इसलिए पुण्य कमाने&amp;nbsp;&amp;nbsp;का&amp;nbsp;ऐसा सुनहरा मौका कोई हिंदू खोना नहीं चाहता था. इसलिए इसी दिन भीड़ ज्यादा हुई. अब यहां ग्यारह साल बाद फिर कुम्भ&amp;nbsp;लगेगा. पूरे कुम्भ&amp;nbsp;के दौरान एक &amp;nbsp;ओर जहां धर्मनगरी अखाड़ों के&amp;nbsp;शाही वैभव से आलोकि&amp;nbsp;त होती रही, वहीं दूसरी ओर स्नान घाटों पर सम्मोहित कर देने वाला दृश्य दिखे. शायद ही कोइ&amp;nbsp;ऐसा घाट रहा हो, जहां स्नानार्थियों में होड़ न लगी हो.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7525434177690299792-5880692826308627236?l=apnajagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnajagat.blogspot.com/feeds/5880692826308627236/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7525434177690299792&amp;postID=5880692826308627236' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/5880692826308627236'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/5880692826308627236'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnajagat.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='पुण्य की डुबकी'/><author><name>Dilip</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17422124411163277795</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-7Ms04kWGge8/TgjX3Z4FFrI/AAAAAAAAAEM/8R0UK0uJTgE/s220/100_7031.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_5__sIV19hpA/S8dSk3cZ4vI/AAAAAAAAAC8/DgD6ENOZwg0/s72-c/kumbh.bmp' height='72' 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वह राजनीति में चाणक्य, अर्थ में कुबेर, वीरता में अर्जुन की&amp;nbsp;भूमिका&amp;nbsp;में है. जब अत्याचार होता है तो वह काली और दुर्गा भी बन जाती है. वह मदर टेरेसा की &amp;nbsp;तरह ममतामयी मां, बहन भी है. नारी आज अगर हर क्षेत्र में पुरुषों को चुनौती दे रही है, तो अपने मेहनत&amp;nbsp;के &amp;nbsp;बल पर. &lt;br /&gt;वैसे नारी को&amp;nbsp;मजबूत करने में पुरुष का&amp;nbsp;हाथ कम नहीं है. वही पुरुष जो उसे ‘आंचल में दूध, आंखों में पानी नारी तेरी यही कहानी’ और ‘त्रिया चरित्रम, पुरुषस्य भाग्यम, देवो न जानति कुतो मनुष्य:’ जैसे कहावतों से नवाजता आ रहा है, उसी ने उनके लिए आजादी के&amp;nbsp;हर द्वार खोले हैं. बेडिय़ों को काटने में साथ दिया है. आज इंटरनेशल वूमेन डे है. यह संयोग की&amp;nbsp;बात है&amp;nbsp;की&amp;nbsp;संसद में नारी को&amp;nbsp;और भी मजबूत करने के लिए आज ही के&amp;nbsp;दिन महिला आरक्षण बिल लाया जा रहा है. यह बिल वही पुरुष समाज ला रहा है, जो उसे हमेशा दबाता और कुचलता आया है. वैसे संसद में इस महिला बिल के&amp;nbsp;बहुत से विरोधी हैं, जो अलग-अलग कारणों से इसे पास नहीं होने देना चाहते, लेकीन इसके &amp;nbsp;बाद भी यह बिल पास होता है तो यह नारी की&amp;nbsp;आजादी में एक &amp;nbsp;मील का&amp;nbsp;पत्थर साबित होगा. वैसे अपना देश महिलाओं को&amp;nbsp;आजादी देने के&amp;nbsp;मामले में पश्चिमी देशों से आगे रहा है. यहां अमेरिका&amp;nbsp;&amp;nbsp;से पहले महिलाओं को&amp;nbsp;मतदान का&amp;nbsp;अधिकार दिया गया. तब देश गुलामी के&amp;nbsp;दौर में था. अपने देश में अमेरिका के&amp;nbsp;मुकाबले ज्यादा महिला डॉक्टर, वैज्ञानिक &amp;nbsp;और प्रोफेसर हैं. राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष भी महिला हैं. देश की &amp;nbsp;सबसे बड़ी राजनीति पार्टी की&amp;nbsp;मुखिया भी महिला ही हैं. फिर कैसे कहा जाए&amp;nbsp;कि&amp;nbsp;अपने देश में महिलाएं पीछे हैं. यह अलग बात है कि यहां महिलाएं दहेज के&amp;nbsp;लिए आज भी जलाई जाती हैं. बलात्कार का&amp;nbsp;शिकार होती हैं. जन्म लेने से पहले ही गर्भ में मार दिया जाता है. ऐसा अपने देश में ही होता है. हर तरह का&amp;nbsp;रूप देखने को&amp;nbsp;मिलता है. हर संस्कति देख सकते हैं. कोई भी आए उसे आत्मसात कर लिया जाता है. फिर भी अपनी संस्कति जिंदा रहती है. अगर महिलाओं के&amp;nbsp;साथ यहां अत्याचार होता है तो प्यार और दुलार भी होता है. यहां जहां, ‘ढोल, गंवार, शूद्र, पशु नारी, सकल ताडऩा के&amp;nbsp;अधिकारी’ जैसे जुमले दिए जाते हैं तो यहां यह भी कहा जाता है, ‘यस्य नार्यस्तु पूज्यते, रमन्ते तत्र देवता’. ये अपना देश भारत है. ये ऐसा ही है. यहां कुछ भी हो सकता है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7525434177690299792-3194279543393636493?l=apnajagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnajagat.blogspot.com/feeds/3194279543393636493/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7525434177690299792&amp;postID=3194279543393636493' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/3194279543393636493'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/3194279543393636493'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnajagat.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='ऐसा देश ही है अपना'/><author><name>Dilip</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17422124411163277795</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-7Ms04kWGge8/TgjX3Z4FFrI/AAAAAAAAAEM/8R0UK0uJTgE/s220/100_7031.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_5__sIV19hpA/S5PjxVA109I/AAAAAAAAAC0/-a7XQi25e2M/s72-c/indian-women-paintings.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7525434177690299792.post-4615697952075358300</id><published>2009-03-19T10:26:00.000-07:00</published><updated>2009-03-19T10:53:30.115-07:00</updated><title type='text'>वरुण ने गलत नहीं कहा</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_5__sIV19hpA/ScKGjD6mIKI/AAAAAAAAACs/T_9VeA7gaXo/s1600-h/VarunGandhi_1367891c.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5314958447155224738" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_5__sIV19hpA/ScKGjD6mIKI/AAAAAAAAACs/T_9VeA7gaXo/s320/VarunGandhi_1367891c.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;आजकल वरुण गांधी का बयान देश में चर्चा का ि‍वषय बना हुआ है। उन्‍होंने एक चुनावी सभा में यह कहा ि‍क ि‍कसी भी ि‍हन्‍दू पर उठने वाला हाथ काट ि‍दया जाएगा। इसमें गलत क्‍या है जो इसे लेकर सभी राजनीितक दल आसमान ि‍सर पर उठाए हुए हैं। वे वरुण को सजा देने की मांग कर रहे हैं। उन्‍होंने ि‍कसी वर्ग ि‍वशेष के ि‍खलाफ तो नहीं बोला। सच्‍चा ि‍हन्‍दू होने के नाते उनका कहना कोइ गलत नहीं है। ि‍स्‍थि‍त यह है ि‍क अपने ही देश में ि‍हन्‍दू दोयम दर्जे के नाग ि‍रक हो गए हैं। मुसलमानों की संख्‍या देश में बढती जा रही है। उस पर कोइ लगाम नहीं है। यही ि‍स्‍थि‍त रही तो एक ि‍दन ऐसा आएगा जब अपने ही देश में ि‍हन्‍दू अल्‍पसंख्‍य हो जाएंगे। वरुण गांधी ने जो भी कहा वह ि‍हन्‍दुओं की ि‍स्‍थि‍त देखकर कहा। देश में उनकी सुनने वाला कोई नहीं है। मुसलमानों को पाि‍कस्‍तान व खाडी देश सहायता ि‍मलती है। अगर यहां पुि‍लस, सेना न रहे तो ि‍हन्‍दुओं का अपने ही देश में रहना मुिश्‍कल हो जाएगा। ि‍फर जब भारत माता को डायन कहने वाले आजम खां के ि‍खलाफ कोई एक्‍शन नहीं ि‍लया गया, आतंकवाि‍दयों की सहायता करने वाले ज‍म्मू कश्‍मीर के सीएम रहे मुफ़ती मोहम्‍मद सईद पर कुछ नहीं ि‍कया गया तो वरुण ने तो कोई अपराध ही नहीं ि‍कया। दरअसल देश के राजनीि‍तक दल मुसलमानों का वोट पाने के ि‍लए देश का गर्त में ले जा रहे हैं। अगर मुसलमानों को इसी तरह शह दी जाती रही तो एक ि‍दन ऐसा आएगा जब वे ि‍हन्‍दुओं पर हावी हो जाएंगे।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7525434177690299792-4615697952075358300?l=apnajagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://apnajagat.blogspot.com/feeds/4615697952075358300/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7525434177690299792&amp;postID=4615697952075358300' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/4615697952075358300'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7525434177690299792/posts/default/4615697952075358300'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://apnajagat.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='वरुण ने गलत नहीं कहा'/><author><name>Dilip</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17422124411163277795</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' 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