मंगलवार, 3 जनवरी 2017

एक रिकार्ड सीता की धरती के नाम

आज पूरे देश के लिए पानी के लिए मारामारी की स्थिति है। गर्मियों में समस्या इतनी गहरा जाती हैै कि लोग प्यास से दम तोड. देते हैं। महाराष्ट्र के लातूर जिले में तो पिछली गर्मियों में पानी का संकट इतना गंभीर हो गया था कि इसके लिए पानी रेल चलानी पड़ी थी। इसके जरिए वहां पानी पहुंचाया गया। इस तरह की स्थिति के बाद भी लोग चेत नहीं रहे हैं। ऐसा संकट नहीं आए, यह काम बिहार के सीतामढ़ी जिले के लोगों ने किया है। यहां वाटर रिचार्ज को लेकर लोग इस कदर जागरूक हैं कि देश को राह दिखा रहे हैं। लोगों के लिए एक प्रेरणा की तरह हैं।
चार युगों में से एक सतयुग, जिसमें भगवान राम ने जन्म लिया था। माता सीता ने जन्म लिया था। उस समय बारिश नहीं होने के चलते राजा जनक के राज्य में त्राहि-त्राहि मच गई थी। भीषण अकाल पड़ने से जनता तबाह थी। भूखी मर रही थी। ऐसे में राजा जनक ने एक ऋषि के कहने पर महायज्ञ शुरू किया। साथ ही उन्होंने सोने के हल से खेत की जुताई शुरू की तो उस खेत में हल एक घड़े से टकराया। उसमें से माता सीता निकलीं। रामायण की यह कथा सभी जानते हैं। और पानी लोगों की जिंदगी के लिए कितना महत्वपूर्ण है, यह भी मानते हैं। लेकिन उसे बचाने के लिए कोई प्रयासरत नहीं है। लेकिन सीतामढी यानी माता सीता की जन्मस्थली के लोग इसकी कीमत अच्छी तरह से समझते हैं। तभी तो इस जिले में जगह-जगह भूगर्भ जल के रिचार्ज की व्यवस्था है। यहां एक बूंद पानी लोग जाया नहीं होने देना चाहते हैं। पानी को लेकर लोग इतने जागरूक हैं कि इसे लिम्का बुक आॅफ रिकार्ड में दर्ज किया गया है।
पहले सीतामढी में यह स्थिति थी कि यहां गर्मियों मेें लोग पानी के लिए तरसते थे। जल स्रोत सूख जाते थे। आसपास के जिलों का भी हाल कुछ ऐसा ही था। जो हैंडपंप 50 फीट पर पानी देते थे, उनका जल स्तर इतना गिर गया कि 200 फीट तक बोर करना पड़ रहा था। इस समस्या को यहां के लोगों ने समझा और पानी बचाने की मुहिम में कंधा से कंधा मिलाकर चल पड़े। एक के साथ एक होते कारवां बन गया। यहां का हर एक इंसान बच्चा हो या जवान पानी बचाने की कवायद में लग गया। यही कारण है कि आज सीतामढ़ी में जगहज-जगह वाटर रिचार्ज की व्यवस्था देखी जा सकती है। घर बनवाते समय भी बहुत से लोग वाटर रिचार्ज के लिए एक अलग से टैंक जरूर बनवाते हैं। जिले के लोगों ने जल संरक्षण के लिए 1 दिन में 2168 वाटर रिचार्ज टैक का निर्माण कर लिम्का बुक आॅफ रिकार्ड में नाम दर्ज करा लिया। इसकी पहल पृथ्वी दिवस के एक दिन यानी 21 अप्रैल 2016 को की गई। एक दिन में इसका निर्माण होने के कारण इसे रिकार्ड में शामिल किया गया। यह निश्चित ही बिहार ही नहीं पूरे देश के लिए गौरव की बात है।
इस तरह हुई शुरूआत
जिले में 21 अप्रैल 2016 को जिला जल एवं स्वच्छता समिति ने यूनिसेफ के सहयोग से इसका निर्माण किया। इसें न केवल सरकारी स्कूल वरन मदरसे व निजी स्कूल, आंगनबाड़ी केंद्र, स्वास्थ्य केंद्र, थाना परिसर और प्रखंड कार्यालयों में वाटर रिचार्ज टैंक का निर्माण किया गया। इस बारे में आयुक्त का कहना है कि सही देखभाल हो तो भूजल स्तर में बढ़ोतरी होगी। जल संकट का सामना नहीं करना पड़ेगा। वैसे तो सरकारी निर्माण कार्यों की सही देखभाल नहीं होने से अक्सर कोई भी योजना दम तोड़ देती है। इसे देखते हुए डीएम ने इनकी सफाई और देखभाल की जिम्मेदारी संबंधित संस्थान के प्रमुख को दी है। साथ ही स्कूलों में दूसरे और चैथे शनिवार को स्वच्छता दिवस मनाने की घोषणा की है। इस दिन स्कूल में टैंक की सफाई के साथ-साथ बच्चों को स्वच्छता का पाठ भी पढ़ाया जाता है। टैंक से निकाले गए कचरे को गड्ढा खोदकर जमा किया जाता है। डीएम का कहना है कि जब मैं खुले में शौच से मुक्ति के लिए चलाए जा रहे अभियान के साथ जिले का दौरा कर रहा था तो पाया कि जगह-जगह पानी का जमा है। पानी बर्बाद हो रहा है। वहीं जिले के कई हिस्सों में जल संकट था। इसे देखते हुए पानी के बचाव के लिए अभियान शुरू किया गया। यह अभियान पूरे बिहार के साथ देश के लिए एक अनुकरणीय पहल है। लोगों को इससे सीख लेने की जरूरत है।
डीएम का कहना है कि देश में यह पहली बार है कि जब जल संरक्षण को लेकर इतना बड़ा प्रयास किया गया। इन टैक के माघ्यम से गंदगी के कारण फैलने वाले रोगों पर भी अंकुश लगेगा। स्कूलों से शुरू होने वाले इस पहल के कारण इसका सीधा प्रभाव बच्चों पर होगा। उनके माध्यम से जल संरक्षण और स्वच्छता का संदेश जन-जन तक पहुंचेगा। इस पह के लिए जिले के 11000 शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया गया। साथ ही 5 लाख बच्चों को भी इसके फायदों के बारे में बताया गया। एक टैंक के निर्माण की लागत 2500 से 5000 के बीच आई। उन्होंने कहा कि ग्रामीण इलाकों में पीने के पानी के रूप में 85 प्रतिशत भूजल का इस्तेमाल होता है, परंतु विगत कुछ सालों से इसमें गिरावट आई। इसी को ध्यान में रखकर भूजल स्तर को रिचार्ज करने के लिए इस पहल की शुरूआत हुई। वह बताते हैं कि इस पहल से हम एक साल में 500 पानी के ट्रेनों के बराबर लगभग 26 करोड़ लीटर जल संरक्षित कर सकेंगे।
इस तरह बनाते टैंक
भूजल-संरक्षण और वॉटर रिर्चाज के लिए जिस टैंक का निर्माण किया जाता है, उसके लिए जल स्तोत्रों के पास एक गहरा गड्ढा खोदा जाता है। उसमें नलों का प्रयोग किया हुआ जल जाता हैं और जमीन के भूजल स्तर को रिर्चाज करता है। गंदगी रोकने के लिए भी उसमें उपाय किया जाता है। इससे इनके  आसपास गंदगी नहीं होती और पानी का समुचित प्रबंधन होता है।
स्वच्छता अभियान में भी पीछे नहीं
सीतामढ़ी स्वच्छता अभियान में भी पीछे नहीं है। यहां की चार पंचायतों को खुले में शौच से मुक्त किया गया है। यहां की सिरोली, मरपा, हरिहरपुर, नानपुर दक्षिणी पंचायत को यूनिसेफ और जिला प्रशासन के सहयोग से यह उपलब्धि हासिल हुई है। इन पंचायतों में जगह-जगह शौचालय बनवाए गए है, ताकि लोगों को खुले में शौच जाने के लिए मजबूर न होना पड़े। साथ ही इसके लिए लोगों को जागरूक भी किया गया है।

शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

जंगलराज पर सुप्रीम कोर्ट का फुल स्टाप

बिहार में 10 सालों के सुशासन के बाद एक बार फिर जंगलराज की बात हो रही है। कहा जा रहा है कि सूबे में जंगलराज की वापसी हो गई है। ऐसा कहने वालों के अपने तर्क भी हैं। करीब छह महीने के ही लालू-नीतीश के शासन में जिस तरह से एक के बाद एक हत्या की घटनाएं हुई हैं, उससे हर कोई दहल गया है। शहाबुद्दीन अगर जेल में रहने के बाद भी अपने गुर्गोें से हत्या जैसी घटना करा सकते हैं तो बाहर गए हैं तो क्या कुछ हो सकता है समझा जा सकता है। जितने भी मामले उनके उपर चल रहे हैं, उसमें गवाहों की हत्या से लेकर पुलिस प्रशासन से मिलीभगत का सबूतों को नष्ट करना तो उनके बाएं हाथ का खेल है। उस स्थिति में जब उनके उपर लालू का हाथ है।
शहाबुद्दीन की जमानत को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया। उन्हें बीते 7 सितंबर को पटना हाईकोर्ट ने जमानत दिया था। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद शहाबुद्दीन ने सीवान हाईकोर्ट में सरेंडर किया और उन्हें जेल भेज दिया गया। चंद्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदाबाबू के तीन बेटों की हत्या के मामले की पैरवी मशहूर वकील प्रशांत भूषण ने की। सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इस बात से भी नाराजगी जताई कि मौजूदा मामले में भी राज्य सरकर ने हाइकोर्ट के सामने पूरे साक्ष्य नहीं रखे और दो भाइयों की हत्या के मुकदमे में पैरवी में भी ढिलाई बरती। वैसे शहाबुद्दीन की जमानत को लेकर नीतीश कुमार ने सिर्फ हायतौबा मचाया। समय रहते कोर्ट मंें ठीक से पक्ष नहीं रखा। तय समय में हाईकोर्ट में मामले को जिस तरह से रखना था, नहीं रखा। इससे साफ है कि इसमें आपसी मिलीभगत है। खासतौर से कुर्सी के लिए वे लालू प्रसाद के आगे सरेंडर कर चुके हैं। क्योंकि शहाबुद्दीन ने जेल से बाहर आते ही नीतीश पर करारा जुबानी प्रहार किया। उन्हें अपना नेता मानने से इंकार कर दिया। कहा, उनके नेता लालू हैं। नीतीश तो महज परिस्थितियों के मुख्यमं़त्री हैं। इसी तरह का बयान राजद नेता रघुवंश प्रसाद ने दिया। तो लालू के खास माने जाते हैं।
अब यह समझने वाली बात यह है कि बिहार के शासन में चल क्या रहा है़। जिस जंगलराज के खौफ से यहां की जनता ने लालू को सत्ता से बाहर किया था, गठजोड़ की राजनीति से लालू राज्य को उसी ओर ले जा रहे हैं। पूरे बिहार, खासतौर से सिवान में तो शहाबुद्दीन को लेकर खौफ का वातावरण है। उनके बाहर निकलते के दूसरे दिन ही रंगदारी को लेकर दो लोगों की हत्या कर दी गई थी;
 11 साल से कैद के बाद शहाबुद्दीन को भागलपुर सेंट्रल जेल से 10 सितंबर को रिहा किया गया था। पटना हाईकोर्ट ने राजीव रोशन हत्या मामले में जमानत दी तो उनके बाहर आने का रास्ता साफ हुआ। शहाबुद्दीन पर कुल हत्या सहित कुल 39 मामले चल रहे थे। 38 में उन्हें पहले से ही जमानत मिल गई थी। जब उन्हें एक के बाद एक मामलों मेें जमानत दी जा रही थी तो नीतीश कुमार कहां थे। जांच एजेंसी और सरकार इस बारे में क्या कर रही थी। पुख्ता सबूत और गवाह क्यों नहीं जुटाए गए। लेकिन यह सब इसलिए नहीं किया गया ताकि शहाबुद्दीन बाहर आ सकें। इसमें नीतीश का हाथ होने से इंकार नहीं किया जा सकता। ऐसा विशेषज्ञों का मानना है। उनका कहना है कि राज्य सरकार ने लापरवाही से शहाबुद्दीन के मामलों को लिया। सवाल यह उठाया जा रहा है कि नीतीश ने किस दबाव में यह काम किया।
रिहाई की स्क्रिप्ट पर फिरा पानी 
शहाबुद्दीन की रिहाई की स्क्रिप्ट तो पहले ही लिखी जा चुकी थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर पानी फेर दिया। लालू के साथ जब नीतीश ने मिलकर चुनाव लड़ा तभी से यह तैयारी चल रही थी। सरकार बनने के कुछ ही महीने बाद लालू ने शहाबुद्दीन को अपनी पार्टी में महत्वपूर्ण पद देकर यह संकेत साफ कर दिया। लालू ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उनके जरिए वे मुसलमानों के वोट को अपनी ओर करना चाहते हैं। सिर्फ सत्ता के लिए गुंडों का सहारा लेना लालू के लिए पुरानी बात नहीं है। शहाबुद्दीन से मिलने सिवान जेल में राजद के एक मंत्री भी पहंुचे थे। उसका वीडियो और फोटो मीडिया में सामने आया था। उस समय नीतीश ने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की। उन्हें सुशासन इतना ही प्रिय था तो उस मंत्री को पद से क्यों नहीं हटाया। हटाते कैसे सत्ता की मलाई हाथ से जो चली जाती। जनता भले ही पिसे, जंगलराज में धन-दौलत और इज्जत गंवाए, लेकिन सत्ता हाथ से नहीं जाना चाहिए। यही कारण रहा कि नीतीश लालू के किसी कदम का विरोध नहीं कर रहे हैं। सत्ता की असली चाबी तो लालू के पास है, उसे जिस तरह चाहते हैं, घुमाते रहते हैं।    
 वैसे देखा जाए तो भाजपा के साथ भी नीतीश ने 10 साल तक शासन किया। उस समय के शासन की व्यवस्था को लोग आज भी सुशासन के नाम से पुकारते हैं। इसके पीछे कारण भी है। नीतीश ने गुंडों को जिस तरह से सफाया कराया, फास्र्ट टैक कोर्ट से सजा दिलाई, वह देश के अन्य राज्यों के लिए किसी मिसाल से कम नहीं था। तब भाजपा सत्ता में सहयोगी थी, लेकिन नीतीश खुलकर काम करते थे और फैसले लेते थे। इस बार सत्ता वो चला रहे हैं और फैसला लालू लेते हैं। वे जो चाहते हैं, होता वही है। मीडिया में सिर्फ बयान दिया जाता है नीतीश के नाम पर।
दहशत का नाम शहाबुद्दीन 
शहाबुद्दीन दहशत का दूसरा नाम है। इसका उदाहरण बस इतने से समझा जा सकता है कि जेल से रिहा होने के बाद शहाबुद्दीन के साथ 300 से अधिक गाड़ियों का काफिला साथ में चला। टोल प्लाजा वालों में इस तरह से खौफ छाया हुआ था कि किसी ने हिम्मत तक नहीं की कि किसी भी गाड़ी से टोल वसूल सके। यह तो बस उदाहरण मात्र है। शहाबुद्दीन की रिहाई के समय कैफ नामक वह शूटर भी स्वागत में पहुंचा, जिसकी तलाश पत्रकार हत्याकांड में पुलिस कर रही थी। उसकी फोटो लालू के बेटे के साथ भी सामने आई। अब सवाल यह उठता है कि जिस बदमाश को हत्या में पुलिस तलाश रही है वह खुलेआम स्वागत में पहुंचता है और उसे पकड़ा नहीं जाता। इसे क्या कहा जाएगा। इससे साफ है कि सत्ता में बैठे लोग, पुलिस और प्रशासन अपराधियों के साथ मिलकर राज्य की आम जनता को जीने नहीं देना चाहते हैं।  
वैसे अपराध जगत में पहली बार 1980 में शहाबुद्दीन का नाम आया। इसके बाद उसने बीजेपी की रथ यात्रा से मोर्चा लिया। 1986 में शहाबुद्दीन के खिलाफ पढ़ाई के दौरान उसके खिलाफ पहला मुकदमा दर्ज हुआ। सिवान के हुसैनगंज थाने का शहाबुद्दीन ए श्रेणी का हिस्ट्रीशीटर अपराधी है। बिहार से जुड़े अपराधियों कि मानें तो जब मुकदमे बढ़े तो शहाबुद्दीन ने लालू से पनाह मांगी। लालू ने उसे युवा दल में शामिल करने के साथ चुनाव लड़ने के लिए टिकट भी दे दिया। वह पहली बार 1995 में ही चुनाव जीत गया। विधानसभा के बाद अगला चुनाव सांसद का लड़ा और जीता। लालू के बढ़ते वर्चस्व के साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में शहाबुद्दीन का आतंक बढ़ गया। पुलिस डरने लगी। हत्याएं होती गईं और शहाबुद्दीन के खिलाफ दर्ज केस समाप्त होते गए। एक समय यह था कि इंस्पेक्टर तक शहाबुद्दीन के रहमोकरम पर वर्दी पहनते थे। शहाबुद्दीन खुलेआम पुलिस वालों की पिटाई तक करने से बाज नहीं आता था। एक बार तो उसने पुलिस पर फायरिंग भी कर दी। 16 मार्च  2001 में पुलिस शहाबुद्दीन के चेले मनोज कुमार पप्पू को वारंट के साथ गिरफ्तार करने पहुंची तो वहां आए डीएसपी संजीव कुमार को शहाबुद्दीन ने थप्पड़ जड़ दिया और उसे गिरफ्तार नहीं करने दिया। इसके बाद पुलिस ने शहाबुद्दीन पर ही केस दर्ज कर दिया। 2005 में सिवान के एसपी रतन संजय ने जब शहाबुद्दीन के प्रतापपुर घर पर छापा मारा तो उसके घर से एके 56 लेजर गाइडेड गन और नाइट विजन कई हथियार बरामद हुए। इन हथियारों पर पाकिस्तान की मुहर लगी थी। बिहार के डीजीपी ने केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट में इस बात से अवगत कराया की शहाबुद्दीन के संबंध पाकिस्तान से है। इस मामले में शहाबुद्दीन के खिलाफ अलग-अलग मामलों में 8 मुकदमे बिहार पुलिस ने दर्ज किए। इत्तेफाक से शहाबुद्दीन का केंद्र में कांग्रेस की सरकार ने लालू यादव की वजह से सपोर्ट किया और शहाबुद्दीन आकर दिल्ली के उनके आवास में छिप गया। बताया जाता है कि तीन महीने तक दिल्ली पुलिस के पास शहाबुद्दीन की गिरफ्तारी का वारंट होने के बाद भी वह हाथ पर हाथ धरके बैठी रही। इसके बाद बिहार पुलिस ने बिना दिल्ली पुलिस की मदद से शहाबुद्दीन को गिरफ्तार कर लिया।
पत्नी के चुनाव में हारने के बाद 9 हत्याएं
2004 में होने वाले आम चुनाव से पहले शहाबुद्दीन ने सीपीआई के एक कार्यकर्ता का अपहरण किया था, उसका पता आज तक नहीं चला है। पकडे़ जाने पर शहाबुद्दीन अस्पताल में भर्ती हो गया। वहीं से उसने अपना चुनाव लड़ा। बताया जाता है कि उसके गुर्गों के आदेश पर सिवान के एक-एक दुकानदार ने अपनी दुकान में उसकी फोटो तक लगा डाली और चुनाव भी जीता। रिपोर्ट के मुताबिक उधर 14 साल बाद जदयू के प्रत्याशी ओमप्रकाश यादव ने जब बिहार के डॉन की पत्नी को चुनाव हराकर 2 लाख वोटों से जीते तो लोगों में एक उम्मीद की किरण जागी थी। शहाबुद्दीन अपनी पत्नी की हार बर्दाश्त नहीं कर सका। उसने अपने गुर्गों के जरिये जदयू नेता को समर्थन कर रही जनता की पिटाई शुरू कर दी। इतना ही नहीं भाटापोखर गांव में रहने वाले पंचायत मुखिया हरिंदर कुशवाहा को सरकारी कार्यालय में ही गोलियों से छलनी कर हत्या कर दी। इसके बाद जदयू नेता ओम प्रकाश यादव के घर पर ताबड़तोड़ सैकड़ों राउंड फायरिंग कर पूरे घर पर गोलियों के ही निशान बना डाले। सिवान के इस डॉन पर 34 मुकदमे चल रहे है, जिसमें 302 और 307 के सबसे अधिक मामले हैं।
शहाबुद्दीन को क्यों हुई थी उम्रकैद
2006 में जब बिहार में बीजेपी की सरकार बनी और नीतीश कुमार सीएम बने। तब उन्होंने ऐसे अपराधियों के लिए एक स्पेशल कोर्ट बना दी। बिहार के बढ़े माफिया सूरजभान  प्रभुनाथ समेत शहाबुद्दीन पर 8 हत्या और 20 मुकदमे 307 के चल रहे थे। बताया जाता है कि साल 2006 में जिस अदालत में यह केस चल रहा था उसके जज बीबी गुप्ता को ही शहाबुद्दीन ने जान से मारने की धमकी दे डाली। बाद में हाईकोर्ट को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा। मई 2007 में छोटेलाल के अपहरण में शहाबुद्दीन को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। तब से शहाबुद्दीन जेल में बंद रहा।
शहाबुद्दीन पर मामले
चर्चित तेजाबकांड (दो भाइयों की हत्या)
छोटेलाल अपहरण कांड
एसपी सिंघल पर गोली चलाना
आम्र्स एक्ट
जीरादेई थानेदार को धमकाना
चोरी की मोटरसाइकिल बरामद
माले कार्यालय पर गोली चलाना
राजनारायण का मामला
दारोगा संदेश बैठा के साथ मारपीट
डीएवी कॉलेज में बमबारी
सूता फैक्ट्री के मामले
एक अन्य मामले

रविवार, 28 अगस्त 2016

जल प्रलय

बिना बारिष अगर बाढ़ आ जाए तो आप इसे बदकिस्मती ही कहेंगे। यही बिहार के साथ भी हो रहा है। यहां आई बाढ़ की चर्चा पूरे देष में हो रही है। हाल यह है कि राजधानी पटना तक इसकी चपेट में है। लाखों लोग इसके चलते बेघर हुए हैं। बचाव में एनडीआरएफ के साथ अन्य टीमें लगी हुई हैं। अगर हम इस आपदा की तह में जाएं तो यह प्राकृतिक कम, इंसान जनित ज्यादा है। जिस समय बिहार बाढ़ की त्रासदी झेल रहा है, उस समय बारिष का नामोनिषान नहीं है। हालात सूखे जैसे हैं, लेकिन मध्य प्रदेष और नेपाल की नदियों से आए पानी ने यहां तबाही मचा दी। फिलहाल राजधानी पटना पर भी बाढ़ का गंभीर खतरा मंडरा रहा है। राज्य के 12 जिलों के लाखों लोग बाढ़ की चपेट में हैं।
   कोसी नदी को बिहार का वैसे ही षोक कहा जाता है। लेकिन इस बार गंगा षोक का कारण बनी हुई है। इसका कारण फरक्का बराज है। इस समस्या की गंूज प्रधानमंत्री तक मुख्यमंत्री नीतीष कुमार ने पहुंचाई है। उन्होंने इसके समाधान की मांग की है। आष्वासन तो मिला है, लेकिन कितना अमल हो पाता है, यह देखने वाली बात होगी। फरक्का बांध की वजह से गंगा की तलहटी में गाद भर गया है। इस कारण उथली गंगा का पानी उसके तटों को पार करते हुए रिहायषी इलाकों में तबाही मचा रहा है। मध्य प्रदेष में भीशण बाढ़ की वजह से वहां का पानी गंगा में आकर मिला। फिर क्या था तबाही का सिलसिला षुरू हो गया। उजड़ने का क्रम चालू हो गया। जो गंगा के किनारे बसे थे, बाढ़ ने सिर्फ उन्हें ही नहीं सताया बल्कि उन जगहों पर भी गंगा का पानी पहुंच गया, जहां के लोगों ने सोचा नहीं था।  इसका कारण खोजने पर कुछ लोगों ने फरक्का बांध का माना। विषेशज्ञों का मानना है कि पष्चिम बंगाल में बने फरक्का बराज से बाढ़ का पानी टकराता है तो उसका उलटा प्रवाह षुरू हो जाता है। यानी की पानी समुद्र में मिलने की जगह वापस बिहार की तरफ आने लगता है। इससे गंगा के अलावा उसकी सहायक नदियों कोशी और गंडक में भी पानी काफी बढ़ जाता है। इस समय की स्थिति कुछ ऐसी ही है। इस समय बाढ़ के चलते राजधानी पटना के अलावा भागलपुर, मुंगेर, खगड़िया, बेगुसराय, समस्तीपुर, हाजीपुर और छपरा तक जल प्रलय जैसी स्थिति है। खेत डूब गए हैं। फसलें बर्बाद हो गई हैं। इसके साथ ही लोगों के घर पानी में समा गए है। आषियाने उजड़ गए हैं। जगह-जगह लोग गंगा और उसकी अन्य नदियों की बाढ़ की मार झेल रहे हैं।
     वैसे देखा जाए तो बिहार में गंगा गंगोत्री से निकलते हुए बिहार तक पहंुंचती है। यहां से पष्चिम बंगाल होते हुए समुद्र में मिल जाती है। गंगोत्री से गंगा का जो षुद्व जल चलता है वह बिहार तक आते-आते मैला हो जाता है। भीलंगना से लेकर कन्नौज और कानपुर में गंगा पर बने बराज तक गंगा के पानी का औशधी वाला तत्व समाप्त हो जाता है। गंगा बिहार में बक्सर के पास यूपी के बलिया जिले से होती हुई प्रवेश करती है। उस समय तक गंगा में चंबल और कर्मनाशा जैसी छोटी नदियों के पानी के साथ बनारस समेत कई शहरों का कूड़ा- कचरा और मैला पानी भी उसमें होता है। गंगा बिहार में घाघरा, गंडक और कोसी जैसी नदियों का पानी लेकर बंगाल की तरफ बढ़ती है तो वहां फरक्का बराज में उसे रोक दिया जाता है। इसके चलते गगोत्री से लेकर यहां तक आया सिल्ट बिहार में पूरी तरह से जमा हो जाता है। यही कारण है कि बिहार में गंगा की गहराई काफी कम हो गई है। इसके चलते उसकी पेटी में इतना सिल्ट जमा हो गया है कि उथली गंगा मचलती हुई अपने तटबंधों को तोड़कर रिहायषी इलाकों में कहर ढाती जाती है। विषेशज्ञ बताते हैं कि नदियों में आए सिल्ट ने फरक्का बांध के निकास द्वारों में आधे से अधिक को पाट दिया है। गंगा का पानी बांध के पास पानी जमता व फैलता है। इस तरह पानी का उलटा प्रवाह बिहार की तरफ होने लगता है।
इसके अलावा बिहार की अन्य नदियां जो गंगा में मिलती हैं, वे अपना सिल्ट उसमें डालती हैं। यानी गंगा इंसानों के साथ सभी नदियों का पाप ढोने का काम करती है। भगीरथी की गंगा इसी कारण मैली है। और वह बहने के लिए अविरल रास्ता नहीं पाती है तो रौद्र रूप में कहर ढाती है। हमें इस बात को समझना होगा कि गंगा को हम माता तो कहते हैं, लेकिन जिस तरत से माता का ख्याल रखना चाहिए, नहीं रखते है। उसका इस्तेमाल करते हैं और अपनी गंदगी उसमें डाल मौन हो जाते हैं।
वैसे तो गंगा अपने शुद्ध और औशधीयुक्त पानी के लिए जानी जाती है। वैज्ञानिक षोध में भी यह पता चला है कि इस नदी के जल में बैक्टीरियोफेज नामक जीवाणु होते हैं, जो विषाणुओं और अन्य हानिकारक सूक्ष्म जीवों को खत्म कर देते हैं। देखा जाए तो पहाड़ों पर तेज धारा के चलते नदियों का वेग बहुत अधिक होता है। इसी प्रचंड वेग में उसका पानी स्वयं शुद्ध होता है। लेकिन गंगा जैसे-जैसे ऋशिकेष और हरिद्वार से दूर होती जाती है, उसके प्राकृतिक गुण खत्म होते जाते हैं। कानपुर में तो यह गंगा बीमारी देने वाला हो जाती है। हालांकि इलाहाबाद तक गंगा पहुंचती है तो उसमें यमुना के माध्यम से चंबल का पानी आता है तो कुछ साफ रहता है, फिर भी पीने लायक तो नहीं ही होता है। बिहार में गंगा का कटाव जून में ही आरम्भ हो जाता है। उससे बचाव के लिये स्पर बनाए जाते हैं, जो काम नहीं करते। वैसे गंगा पर बिहार में 596 किलोमीटर लम्बे तटबन्ध बने हैं। जो अन्य तटबन्धों की तरह संकटग्रस्त हैैं। वैसे बाढ़ के चलते बिहार में हर साल होने वाली क्षति का आकलन किया जाए तो पता चलता है कि करीब एक हजार करोड़ से अधिक का नुकसान होता है।

तोड़ दो फरक्का बांध 
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बाढ़ को लेकर प्रधानमंत्री से मिले। उन्होंने फरक्का बांध को बिहार में आने वाली बाढ़ के लिए जिम्मेदार ठहराया। कहा कि केंद्र सरकार इस बांध को तोड़े या फिर गाद प्रबंधन के लिए ठोस नीति बनाए। नीतीश ने बताया कि फरक्का बांध बनने से पहले बिहार में बाढ़ की हालत इतनी खराब नहीं होती थी। वर्ष 1975 में बांध के शुरू होने के बाद से गंगा की तलहटी में लगातार गाद जमा हो रहा है। इस वजह से उसकी गहराई कम हो गई है। नतीजतन बरसात में कुछ दिनों की बारिश में ही गंगा उफनाने लगती है। वह बीते लगभग एक दशक से बिहार केंद्र के समक्ष यह मुद्दा उठाता रहा है, लेकिन गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। उनका कहना है कि नदी से गाद साफ करने का एकमात्र तरीका यही है कि फरक्का बांध को तोड़ दिया जाए। अगर केंद्र के पास इसके अलावा दूसरा कोई विकल्प है तो उस पर काम करना चाहिए। उन्होंने कहा था कि इससे जितना फायदा है उससे कहीं ज्यादा नुकसान। उन्होंने केंद्रीय आपदा प्रबंधन और जल संसाधन विभाग के अधिकारियों से बिहार में गंगा की गहराई की जांच करने को कहा है.
फरक्का बांध
वर्ष 1975 में पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में गंगा पर बना 2.62 किलोमीटर लंबा फरक्का बांध शुरू से ही विवादों में रहा है। इसेे बनाने का एकमात्र मकसद गंगा से 40 हजार क्यूसेक पानी को हुगली में भेजना था ताकि कोलकाता से फरक्का के बीच बड़े जहाज चल सकें। इसमें 109 गेट बने हैं। तब यह सोचा गया था कि इस पानी से कोलकाता बंदरगाह में जमा होने वाली गाद बह जाएगी और यह दोबारा काम लायक हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कोलकाता बंदरगाह की हालत अब भी जस की तस है। उल्टे इस बांध के चलते भारत व बांग्लादेश के बीच भी विवाद है। यहां से बांग्लादेष महज 16 किलोमीटर दूर हैं। वह इस बांध के औचित्य पर पुनर्विचार करने की मांग लगातार कर रहा है। देखा जाए तो हुगली नदी में गाद जमने की समस्या बहुत पुरानी है। 19वीं सदी में सर आर्थर काटन ने पहली बार ऐसा बांध बनाने का सुझाव दिया था। आजादी के बाद ऐतिहासिक कोलकाता बंदरगाह गाद की समस्या के चलते लगातार बदहाली की ओर बढ़ता रहा। एक दौर ऐसा भी आया जब पानी की गहराई कम होने से बड़े जहाज कोलकाता तक नहीं पहुंच पाते थे। उसी दौरान सर आर्थर काटन के सुझावों पर नए सिरे से विचार करते हुए फरक्का में बांध बनाने का फैसला किया गया। विशेषज्ञ बताते हैं कि फरक्का बांध हुगली के मुहाने से गाद साफ करने के अपने मकसद में नाकाम रहा है। कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट के अनुसार फरक्का बांध बनने से पहले हुगली में गाद जमा होने की रफ्तार 6.40 मिलियन क्यूबिक मीटर सालाना थी जो अब बढ़कर सालाना 21.88 मिलियन क्यूबिक मीटर तक पहुंच चुकी है।
दूसरी ओर बांग्लादेश की इसे लेकर अपनी समस्या है। वहां के विशेषज्ञ कहते हैं कि यह बांध बांग्लादेश में गाद का बहाव तो रोकता ही है गंगा के पानी को भी बांग्लादेश के डेल्टा से दूर कर देता है। आरोप है कि जल बंटवारे पर संधि के बावजूद उसे गंगा से उतना पानी नहीं मिल पाता, जितना मिलना चाहिए।
वैसे देखा जाए तो फरक्का बराज का पहला शिकार पश्चिम बंगाल का मालदा और मुर्शिदाबाद जिला होता है। मालदा में 55 किलोमीटर और मुर्शिदाबाद में 104 किलोमीटर किनारा कटाव का शिकार है। पचासों हजार हेक्टेयर जमीन गंगा के गर्भ में समा गई है। ढाई लाख से अधिक लोग बेघर हुए हैं। मालदा के सामने गंगा पार साहेबगंज जिले (झारखण्ड) में निकली नई जमीन पर दो-ढाई लाख कटाव पीड़ितों की बस्ती पनप गई है। इस तरह की हालत बिहार में गंगा की लम्बी धारा के दोनों तटों पर जगह जगह है।

कोसी का कहर
बिहार के कई जिलों में आई भीषण बाढ़ से 30 लाख से ज्यादा लोग प्रभावित हैं। राज्य में नेपाल से आने वाली कोसी नदी के तटबंध 18 अगस्त को टूट गए थे, जिससे नदी में उफान आ गया। इसने कई जिले को डुबो दिया। बिहार के सुपौल, अररिया और मधेपुरा जिले में बाढ़ से भारी तबाही हुई है। इन तीनों जिलों की सीमाएं नेपाल से मिलती हैं। इस बाढ़ से लाखों हैक्टेयर जमीन पर फसल तबाह हो गई है। वैसे इस बाढ़ से कुल 15 जिले प्रभावित हुए हैं। कहा जा रहा है कि कोसी नदी ने धारा बदल ली इसलिए बिहार में प्रलयंकारी बाढ़ की स्थिति पैदा हुई है। लेकिन सच्चाई यह है कि नदी ने खुद धारा नहीं बदली, प्राकृतिक धारा को रोक कर बनाए गए बांध या तटबंध के टूटने के कारण ये स्थिति पैदा हुई है। अब जब अतिरिक्त पानी के दबाव में तटबंध का जो हिस्सा टूटेगा उसी से होकर नदी बहेगी। 18 अगस्त को बांध टूटा तो पानी का बहाव महज एक लाख 44 हजार क्यूसेक था। कोसी पर बना तटबंध सात बार टूट चुका है और बाढ़ से तबाही पहले भी हुई है। वर्ष 1968 में तटबंध पांच जगहों से टूटा था। उस समय पानी का बहाव नौ लाख 13 हजार क्यूसेक मापा गया था। हालांकि पहली बार 1963 में तटबंध टूटा था। 1968 में कोसी तटबंध बिहार के जमालपुर में टूटा था और सहरसा, खगड़िया और समस्तीपुर में भारी नुकसान हुआ था। नेपाल में यह तटबंध 1963 में डलबा, 1991 में जोगनिया और इस वर्ष कुसहा में टूट चुका है। बांध टूटने का एक बड़ा कारण कोसी नदी की तलहटी में तेजी से गाद जमना है।
कोसी की विनाशलीला अब तक नौका दुर्घटना एवं अन्य घटनाओं में मधेपुरा में 54, सुपौल में 18, भागलपुर में 7, पश्चिम चंपारण के बगहा में 4, पूर्णिया और समस्तीपुर में 3-3 लोगों की मौत हो चुकी है। बाढ़ से अब तक 93 लोगों की मौत हो चुकी है, वहीं 30 लाख से अधिक की आबादी प्रभावित है। 400 से अधिक गांव डूब गए हैं।


शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

नाक के नीचे नक्सल

आतंकवाद की बात तो बहुत की जाती है। लेकिन देश में नक्सली समस्या की ओर ठीक से ध्यान नहीं दिया जा रहा है। अपने ही लोग जो हक के लिए बंदूक थामे जवानों पर हमले करते हैं। उनकी जान लेते हैं। लाल सलाम के नाम पर खून बहाते हैं, उनको मुख्य धारा में जोड़ने के लिए अभी तक ठीक से काम नहीं हो सका है। हाल ही में बिहार के औरंगाबाद में जो नक्सली घटना हुई, वह चैंकाने वाली है। ऐसा इसलिए क्योंकि इसमें नक्सली वारदात को अंजाम देने के लिए बच्चों का इस्तेमाल किया गया। यह कितनी चिंताजनक बात है कि खिलौने से खेलने-खाने और पढ़ने की उम्र में बच्चों को लोगों की जान से खेलना सिखाया जा रहा है। यह किसी दुर्भाग्य से कम नहीं है। उन रणनीतिकारों, सत्ता पर काबिज लोगों को सोचने की जरूरत है कि आजादी के इतने साल बाद भी हम कहां पर हैं। आखिर देश को कहां ले जा रहे हैं।
गया और औरंगाबाद सीमा से सटे मदनपुर थाना क्षेत्र स्थित सोनदाहा जंगल में भाकपा माओवादी नक्सलियों ने 19 जुलाई को सीरियल आईईडी विस्फोट किया, जिसमें सीआरपीएफ के कमांडों दस्ता कोबरा के 12 जवान शहीद हो गए। घटना उस समय हुई जब औरंगाबाद एसपी बाबूराम के नेतृत्व में नक्सलियों के खिलाफ पहड़तली इलाके में सर्च आपरेशन चल रहा था। 205 बटालियन कोबरा के कमांडो जवान इसमें लगेे थे। डुमरी नाला से गुजरने के दौरान नक्सलियों ने सड़क में लगाए आईईडी बम को तार के सहारे विस्फोट कर दिया। बताया जाता है कि नक्सलियों ने 25-30 विस्फोट किए। इसके पहले मुठभेड़ में जवानों ने चार से अधिक नक्सलियों को भी मार गिराया और कुछ घायल भी हुए थे। खराब मौसम के कारण जंगल में फंसे घायल जवानों को 10 घंटे तक चिकित्सकीय सुविधा नहीं मिल सकी। हेलीकॉप्टर जंगल भेजा गया, लेकिन बारिश के कारण उतर नहीं सका। गया से एंबुलेंस रवाना की गई।
इस घटना के बाद हड़कंप मच गया। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से बात की और पूरे घटनाक्रम की जानकारी ली। गृहमंत्री ने मुठभेड़ में शहीद हुए जवानों के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त की।
एडीजी हेडक्वार्टर सुनील कुमार ने बताया कि इससे पहले नक्सलियों ने औरंगाबाद एसपी बाबूराम को जान से मारने की धमकी दी थी। इसके बाद सर्च आपरेशन चलाया गया। नक्सलियों की घेराबंदी के लिए सीआरपीएफ की एलिट कमांडो फोर्स कोबरा के जवान सोनदाहा पहुंचने वाले थे कि उन्हें इसकी भनक लग गई। पुलिस के मुताबिक लगातार मात खा रहे नक्सली बड़ी घटना को अंजाम देने के लिए जंगल में जमा थे। नक्सलियों के जत्थे में पोलित ब्यूरो मेंबर संदीप यादव, जोनल कमांडर नवल भुइयां, रामप्रसाद यादव, अभय यादव, अभिजीत यादव शामिल थे।
मासूमों के हाथ में अंगार
बच्चों को हम मासूम मानते हैं। उन्हें भगवान का रूप समझते हैं। उनकी उंगली पकड़कर अच्छे-बुरे का ज्ञान कराते हैं। लेकिन नक्सलियों को इनसे कोई फर्क नहीं पड़ता। वह भले ही गरीब-गुरबों और शोषितों की लड़ाई लड़ने की बात कहते हों, लेकिन सच्चाई यह है कि लड़ाई वे अपने स्वार्थ की लड़ रहे हैं। इसके लिए वे मासूम बच्चों का भी सहारा लेने से बाज नहीं आ रहे हैं। देश में यह शायद पहली घटना है, जब बिहार के औरंगाबाद में नक्सलियों ने हमले में बच्चों का इस्तेमाल किया है। मासूमों के हाथ में अंगार थमाने का काम नक्सलियों ने जो शुरू किया है, उस पर हमें अभी से सोचते ही जरूरत है। इस पर लगाम कसने की जरूरत है। नही ंतो देश के भविष्य ये बच्चे देश के खिलाफ ही हथियार उठाएंगे। और हम अपने ही लालों के खून से धरती लाल करेंगे। लाल सलाम के नाम पर ऐसा आतंक तो नक्सली डायरी में नहीं देखा गया है।
  कहा जा रहा है कि औरंगाबाद के नक्सली हमले को 10 साल के बच्चों ने अंजाम दिया था। इस कार्य के लिए नक्सलियों ने बाल व महिला दस्ते को लगाया था। एक महिला नक्सली सीआपीएफ जवानों को ललकार रही थी। मुठभेड़ के बाद वापस लौटे सीआरपीएफ के जवानों ने जो कहानी बयां की, उससे रोंगटे खड़े हो गए। जवानों ने बताया कि बाल-दस्ते ने कच्चे रास्ते पर जवानों के पहुंचते ही आईईडी के तार जोड़ दिए। इसके बाद ही धमाके हुए। मुठभेड़ में शामिल सीआरपीएफ जवानों के इस खुलासे ने हड़कंप सा मचा दिया है। अब इन बच्चों की गिरफ्तारी के लिए ऑपरेशन चलाया जा रहा है। औरंगाबाद के एसपी बाबू राम के अनुसार जिस जगह घटना हुई वहां बिहार, बंगाल, उड़ीसा, झारखंड और छत्तीसगढ़ के एरिया कमांडर मीटिंग के लिए जमा थे। इस सूचना पर पुलिस कोबरा बटालियन को साथ लेकर नक्सलियों को घेरने के लिए आगे निकली। बिहार पुलिस आॅपरेशन की अगुआई कर रही थी। जानकारी नक्सलियों को मिली तो उन्होंने डुमरी नाले के पास बिछी बारूदी सुरंग में विस्फोट कर दिया। इसकी जिम्मेदारी बाल दस्ते को दी गई थी। बताया जाता है कि हमले के लिए नक्सलियों ने यह जगह सोनदाहा पहाड़ के भूगोल को देखते हुए चुनी थी। ऊंचाई पर बैठे नक्सली जवानों की हर हरकत आसानी से देख रहे थे। इससे जवान पूरी तरह से अनभिज्ञ थे। बाल दस्ते ने कच्चे रास्ते पर पुलिस के जवानों के पहुंचते ही आईईडी के तार को जोड़ दिया और एक के बाद एक 33 धमाके हो गए।
पढ़ाई नहीं तो हथियार उठाएंगे ही
बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों के नक्सली प्रभावित इलाकों में बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है। यहां शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली आदि परेशानियों का सामना करना पड़ता है। नक्सली हिंसा का प्रभाव यहां के बच्चों पर भी पड़ा है। ये बचपन से किताबों और खिलौनों की जगह हथियारों के बीच पलते हैं। वैसे भी इन राज्यों में नक्सली विद्रोहियों और पुलिस व अन्य सुरक्षा बलों के बीच जारी सशस्त्र संघर्ष के कारण प्राथमिक शिक्षा नहीं मिलती है।
अगर बच्चे स्कूल भी चले जाएं तो नक्सलियों के डर से शिक्षक आते ही नहीं। इतना ही नहीं नक्सलियों ने स्कूल भवनों को तबाह कर दिया या उन पर कब्जा कर लिया है। नक्सली तो स्कूलों पर हमला करते ही हैं, साथ ही सुरक्षा बल भी नक्सलियों के खिलाफ अभियान चलाने के लिए इन स्कूलों का प्रयोग करते हैं। ऐसे में इन इलाकों के बच्चे पढ़े कहां। इस पर न तो कोई विचार किया जा रहा है और किया भी जा रहा है तो उसे ठीक से अमल में नहीं लाया जा रहा है।
वैसे नक्सली दावा करते हैं कि स्कूल पर उनके हमलों से बच्चों की शिक्षा प्रभावित नहीं होती है। वे उन्हीं स्कूलों को निशाना बनाते हैं, जिसे सुरक्षा बल नक्सल विरोधी अभियान के लिए प्रयोग करते हैं। लेकिन ह्यूमन राइट्स वॉच उनके दावों की पोल खोलती है। उसने एक शोध में बताया है कि बिहार और झारखंड के जितने स्कूलों पर हमले हुए उनमें से कम से कम 25 ऐसे हैं जो असुरक्षित थे और हमले के समय सुरक्षा बलों के प्रयोग में नहीं थे। इससे साफ है कि नक्सली अपने फायदे के अलावा कुछ और नहीं सोचते। ऐसा इसलिए क्योंकि नक्सली हमला, लेवी वसूली से उन्हें जितनी रकम मिलती है, उतनी वे अगर मुख्यधारा से जुड़कर कोई काम करें तो नहीं मिलेगी। यही कारण है कि वे हिंसा का रास्ता छोड़ना नहीं चाहते।
वैसे भी नक्सली प्रभावित राज्यों में केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर कई योजनाएं चलाती हैं। शिक्षा के लिए योजनाएं बनाई जा रही हैं। महाराष्ट्र सरकार नक्सली हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में केजी पीजी शैक्षिक केंद्र की योजना पर काम कर रही है। विदर्भ के गढ़चिरौली और गोंदिया जिलों में पायलट आधार पर आवासीय विद्यालय शुरू किए जा रहे हैं। ये आदिवासी छात्रों को बालवाड़ी से स्नातकोत्तर स्तर शिक्षा प्रदान करने का काम कर रहे हैं।
केंद्र सरकार कराएगी जांच
सीआरपीएफ और नक्सलियों के बीच हुए मुठभेड़ की केंद्र सरकार जांच कराएगी। मुठभेड़ के दौरान बिहार पुलिस पर मदद पहुंचाने में देर करने का आरोप लगा है। यह भी आरोप है कि ऑपरेशन की अगुआई करने के बाद बिहार पुलिस पीछे हट गई। पीएम नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ से इस बारे में रिपोर्ट मांगी है। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री हंसराज गंगाराम अहीर का कहना है कि ऑपरेशन के दौरान मदद पहुंचाने में बिहार में लापरवाही की बात सामने आई है। सीआरपीएफ के बड़े अधिकारी औरंगाबाद गए हैं। रिपोर्ट आने का इंतजार किया जा रहा है। बताया जाता है कि नक्सलियों से मुठभेड़ के दौरान कोबरा 205 के डिप्टी कमांडेंट चंदन कुमार ऑफिशियल्स से अपील करते रह गए। उन्होंने कहा कि हेलिकॉप्टर से ग्रेनेड गिराइए। पहाड़ के ऊपर से नक्सली गोला बरसा रहे हैं, उनकी संख्या ज्यादा है। हमारे जवान जख्मी हैं। लेकिन उन्हें मदद नहीं मिली। यहां तक कि जख्मी जवानों को इलाज भी समय से नहीं मिल सका। इसके चलते साथियों की गोद में कई जवानों ने दम तोड़ दिया। बाद में जब शहीद जवानों के शव लेने चॉपर पहंुचा तो डिप्टी कमांडेंट ने आईजी ऑपरेशन कुंदन कृष्णन पर अपनी भड़ास निकाली। कहा, जब जवानों की जान को बचाने के लिए चॉपर की जरूरत थी, तब तो नहीं आया। जब जवान मर गए तो उनकी बॉडी को लेने के लिए चॉपर भेजा है।
पहले भी हो चुके हैं हमले
इस तरह के नक्सली हमले बिहार में पहले भी हो चुके हैं। जुलाई 2015 में नक्सलियों ने बांका में कंस्ट्रक्शन साइट पर हमला किया था। इस हमले में दर्जनों मजदूर घायल हुए थे। घटना को 20 नक्सलियों ने अंजाम दिया था।
 -अप्रैल 2014 में नक्सलियों ने पुलिस की गाड़ी लोकसभा चुनाव के दौरान जमुई के तारापुर में उड़ा दी थी। सुरक्षा बल की गाड़ियों पर बम की बरसात की गई थी। इसमें सीआरपीएफ के दो जवानों की मौत होने के साथ दर्जनों घायल हुए थे।
  -जमुई में धनबाद-पटना इंटरसिटी एक्सप्रेस को जून 2014 में नक्सलियों ने हाईजैक कर लिया था।  जमकर बमबारी और गोलीबारी की थी। दो व्यापारियों की हत्या के साथ दर्जनों यात्री घायल हो गए थे। इसमें लगभग 500 नक्सली शामिल हुए थे।
  -सितंबर 2013 में नक्सलियों ने एसटीएफ जवानों पर हमला बोल दिया था। जिसमें एक जवान की मौत होने के साथ कई गंभीर रूप से घायल हो गए थे।
  -सितंबर  2010 में नक्सलियों ने लखीसराय जिले में 4 पुलिसकर्मियों को बंधक बना लिया था। एक जवान को गोली से छलनी कर शव जिले के चैराहे पर फेंक दिया था।
 -नवंबर 2005 में नक्सलियों ने जहानाबाद जेल में बंद कैदियों को छुड़ाने के लिए हमला कर दिया था। इसमें एक कैदी तथा चार जवान की मौत हो गई थी। 250 कैदी फरार हो गए थे।

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

सपा की मांद में संेध की तैयारी

मुस्लिम मतों की राजनीति करने वाली सपा की मांद में संेध की तैयारी आजकल उत्तर प्रदेष में तेजी से चल रही है। यह काम आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमीन (एआईएमआईएम) ने षुरू की है। अभी से चुनावी मोड में सक्रिय एआईएमआईएम का निषाना बसपा के वोटों पर भी है। तभी तो वह जय भीम, जय मीम (मुस्लिम) के नारों के साथ 2017 के विधानसभा चुनाव अभियान की षुरूआत कर चुकी है। पूर्वांचल के महराजगंज के परतावल में 12 फरवरी की उनकी जनसभा तो इसका महज टेलर है। आगे पूरी पिक्चर जब सामने आएगी तो होष कई दलों के उड़ने निष्चित हैं।
लंबे समय तक आंध्र प्रदेश की सियासत में सक्रिय एआईएमआईएम ने महराजगंज की सरजमीं पर सभा की तो यहां अल्पसंख्यक समुदाय ने हाथों हाथ लिया। यह सभी जानते हैं कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में बिना तैयारी अचानक उतरी पार्टी ने आसानी से दो सीटेें जीत ली थीं। जबकि सपा को मुंह की खानी पड़ी थी। इसके बाद से पार्टी ने अपने विस्तार में लग गई। उसकी पहली नजर उत्तर प्रदेश पर पड़ी। पहले पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन आवैसी ने पूर्वांचल के आजमगढ़ जिले के संजरपुर गांव को गोद लेने की घोषणा की। यह वही गांव है, जहां का युवक दिल्ली के बटला हाउस कांड में पुलिस मुठभेड़ में मारा गया था। वैसे भी आजमगढ़ का नाम अबू सलेम से लेकर आतंकी घटनाओं में यहां से तार जुड़े होने के चलते हमेषा चर्चा में रहता है।
परतावल को सभा करने के लिए इसीलिए चुना गया क्योंकि इसकेे आसपास के 40 गांवों में अल्पसंख्यकों का बाहुल्य है। साथ ही पास से लगे सिद्धार्थनगर, संतकबीरनगर जिले में भी मुस्लिमों की आबादी अच्छी खासी है। सभा में आसपास के जिलों के हजारों लोगों ने भाग लिया। इससे जहां सपा के खेमे में हलचल सी है, वहीं भाजपा के लिए यह किसी षुभ संकेत से कम नहीं है। तभी तो 17 फरवरी को गोरखपुर पहुंचे विष्व हिंदू परिषद के अंतर्राष्टीय कार्यवाह अध्यक्ष प्रवीण भाई तोगड़िया ने कहा कि इससे भाजपा को फायदा होगा।
राजनीतिक विषेषज्ञों का मानना है कि यह सभा यूपी में उसकी उपस्थिति को मजबूत करने के लिए महत्वपूर्ण है। सभा में जिस तरह से मुस्लिम युवा वर्ग षामिल हुआ, वह आने वाले समय के लिए सपा के लिए अच्छा संकेत तो नहीं ही कहा जा सकता। वैसे भी आवैसी की तकरीर अल्पसंख्यक वर्ग के नौजवानों को खूब भाती है और सत्ता सपा से जुड़ीं उम्मीदें पूरी न होने से मुसलमानों का बड़ा वर्ग विकल्प की तलाश में है। इसी विकल्प की बात करते हुए एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली कहते हैं कि सपा मुस्लिमों की हितैषी नहीं है। वह ऐसा ढोंग करके बरगलाती है। उसे मुस्लिम अच्छी तरह से समझ रहा है।
परतावल की सभा की तैयारी को लेकर एआईएमआईएम ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। सिद्धार्थनगर, संतकबीरनगर और गोरखपुर सहित आसपास के जिलों के मदरसों के युवाओं को बुलावा भेजा गया था। सिद्धार्थनगर और महराजगंज में तो कई ऐसे मदरसे हैं, जहां छात्रों की संख्या दो हजार तक है। यहां तक कि पार्टी ने जगह-जगह ओवैसी समेत पार्टी के कई नेताओं की फोटो वाले होर्डिंग लगाए थे। परतावल की सभा में एआईएमआईएम के चारमीनार हैदराबाद के विधायक सैयद अहमद पाषा कादरी ने कहा कि आज भारत में मुसलमानों को दलितों से भी नीच समझा जाता है। यही हालात रहे तो मुसलमानों का आने वाले दिनों में और भी बुरा हाल होगा। लिहाजा उत्तर प्रदेष के मुसलमान एक हो जाएं और आगामी चुनाव में अपने भाई को वोट दें। उन्होंने कहा कि आपने सपा, बसपा, कांग्रेस व भाजपा को देख लिया। सभी दलों ने मुसलमानों के साथ छल किया है। क्योंकि जहां भी मुसलमान भाई रहता है, वफादारी के साथ कार्य करता है। देश के लिए सबसे पहले मुसलमानों ने वफादारी की। लाल किला मुसलमान ने बनवाया, ताजमहल भी मुसलमान ने ही बनवाया। कादरी ने कहा कि प्रदेश सरकार ने अल्पसंख्यकों से किया वादा पूरा नहीं किया। चुनाव में सपा ने उन्हेें 18 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही थी। सरकार बनने के बाद वह उससे पलट गई। उनके प्रदेश में पांच प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है। उर्दू की यहां पर कोई अहमियत नहीं है। उनकी पार्टी इन सबको मुद्दा बनाकर जनता के बीच जाएगी। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी अन्याय और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष करती है। कमजोर और मजलूम की लड़ाई लड़ती है। वह लोग यहां काम करके दिखाएंगे। जिनके साथ अन्याय होगा उनके साथ वह लोग खड़े होंगे। एमआईएम नेता ने कहा कि यहां के लोगों से बात करने पर यहां की अनेक समस्याएं उभर कर सामने आई हैं। संगठन को मजबूत किया जा रहा है। आने वाले समय में प्रदेश के और दौरे होंगे। 2017 के विधानसभा को लक्ष्य बनाकर शुरू चुनावी अभियान में एआईएमआईएम दलितों को भी रिझाने की कोषिष की। बसपा पर प्रहार करते हुए उन्होंने कहा कि यूपी में जब भी बसपा की सरकार बनी तब मुसलमानों को केवल मोहरा बनाया गया। दलितों के आगे इनकी एक भी बात नहीं सुनीं जाती है। दलितों से भी गया गुजरा व्यवहार इनके साथ किया जाता है। प्रदेश में एक बार और बसपा की सरकार बन जाए तो इन्हें खानाबदोश की तरह से रहना पड़ेगा।
कादरी ने इषारों में आजम खां पर निषाना साधते हुए कहा कि यूपी सरकार के एक मंत्री अपने आपको मुसलमानों का मसीहा कहते हैं, लेकिन यूपी में उनके कार्यकाल में जितने दंगे हुए, उसमें बेगुनाह मुसलमान ही मारे गए। पुलिस ने उनके घर को लूटा, लेकिन मुसलमानों के हमदर्द इस मंत्री ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। उन्होंने कहा कि मुसलमानों के लिए हम गर्दन कटवाने को तैयार हैं। उन्होंने अपनी उंगली तक नहीं कटवाई।
हैदराबाद के पूर्व चेयरमैन माजिद हुसैन ने कहा कि सोने की चिड़िया कहा जाने वाले भारत का दुर्भाग्य है कि चाय बेचने वाला देश का प्रधानमंत्री है और झाड़ू बेचने वाला दिल्ली का मुख्यमंत्री। ऐसे में भारत का विकास कैसे होगा। यूपी की अखिलेश सरकार मुसलमान युवाओं का हमदर्द बनने के नाम पर उनका भविष्य खराब कर देती है।
सभा में जो बातें कही गईं और एआईएमआईएम की जो रणनीति है, अगर वह उसमें सफल होती है तो निष्चित तौर पर सपा, बसपा के लिए नुकसानदायक होगा। वह जिस तरह से प्रदेष के आगामी विधानसभा चुनाव को फोकस कर रही, उससे निष्चित ही यहां की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। मुसलमानों के साथ दलित भी उसके एजेंडे में है। क्योंकि वह जानती है कि मायावती से दलितों का मोहभंग हो रहा है। और फिर इन्हें किसी पाले ले जाना बहुत मुष्किल भी नहीं होगा। महाराष्ट्र के चुनाव में दलित और मुस्लिम वोटोें के बल पर ही उसने औरंगाबाद सेंटल और बयाक्युल्ला की सीट पर जीत हासिल की थी। प्रदेष में भी इन्हीं वोटो के सहारे वह अपनी जोरदार षुरूआत करना चाहती है। पार्टी की जो तैयारी है, उसके अनुसार उसने प्रदेष की 100 ऐसी सीटों को चुना है, जहां मुसलमानों की आबादी ज्यादा है। साथ ही दलित वोट भी अच्छी खासी संख्या में है। दोनों एक साथ मिल जाएं तो किसी भी प्रत्याषी की जीत से कोई नहीं रोक सकता है। ये सीटें प्रदेष के 25 जिलों में हैं। ये जिले मुजफ्फरनगर, लखनउ, गाजियाबाद, मेरठ, बुलंदषहर, मुरादाबाद, रामपुर, कानपुर, महराजगंज, गोरखपुर और आजमगढ़ सहित अन्य हैं। इन जगहों पर पार्टी के विस्तार के लिए उसके नेता तेजी से काम कर रहे हैं। गुपचुप बैठकों के साथ सदस्यता अभियान चलाया जा रहा है। पार्टी की नीतियां और रीतियां लोगों को समझाई जा रही हैं।
इसके अलावा पार्टी ने 44 ऐसे जिलों में पार्टी का सदस्यता अभियान और अन्य कार्यक्रम षुरू किया है, जो उसके अगले टारगेट में है। इनमें से प्रत्येक जिले में 500 सक्रिय सदस्यों की फौज खड़ी की जा रही है। ये सदस्य आफिस को रन करने वाले पांच ऐसे लोगों को चुनेंगे, जिन पर लोकल यूनिट को मजबूत करने की जिम्मेदारी होगी। इन जिलों में सपा की मजबूती वाले गढ़ इटावा, मैनपुरी, फिरोजाबाद, कन्नौज के अलावा बिजनौर, मऊ, बाराबंकी, गोंडा, फिरोजाबाद सहित अन्य हैं।
एआईएमआईएम की प्लानिंग इन जिलों में नुक्कड़ बैठक और जलसे करने की है। यह कार्यक्रम भी वहीं होगा जहां मुस्लिम और दलितों की आबादी ज्यादा होगी। पार्टी के लखनऊ जोन के युवा संयोजक षहनवाज हुसैन ऐसी कई बैठकों में भाग भी ले चुके हैं। उनका कहना है कि सपा ने मुसलमानों के साथ किए गए वादों को पूरा नहीं किया है। इसके साथ ही पार्टी सोषल मीडिया और आधुनिक संचार प्रणाली के इस्तेमाल से भी पीछे नहीं हटने वाली है। वह आनलाइन सदस्यता अभियान पर भी काम कर रही है। पार्टी की योजना 12 मार्च को बरेली, 15 मार्च को इलाहाबाद और 22 मार्च को मुरादाबाद में कार्यक्रम करने की है। ये सभी कार्यक्रम 2017 के विधानसभा चुनाव को टारगेट में रखकर किए जा रहे हैं।
फिलहाल देखा जाए तो प्रदेष की राजनीति नई तरफ जा रही है। आगामी विधानसभा चुनाव में अभी ढाई साल हैं। इतने दिनों में एआईएमआईएम को प्रदेष में मजबूत करने का पूरा अवसर है। जब चुनाव होंगे, तब क्या स्थिति होगी, कहा नहीं जा सकता। लेकिन एआईएमआईएम ने कुछ ही सीटों पर मुस्लिम वोटों में सेंध लगा ली तो सपा का बेड़ा गर्क होना तो तय है। भाजपा की बल्ले-बल्ले हो सकती है।

मंगलवार, 6 जनवरी 2015

धर्मांतरण की आग में सुलग रहा प्रदेश

 उत्तर प्रदेश में आजकल धर्मांतरण और घर वापसी को लेकर बवाच मचा हुआ है। आगरा से शुरू हुए घर वापसी के कार्यक्रम में बाद से तो पष्चिम के अलीगढ़ से लेकर पूर्वांचल के कुशीनगर तक धर्म परिवर्तन की लहर सी चल पड़ी है। अधिकतर मामलों ईसाई मिशनरियों और गरीब, दलित हिंदुओं से जुड़े सामने आए हैं। लेकिन तलवारें मुसलमानों और हिंदुओं के बीच खींची हुई हैं। इसके पीछे की पूरी कहानी प्रदेश का आगामी विधानसभा चुनाव है। भाजपा प्रदेश में सत्ता पाने और सपा सत्ता बरकार रखने के लिए यहां की जनता को धर्मांतरण की आग में झुलसा देना चाहती है। दंगे फैलाकर वोटों की धु्रवीकरण की साजिश से भी इंकार नहीं किया जा सकता।
   केंद्र में जिस दिन भाजपा की सरकार बनी उसी दिन तय हो गया था कि हिंदुत्ववाद को बढ़ावा मिलेगा। संघ अपने एजेंडे को लागू कराने के लिए हर तरह से भाजपा पर दबाव बनाएगा। केंद्र सरकार के छह माह पूरे ही हुए थे कि आगरा के वेद नगर बस्ती में आठ दिसंबर को 37 मुस्लिम परिवारों के धर्मांतरण का मामला सुर्खियोें में छा गया। आरएसएस से जुड़े लोगों ने इस धर्म परिवर्तन को घर वापसी नामक चोला पहना दिया। इस तरह की घर वापसी उन्होंने पूरे देश में चलाने की घोषणा कर दी। इसके बाद हाथरस, अलीगढ़, अमेठी, गाजीपुर, महराजगंज, कुशीनगर, गोरखपुर सहित अन्य जगहों पर घर वापसी जैसे कार्यक्रमों की गूंज सुनाई देने लगी। आरएसएस और उससे जुड़े संगठन इसे लेकर तैयारी में लग गए हैं। ये लोग देहात क्षेत्रों में भ्रमण कर रहे हैं। सूत्रों की मानें तो लोगों को ‘घर वापसी’ के लिए राजी कर रहे हैं। साथ भी उनके दिलो-दिमाग से प्रशासन का खौफ भी निकालने की कोषिष की जा रही है। अलीगढ़ प्रशासन की सख्ती के बाद वहां घर वापसी का कार्यक्रम तो टाल दिया गया है लेकिन उसकी गुपचुप तैयारी जारी है।
पूर्वांचल तो पहले से ही गर्म है
घर वापसी कार्यक्रम को लेकर पूर्वांचल में हलचल कम नहीं है। भाजपा सांसद व गोरखपीठ के महंत आदित्यनाथ और उनका संगठन हिंदू युवा वाहिनी इसे लेकर पूरे पूर्वांचल में सक्रिय है। पिछले दिनों कुशीनगर के गंगुआ गांव में पांच हिंदू परिवारों के ईसाई धर्म अपनाने की खबर फैलने के बाद से हियुवा सक्रिय हो गई। इसे लेकर जब बवाल मचना शुरू हुआ तो धर्म परिर्वतन करने वाले तीन परिवार रात में घर छोड़कर चले गए, बचे दो परिवारों के मुखिया ने खुद को हिंदू बताया और ईसाई धर्म में भी आस्था जताई। बताया जाता है यहां गांव के दिलीप गुप्ता ने ही इन लोगों को यीशु की प्रार्थना करने के लिए प्रेरित किया था। उसका दावा था कि इससे उनके दुख और बीमारियां दूर हो जाएंगी। गांव के लल्लन गुप्ता ने बताया कि उसकी मां सनकेसिया देवी को भी दिलीप गुप्ता ने प्रार्थना के लिए राजी कर लिया था। उन्हें विश्वास दिलाया गया था कि वह हिंदू धर्म छोड़ देंगी तो पूरी तरह स्वस्थ हो जाएंगी। गांव के जवाहिर ने बताया कि उनके पड़ोसी प्रभु प्रजापति ने धर्म परिवर्तन किया तो उन्होंने काफी समझाया, लेकिन उन्होंने एक न सुनी। उन्होंने बताया कि एक व्यक्ति अपने घर में ही चर्च बनाकर लोगों के साथ प्रार्थना किया करता था। इस तरह देखा जाए तो जिस तरह आगरा में लालच देकर धर्म परिवर्तन कराया गया, ठीक वही स्थिति कुषीनगर में भी दिखी। यहां फर्क सिर्फ इतना है कि लोगों को बरगलाया गया कि ईसाई बनने से उनकी बीमारियां और दुख खत्म हो जाएंगे। बात कुशीनगर तक की नहीं है। गोरखपुर के पिपराइच में भी कुछ परिवारों के ईसाई धर्म अपनाने की बात 17 दिसंबर को सामने आई। यहां सहभोज में कुछ लोगों को ईसाई बनाने की तैयारी चल रही थी तभी हियुवा के लोग पहुंच गए। बवाल की सूचना पर पहुंची पुलिस ने पूरे कार्यक्रम पर रोक लगा दी। यह सब चीजें अभी चल ही रही थीं कि बस्ती में इसी तरह का मामला सामने आया। यहां भी हियुवा ने हंगामा और प्रदर्षन किया। 17 दिसंबर को बहराइच में 70 लोगों के ईसाई धर्म अपनाने की बात सामने आई। यहां भी जमकर हंगामा मचा। इसके अलावा महराजगंज, गाजीपुर में घर वापसी जैसे कार्यक्रम सामने आए। 18 दिसंबर को महराजगंज जिले के सेमरा में सहभोज कार्यक्रम में शामिल होने जा रहे 87 और गाजीपुर में कथित धर्मांतरण और ‘घर वापसी’ को लेकर हिंदू युवा वाहिनी के प्रदेश अध्यक्ष समेत 112 कार्यकर्ताओं को पुलिस ने गिरफ्तार किया। इस तरह देखा जाए तो पूरा पूर्वांचल धर्म परिवर्तन जैसे मुद्दे को लेकर गर्मा रहा है। यहां अधिकतर मामले ईसाई बनाने को लेकर सामने आ रहे हैं। इसके विरोध में हियुवा खड़ी है जो आरएसएस के साथ मिलकर घर वापसी जैसे कार्यक्रमों पर जोर दे रही है।
घर वापसी कार्यक्रम को लेकर बचे बवाल में सबसे ज्यादा सक्रिय भाजपा सांसद आदित्यनाथ दिख रहे हैं। इस तरह के मामलों पर बयान नहीं देने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नसीहत के कुछ घंटे बाद ही योगी ने घर वापसी कार्यक्रम को सही बताया। उन्होंने सरकार या किसी अन्य को घर वापसी कार्यक्रम में हस्तक्षेप पर चुनौती तक दी है। महंत ने कहा है कि अगर कोई स्वेच्छा से हिंदू बनना चाहता है तो इसमें आपत्ति क्या है। भाजपा के फायर ब्रांड नेता आदित्यनाथ एक हाथ में माला दूसरे में भाला जैसी बातों के लिए भी जाने जाते हैं। रैलियों में वह जमकर हिंदुत्व के जुमले उछालते हैं। उप चुनाव में जगह-जगह हुईं रैलियों में उन्होंने लव जेहाद को लेकर जमकर आग उगला था। कहा था, अगर वे एक हिंदू लड़की का धर्म परिवर्तन करवाते हैं, तो हम सौ मुस्लिम लड़कियों का धर्म परिवर्तन कराएंगे।
दूसरी ओर आरएसएस और  विश्व हिंदू परिषद भी इसे लेकर कम सक्रिय नहीं हैं। विहिप के वरिष्ठ नेता अशोक सिंघल कह रहे हैं कि 800 साल बाद हिंदुओं
गरमाई मुस्लिम सियासत
प्रदेश  में भाजपा और संघ नेताओं की अति सक्रियता और आगरा में मुस्लिम बंगाली परिवारों के कथित हिंदू धर्म में शामिल होने के बाद से मुस्लिम नेता भी सक्रिय हो गए हैं। धर्मांतरण के खिलाफ जगह-जगह धरना, प्रदर्शन और जलसे में भावनाएं भड़काई जा रही हैं। देश  विरोधी बयान भी सामने आ रहे हैं। मुस्लिम नेता भगवा टीम को उन्हीं की भाषा में जवाब देने के की बात कह रहे हैं। 12 दिसंबर को प्रदेश  के अधिकतर जिलों में धर्मांतरण के खिलाफ प्रदर्शन किए गए। मुरादाबाद में धर्मांतरण के खिलाफ जामा मस्जिद के बाहर प्रदर्शन के साथ जलसा का आयोजन हुआ। इसमें इस्लामिक मोर्चा ऑफ इंडिया के संस्थापक मुस्तफा अली ने संसद से लेकर सेना तक को चुनौती दे डाली। जंग छेड़ने की बात कहने वाले मुस्तफा जैसे लोग देश  के लिए कम खतरनाक नहीं हैं। सपा नेता आजम खां भी इस मुद्दे को लेकर सक्रिय हैं। वह कह रहे हैं कि प्रदेश में सहारनपुर और कांठ जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति की कोशिश की जा रही है। यह सब 2017 के विधानसभा चुनाव के लिए हो रहा है। वह सीधा निशाना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फासिस्ट ताकतों पर साध रहे हैं। संघ के नेताओं को मंदिरों और दिलों के दरवाजे खोलने जैसी नसीहत दे रहे हैं।
ओवैसी की सक्रियता और सपा
धर्मांतरण मुद्दे पर छिड़ी जंग में हैदराबाद के सांसद व एआईएमआईएम के अध्यक्ष असादुद्दीन ओवैसी भी कूद गए हैं। उन्होंने संघ से जुड़े हिंदूवादी संगठनों पर रोक लगाने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि मुसलमान आरएसएस और बजरंग दल से डरे नहीं हैं। वैसे ओवैसी का यह बयान यूपी में अपने दल की पैठ बनाने को लेकर है। आजमगढ़ के संजरपुर गांव को गोद लेने की उनकी घोषणा को भी इसी से जोड़कर देखा जा रहा है। याद रहे कि अबू सलेम से लेकर अन्य आजमगढ़ आतंकी घटनाओं के कारण अक्सर अंतराष्टीय स्तर पर सुर्खियों में रहता आया है। यहां मुसलमानों की अच्छी खासी आबादी है। यही कारण है कि मुलायम यहां से लोकसभा चुनाव लड़े और अब ओवैसी ने इसे चुना है। इसके साथ ही उनकी पार्टी की प्रदेष में सक्रियता बढ़ गई है। जगह-जगह एआईएमआईएम को खड़ा करने के लिए बैठकों का दौर षुरू हो गया है। इसमें युवाओं को जोड़ने की खास तरजीह दी जा रही है। पिछले दिनों गोरखपुर में ओवैसी के बैठक करने की चर्चा सामने आई। इसमें काफी संख्या में मुसलमान पहुंचे। बताया जा रहा है कि इस बैठक में कुछ लोगों को पूर्वांचल में एआईएमआईएम के सदस्य बनाने की जिम्मेदारी दी गई। सपा के कुछ मुस्लिम चेहरे भी इस पार्टी की तरफ आकर्षित बताए जा रहे हैं। एआईएमआईएम ने महाराष्ट में पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ते हुए जिस तरह दो सीटें हासिल की थीं, उससे पार्टी का उत्साह बढ़ा है। साथ सपा की मुष्किल। महाराष्ट में सपा के दिग्गज नेता अबू आजमी कोई कमाल चुनाव में नहीं कर सके। उत्तर प्रदेष में एआईएमआईएम की सक्रियता कुछ इसी नजरिये से देखी जा रही है। इससे सपा के साथ आजम खां भी चिंतित हैं। वैसे देखा जाए तो पहले प्रदेष में मुसलमानों को सपा का विकल्प देने के लिए डाॅक्टर अयूब की पीस पार्टी सामने आई थी। लेकिन वह बहुत कुछ कर नहीं सकी। उस पर भाजपा की खड़ी की गई पार्टी का ठप्पा लगाने की कोषिष की गई। लेकिन एआईएमआईएम को लेकर सपा की चिंता बढ़ गई है। वह इसे पीस पार्टी की तरह हल्के में नहीं लेना चाहेगी। खासतौर से उस स्थिति में जब महाराष्ट में वह उसके विकल्प के रूप मेें सामने खड़ी हो चुकी है। वैसे भी आजम खां के बड़बोलेपन के सहारे सपा बहुत दिन तक मुसलमानों को बरगलाकर भी नहीं रख सकती है।
फिलहाल देखा जाए तो कुछ महीने पहले लव जेहाद और अब घर वापसी। यह साफ बताता है कि भगवा खेमा किस तरह पूरी रणनीति के साथ उत्तर प्रदेष की सत्ता में आने के लिए काम कर रहा है। हिंदुत्व की भावना भड़काने के साथ प्रदेष को दंगों की आग में झोंकने की रणनीति से इंकार नहीं किया जा सकता। सपा भी इसमें पूरी तरह से भागीदार कही जा सकती है। तभी मुलायम सिंह यादव में संसद में यह बयान दे डाला कि आगरा में धर्म परिवर्तन जैसी कोई बात है ही नहीं। संघ की राजनीति को बारीकी से समझने वालों की मानें तो इनके जरिये रणनीतिकार समाज की नब्ज और इन मुद्दों का करंट देखना चाहते हैं। जो चल गया या जिससे कुछ मिलने की उम्मीद दिखी, उसे चलाया जाएगा।
कुछ ऐसी है भगवा योजना
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की योजना देश  को हिंदू राष्ट बनाने की है। इसे लेेकर जब तब बयान भी आ रहे हैं। आरएसएस की पहले उत्तर प्रदेष में घर वापसी’ अभियान पर काम कर रही है। इस पर रणनीति बनने लगी है। इस लेकर पूरे प्रदेश में अभियान चलाने की रूपरेखा बनाई जा रही है। जनसंपर्क और जनजागरण कार्यक्रम के तहत इससे लोगों को जोड़ने का काम किया जाएगा। इसी दौरान घर वापसी करने वालों सूची बनेगी। इसके बाद काम आगे बढ़ेगा। बताया जाता है कि इसे लेकर पिछले दिनों लखनऊ स्थित संघ के कार्यालय में बैठक भी हुई। उसमें विभिन्न जिलों के कुछ युवकों ने हिस्सा लिया। अभियान चलाने में धर्म जागरण विभाग, हिंदू जागरण मंच और विश्व हिंदू परिषद की धर्म प्रसार समिति की टोलियां उन लोगों के पास पहुंचेंगी, जो हिंदू बनना चाहते हैं। उन्हें बताया जाएगा कि वह मूल रूप से हिंदू ही हैं। पर, कुछ विशेष परिस्थितियों व मजबूरी के चलते उनके पूर्वजों को इस्लाम धर्म स्वीकार करना पड़ा। इस मजबूरी का दुष्परिणाम देश को भुगतना पड़ रहा है। आरएसएस के धर्म जागरण विभाग के क्षेत्र प्रभारी रामलखन का कहना है कि हम कोशिश कर रहे हैं कि जो लोग वापस हिंदू बनना चाहते हैं, उनकी घर वापसी करा दी जाए।
ने अपना सामाज्य पाया है। उनका कहना है कि अगला विष्व युद्व ईसाइयों और मुसलमानों के बीच होगा। दूसरी ओर इसी तरह बयान आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत दे रहे हैं। वह कह रहे हैं कि ईसाइयों और मुसलमानों के कारण ही  विश्व युद्व होते हैं। घर वापसी और माल वापस जैसी बात की जा रही है।  विश्व

सोमवार, 23 दिसंबर 2013

चुनाव से पहले चढ़ता पूर्वांचल का सियासी पारा

लोकसभा चुनाव की अभी भले ही घोषणा न हुई हो लेकिन इसकी सियासी गर्मी देष में बढ़ती जा रही है। सबसे अधिक लोकसभा सीटोें वाला उत्तर प्रदेश  भी इससे अछूता नहीं है। खासतौर से पूर्वांचल पर सभी दलों की नजरें टिकी हुई हैं। सभी दल यहा रैली कर रहे हैं। जनता को लुभाने के लिए षब्दों के तीर मंचों से चलाए जा रहे हैं। भाजपा हुंकार रैली कर रही है तो सपा देश  बचाओ। कांग्रेस भी इस मुहिम में पीछे नहीं है। राहुल गांधी की अगुवाई में रैलियां की जा रही हैं। 31 अक्टूबर को राहुल गांधीं ने एक ही दिन हमीरपुर और देवरिया जिले के सलेमपुर में रैली की। हमीरपुर की रैली तो सफल नहीं रही लेकिन सलेमपुर में भीड़ खूब जुटी। यह भीड़ भले ही कांग्रेस का वोट न हो लेकिन इसके नेताओं का मनोबल तो बढ़ा ही है।
लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करने के लिए कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी अभी से लग गए हैं। पूर्वांचल उनके खास एजेंडे में है। सलेमपुर में धन्यवाद रैली के साथ उन्होंने लोकसभा चुनाव का बिगुल फूंकते हुए पूर्वांचल के कार्यकर्ताओं में जोश तो भरा। अपने भाषण में उन्होंने न तो केंद्र सरकार की नीतियों का बखान किया और न ही विरोधियों पर जोरदार हमला बोला।
मात्र 12 मिनट के भाषण में राहुल की जुबां पर केवल कई राज्यों में कांग्रेस सरकारों की उपलब्धियां रहीं। उन्होंने अपनी बात में विकास और मनरेगा को केेंद्रित रखा। राहुल ने नरेंद्र मोदी का नाम तक नहीं लिया। जबकि नरेंद्र मोदी को लेकर बाकी नेताओं ने मंच से जमकर हमला बोला। राहुल गांधी ने खाद्य सुरक्षा बिल पर जनता का आहवान किया कि वह इसे लागू करने के लिए प्रदेष सरकार को विवष कर दे। लोग घरों से निकलें अेौर सरकार पर दबाव बनाएं। उन्होंने कार्यकर्ताओं को जिम्मा दिया कि वे गरीबों को सस्ता भोजन उपलब्ध कराने के लिए काम करें। उन्होंने गरीब पूर्वांचल के लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा बिल को महत्वपूर्ण बताया। राहुल गांधी यहां जुटी भीड़ से काफी गदगद दिखे, लेकिन सच्चाई यह है कि बहुत से लोग राहुल गांधी को देखने आए थे। सुनने आए थे। उनका कांग्रेस और उसकी नीतियों से कोई मतलब नहीं था। 1977 में उनकी दादी इंदिरा गांधी भी यहां आ चुकी हैं। बहुत से लोग राहुल की तुलना इंदिरा से करते भी दिखे।
वैसे समाजवादियों के गढ़ सलेमपुर में कांग्रेस ने पूरी सोची समझी रणनीति के तहत रैली का आयोजन किया। पहले रैली 22 अक्टूबर को होनी थी। जगह लार थी। लेकिन बाद में दिन और जगह बदल दिया गया। बिहार से सटे होने के कारण सलेमपुर को रैली के लिए चुना गया। साथ ही इसलिए क्योंकि यहां के महत्वपूर्ण नेता हरिकेवल प्रसाद का पिछले दिनों निधन हो गया। वह लगातार दो बार सपा से सांसद रहे। उसके बाद हरिवंश  सहाय सपा से फिर हरिकेवल सपा से सांसद रहे। अब यह सीट बसपा के कब्जे में है। सलेमपुर में कांग्रेस छह बार परचम लहरा चुकी है। 1989 से सीट उसके हाथ से निकली, उसके बाद से समाजवादियों का वर्चस्व स्थापित हो गया। राजभर और कुशवाहा वोट के चलते पिछड़ी जाति के नेता को जीत मिलती रही। कांग्रेस यहां के जरिए बलिया जिले में भी प्रभाव स्थापित करना चाहती है। सलेमपुर लोकसभा सीट से बलिया जिले का कुछ हिस्सा भी जुड़ा है। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी भोला पांडेय दूसरे स्थान पर रहे थे। उन्हें बसपा के रमाशंकर राजभर ने 18305 वोटोें से पराजित किया था। इस बार रमाशंकर की जगह बसपा ने पूर्व प्रधानमं़त्री चंद्रशेखर के भतीजे रविशंकर सिंह पप्पू को चुनाव में उतारने का मन बनाया है। भाजपा ने चंद्रशेखर के बेटे पंकज शेखर को अपने दल में शामिल कर लिया है। चर्चा है कि इनको भाजपा सलेमपुर से उतार सकती है। ऐसे मंें यह सीट देवरिया से लेकर बलिया तक की राजनीति में दखल रखने वाली साबित होने वाली है। इसका प्रभाव पूर्वांचल की अन्य सीटों पर भी निष्चित ही पड़ेगा।
डुमरियागंज के कांग्रेस सांसद जगदंबिका पाल का कहना है कि पार्टी इस बार भी प्रदेष में बेहतर प्रदर्षन करेगी। पिछली बार के मुकाबले ज्यादा सीटों पर जीत हासिल होगी। गरीबों के लिए षुरू की गई केंद्र सरकार की योजनाएं काफी सफल हैं। इसका फायदा निष्चित ही मिलेगा। सलेमपुर की रैली में उन्होंने भाजपा, सपा और बसपा पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि सपा के शासन में जिस तरह से गुंडई बढ़ी है, उससे जनता परेशान है।
राजनीतिक चिंतक राजेश सिंह का कहना है कि कांग्रेस पूर्वांचल को एक बड़े मकसद मेें रूप में लेकर चल रही है। आरपीएन सिंह का अपने गृह जनपद कुशीनगर में प्रभाव तो है ही आसपास के अन्य जिलों मंें भी वह कांगे्रेस को मजबूत करना चाहते हैं। लेकिन कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या वह खुद है। केंद्र सरकार के भ्रष्टाचार और महंगाई ने लोगों की मुष्किलें बढ़ाई हैं। कांग्रेस से लोगों का मोहभंग हो चुका है। पार्टी का कैडर भी मजबूत नहीं है।
दूसरी ओर पूर्वांचल राज्य मुक्ति मोर्चा के राष्टीय अध्यक्ष जयेन्द्र नाथ जायसवाल का कहना है कि पूर्वांचल के विकास पर किसी भी दल ने ध्यान नहीं दिया। कांग्रेस ने कई सालों तक प्रदेष में राज किया। केंद्र की सत्ता में भी रही। यहां की चीनी मिलें एक-एक कर बंद हो गईं। बेच दी गईं। एकमात्र खाद कारखाना  भी कई सालों से बंद है। उद्योग के नाम पर यहां कुछ नहीं है। जनता किस आधार  पर कांग्रेस को वोट देगी। आगामी लोकसभा चुनाव में एक सीट पर भी मुष्किल से जीत मिलेगी। पूर्वांचल राज्य के मुददे पर भी राहुल गांधी ने कोई बात नहीं की। इसे यहां की जनता अच्छी तरह से समझती है।
वैसे पिछले लोकसभा चुनाव में पूरे प्रदेष में कांग्रेस को 22 सीटों पर जीत मिली थी। इसमें से तीन पूर्वांचल की हैं। सपा को यहां से एक भी सीट पर जीत नहीं मिली थी। भाजपा को दो सीटों पर जीत मिली थी। बांसगांव से कमलेष पासवान और गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ जीते थे। बसपा को चार सीटों पर जीत मिली थी। बस्ती से अरविंद कुमार चैधरी, संतकबीरनगर से भीष्मशंकर तिवारी, देवरिया से गोरखप्रसाद जायसवाल और सलेमपुर से रमाशंकर राजभर सांसद हैं। गोरखपुर-बस्ती मंडल में लोकसभा की नौ सीटों में से तीन पर कांग्रेस की जीत कम नहीं थी। कुशीनगर से आरपीएन सिंह, डुरियागंज से जगदंबिका पाल और महराजगंज से हर्षवर्धन सिंह सांसद हैं। इन तीनों सीटों पर दोबारा जीत हासिल करने के साथ ही अन्य पर अच्छा प्रदर्षन कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती है। आरपीएन सिंह का केंद्र में अच्छा-खासा प्रभाव है। वह चाहते हैं के पूर्वांचल में पार्टी बेहतर प्रदशन करे। धन्यवाद रैली मेें जिस तरह से भीड़ जुटी उससे वह खुष हैं। वह इसे सफल मान रहे हैं। उनका कहना है कि जनता का विष्वास कांग्रेस पर है। वैसे देखा जाए तो धन्यवाद रैली में भीड़ लोकल कम बाहरी ज्यादा थी। सलेमपुर में गोरखपुर, बस्ती, कुषीनगर, सिदार्थनगर, संतकबीरनगर और महराजगंज से बसों में भरकर कांग्रेसी पहुंचाए गए। भीड़ जुटाने का यह तरीका ठीक तो रहा लेकिन इससे पार्टी का कितना भला होगा, यह तो वक्त बताएगा।
दूसरी ओर सपा भी पूर्वांचल को बड़े मकसद के रूप में लेकर चल रही है। मुख्यमंत्री बनने के बाद से अखिलेश यादव आधा दर्जन बाद इस क्षेत्र का दौरा कर चुके हैं।
देखा जाए तो जिस दिन राहुल गांधी पूर्वांचल में थे, उसी दिन मुख्यमंत्री अखिलेश  यादव भी इसी क्षे़त्र में थे। वह सिदार्थनगर में बनने वाले विशवविद्यालय का शिलान्यास करने आए थे। यहां उन्होंने पूर्वांचल के विकास की बात कहते हुए लोकसभा चुनाव के लिए जनता की नब्ज टटोली। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र षैक्षणिक रूप से पिछड़ा हुआ है। इस विष्वविद्यालय के बनने से लोगों को फायदा होगा। अच्छी षिक्षा मिलेगी तो बेरोजगारी दूर होगी। उन्होंने यहां कि विकास के लिए धन देने की बात कही। साथ ही लोकसभा प्रत्याशी व विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय को जीताने के लिए जनता से अपील की।
प्रदेश की विधानसभा में कांगे्रस के कुल 23 विधायक हैं। इनमें से तीन गोरखपुर-बस्ती में से हैं। 42 सीटें इन दोनों मंडलों में हैं।
पूर्वांचल से विधायक
तमकुहीराज से अजय कुमार लल्लू
खडडा से विजय कुमार दुबे
नौतनवां से कौषल किषोर सिंह उर्फ मुन्ना
पूर्वांचल से सांसद
कुशीनगर से आरपीएन सिंह
महराजगंज से हर्षवर्धन सिंह
डुमरियागंज से जगदंबिका पाल


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Indian journalist, working in Amar Ujala, Gorakhpur