शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

शनिवार, 26 नवम्बर 2011

पानी दे रहा मौत

गेरखपुर जिले के ग्रामसभा अडि़लापार में इंसेफलाइटिस से कुछ बच्चों की मौत हो गई। यहां जांच किया गया तो पता चला कि जलजनित इंसेफेलाइटिस के वायरस के कारण यह मौत हुई। महराजगंज के सिसवा में तीन लोग अज्ञात बीमारी से मर गए। डाक्टरों ने जांच की तो पता चला कि 500 घरों में से 125 घरों का पानी पीने लायक नहीं है। यह जहर से कम नहीं है। ऐसी स्थिति पूर्वांचल के लगभग हर जिलों की है।
पूर्वांचल को पानी का कटोरा कहा जाता है। इसका कारण यहां भूगर्भ जल का स्तर काफी उंचा होना है। महज 20 फीट पर पानी आसानी से उपलब्ध हो जाता है। यही कारण है कि हर गांव और घरों में 30 से 40 फीट पर हैंडपंप गड़े है। प्यास बुझाने वाले यही हैंडपंप अब लोगों की जिंदगी ले रहे हैं। इसका कारण इनका प्रदूषित जल है। इस क्षेत्र मंें प्रदूषण का इतने खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है कि इंसेफेलाइटिस के वायरस उसमें भी समा गए हैं। ये वायरस पूरी तरह से नए हैं। यही कारण है कि इस साल इनसे ज्यादा बच्चे मर रहे हैं।
पूर्वांचल के गोरखपुर और बस्ती मंडल के लगभग सभी जिलों में प्रदूषण के कारण उपजे इंसेफेलाइटिस के मच्छरों के लार्वा जमीन के अंदर तक पहंुच गए हैं। यही कारण है कि टीकाकरण के बाद भी इंसेफेलाइटिस के मरीजों की संख्या घटने का नाम नहीं ले रही है। अब सरकार ने इस बीमारी से निपटने के लिए एक नया अभियान शुरू किया है। यह है घरों में लगे हैंडपंपों को उखाड़ना और लोगों का इसका जल पीने रोकना है। पिछले कई महीनों से पूर्वांचल के जिलों में घरों में कम गहराई में लगे हैंडपंप उखाड़े जा रह हैं। शासन ने इस तरह का आदेश दिया है। यह गरीब लोगों के लिए समस्या बन गया है। उनके लिए सरकारी इंडिया मार्का हैंडपंप की व्यवस्था नहीं की जा रही है और उपर से उनका हैंडपंप उखाड़ा जा रहा है। बहुत विरोध के बाद ऐसे हैडपंपों पर लाल निशान लगाने के साथ उसके मालिकों से यह लिखित रूप में लिया जाने लगा कि वे इसके जल का प्रयोग पीने में नहीं करेंगे।
जहां तक इंसेफेलाइटिस की बात है तो पहले जापान इंसेफेलाइटिस यहां मौत का कारण था। इसका इलाज खोजा गया तो इसके वायरस नए रूप मेें सामने आ गए। रूप बदल चुके ये वायरस कितने प्रकार के हैं, इस अनुमान अभी तक न तो डाक्टर लगा पाए हैं और नही वैज्ञानिक। हालांकि यह पुष्टि हो गई है कि यह जलजनित रोग भी है।  इससे सभी के कान खड़े हो गए हैं। समस्या यह है कि गरीब लोग कौन सा पानी पिएं। जलकल की सप्लाई तो शायद ही किसी गांव में है, उपर से इंडिया मार्का हैंडपंप भी पर्याप्त नहीं हैं। ऐसे में गरीब या तो पानी बिना मर जाए या वह पानी पीकर इंसेफेलाइटिस से बीमार होकर।
इस बीमारी के लिए जिम्मेदार एंटेरोवायरस से बचाव के लिए अभी तक कोई टीका उपलब्ध नहीं है। इस बीमारी की रोकथाम ही एक तरीका है। इसके वायरस पानी के जरिए आंतों में प्रवेश करते हैं। आंत से रक्त में जाकर शरीर के विभिन्न अंगों को प्रभावित करते हैं। आंतों में वायरस की संख्या बढ़ती है तो वे शौच के जरिए बाहर आकर पानी या मिटटी में मिल जाते हैं। 2008 में सेंटर फार डिजीज कंटोल एंड प्रिेवशन अमेरिका की टीम ने बीआरडी मेडिकल कालेज में भर्ती मरीजों की जांच मंें पाया कि अधिकतर इंसेफेलाइटिस मरीजों में एंटेरोवायरस है। टीम ने कहा कि अमेरिका में भी इस रोग का प्रकोप  था, लेकिन जागरूकता और बचाव से काबू पा लिया गया।
मेडिकल कालेज परिसर स्थित नेशनल इंस्टीटयूट आफ वायरोलाजी की गोखरपुर शाखा के निदेशक डाक्टरा मिलिन्द गोरे का कहना है कि बचाव ही एकमात्र उपाय है। और कुछ नहीं किया जा सकता।
अब यहां के पानी की स्थिति को देखें तो पूर्वांचल में कई नदियां बहती हैं। इनमें राप्ती, रोहिन और आमी आदि हैं। ये भी प्रदूषण की मार झेल रही हैं। आमी का पानी तो पीने लायक नहीं बचा है। यह बस्ती, संतकबीर नगर होते हुए गोरखपुर में राप्ती में आकर मिलती है। इसकी जांच पिछले दिनों केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड ने की तो इसका पानी खतरनाक माना। इसमें भी इंसेफेलाइटिस के वायरस समा चुके हैं। हालत यह है कि इस नदी के आसपास बसे गांवों का जलस्स्तर भी इससे दूषित हो गया है। हैंडपंपों से काला पानी आता है।
आमी बचाने को लेकर आंदोलन कर रहे विश्व विजय सिंह का कहना है कि आमी नदी के तीन किमी के दायरे में भूजल दूषित हो चुका है। 100 फीट तक इंडिया मार्का हैंडपंप का पानी पीने लायक नहीं है। ऐसे में लोगों के सामने मुसीबत खड़ी हो गई है। उनका कहना है कि बस्ती, संतकबीर नगर और गोरखपुर के 108 किमी के दायरे में 200 गांव नदी के प्रदूषित होने के कारण संकट में हैं।
गोरखपुर महानगर की बात करें तो यहां शहर के बीच में रामगढ़ताल है। कहने को यह ताला है, लेकिन इसका पानी नाले की तरह हो गया है। इसके आसपास मोहददीपुर,, रूस्तमपुर आदि मुहल्ले बसे हैं। यहां जितने भी हैंडपंप लगे हैं अगर उनका पानी कुछ देर रख दिया जाए तो वह पीला पड़ जाता है। यहां तक की सप्लाई का पानी भी साफ नहीं आता है। इस स्थिति में लोग या तो घरों में एक्वागार्ड लगवाएं या पानी खरीदकर पीएं। अमीरों के लिए तो कोई बात नहीं है, लेकिन जो गरीब हैं वे इसका खर्च कैसे उठाएंगे। महानगर के ही चिलुआताल में नगर निगम अपना कूड़ा डालता है। यह ताल गारबेज डंपिंग यार्ड बन चुका है। इससे मच्छर तो पैदा हो ही रहे हैं, इंसेफंेलाटिस जैसी बीमारियां भी फैल भी रही हैं।
आमी नदी को बचाने को लेकर आंदोलन चला रहे विश्वविजय सिंह का कहना है कि सरकार यहां पानी तो पीने लायक नहीं है। गरीब या तो पानी पीकर मरेगा या बिना पानी के। सरकार इस पर ध्यान नहीं दे रही है। वह सिर्फ इंसेफेलाइटिस से लड़ने की बात कहती है। उसके मूल समस्या की जड़ को खत्म नहीं करती।
कैंपियरगंज में राप्ती और रोहिन नदियों का पानी प्रदूषित हो चुका है। इस क्षे़त्र के भाजपा नेता और गोरखपुर विश्वविद्वालय के पूर्व अध्यक्ष समीर कुमार सिंह का कहना है कि इस क्षेंत्र के 300 गांव प्रदूषित जल की वजह से इंसेफेलाइटिस की चपेट में हैं।
इंसेफेलाइटिस के कहर पर हर साल हायतौबा मचती है। इसके खूनी पंजे की गूंज लखनउ से लेेकर दिल्ली तक जाती है, लेकिन होता कुछ नहीं है। यहां तक की पिछले दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंसेफेलाइटिस पर हो रहीं मौतों को संज्ञान में लेते हुए 15 दिनों के भीतर दिल्ली में विशेषज्ञों की बैठक बुलाने का आदेश राज्य सरकार को दिया। इसके साथ ही बैठक का निर्णय 30 अक्टूबर को कोर्ट मंें देने को कहा।
इसके अलावा राज्य मानवाधिकार आयोग ने भी मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य और बीआरडी मेडिकल कालेज सहित गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर और महराजगंज के सीएमओ को नोटिस भेज इंसेफेलाइटिस के मरीजों के लिए पर्याप्त चिकित्सा व्यवस्था एवं अन्य सुविधाओं के बारे में पूछा। एक बेड पर तीन मरीजों के होने पर कड़ा रूख अपनाया। पिछले दिनों आयुर्विज्ञान पीठ अनुसंधान केंद्र मदुरई के वैज्ञानिकों की टीम यहां आई और जेई प्रभावित जिलों का दौरा कर मच्छरों के घनत्व और उनकी प्रजाति पर अध्ययन किया। इससे उनकी वृद्वि रोकने के प्रयास होंगे।
क्यों नहीं रूक रहा मौतों का सिलसिला
जेई से मौतों का सिलसिलसा क्यों नहींे रूक रहा इस पर गहन विचार करने की जरूरत है। इसमें कहीं न कहीं लापरवाही है। अब तो जेई कई नए वायरस मौत दें रहे हैं। इनके रोकथाम के लिए एक उपाय होता है तो दूसरा रूप धर लेते हैं। इन मौतों के लिए हम सिर्फ पूर्वांचल के पानी को ही दोषी नहीं दे सकते। इसमें इलाज में लापरवाही भी कम नहीं है। अब मेडिकल कालेज में इलाज की सुविधा ही देख लें तो 33 सालों पर्याप्त बेड तक नहीं है। हाल यह है कि बाल रोग विभाग के अधीन 226 बेड हैं। इतने बेडों पर हमेशा करीब 500 से ज्यादा मरीज रहते हैं। इनके इलाज के लिए 34 स्टाफ हैं। इन डाक्टरों से 24 घंटे इलाज संभव नहीं है। संसाधन देखें तो इस बीमारी से पीडि़त अधिकतर बच्चे मानसिक रोगी हो जाते हैं। उकने पुर्नवास के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। मेडिकल कालेज में राज्य सरकार द्वारा स्थापित मनोविकास कंेद्र अभी शुरू नहीं हुआ है। हालांकि र्मेिडकल कालेज को पीआरएम विभाग बनाने के लिए 51-51 लाख रूपये मिले हैं। जिसमंे से केवल छह लाख 28 हजार ही खर्च हुए हैं। जेई टीकाकरण का हाल भी बुरा है। मरीजों को दवाएं बाहर से लानी पड़ती हैं।
इंसेफेलाइटिस पर सरकार की नींद नहीं टूट रही है तो जनता खुद सामने आ चुकी है। पिछले दिनों इंसेफेलाइटिस को इमरजेंसी घोषित करने के लिए पूर्वांचल के सात जिलों में ख्ूान से खत लिखने का अभियान चलाया गया। लोगों ने खून से खत लिखकर सरकार को भेजा। इंसेफेलाइटिस उन्मूलन अभियान के चीफ कैम्पेनर डाक्टर आरएन सिंह ने सभी लोगों से इस मुहिम में जुटने को कहा।
क्या है इंसेफेलाइटिस
गांव के बहुत से लोगों को नहीं मालूम की यह बीमारी क्या है। कोई इसे नउकी बीमारी कहता है तो कोई दिमागी बुखार। कोई इसे जापानी इंसेफेलाइटिस कहता है। वैसे यह रोग वाइरस से होती है। बीआरडी मेडिकल कालेज के बाल रोग विभाग के प्रमुख डा. केपी कुशवाहा कहते हैं कि यहां दो तरह के वाइरस पाए जाते हैं। एक जापानी इंसेफेलाइटिस वाइरस और दूसरा इंट्रो वाइरस। अधिकतर बच्चों में इंट्रो वाइरस के लक्षण पाए जा रहे हैं,
जबकि जापानी इंट्रो वाइरस के लक्षण वाइरस कम बच्चों में पाए जा रहे हैं।
लक्षण- सिरदर्द, बुखार, मानसिक अस्वस्थता

सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

प्रेम का दीप जलाएं

एक दीप दूर कर देता है अंधेरा
वह जलता है दूसरों के लिए
अपने लिए नहीं करता उजाला
इसी तरह हमें भी जलना होगा
दूसरों के लिए
दीपक बनकर
तभी इस जीवन की सार्थकता है
तभी दुनिया से दूर होगा अंधेरा
फैलेगा प्रेम का प्रकाश
आओ इस दीवाली पर ऐसा ही दीप जलाएं

रविवार, 16 अक्तूबर 2011

बीमारी का प्राकृतिक इलाज

गोरखपुर पूर्वांचल के इस पिछड़े इलाके में बहुत सी ऐसी  चीजें हैं जो इसे विश्व पटल पर चमका रहीं हैं। आरोग्य मंदिर उन्ही में से एक है। यहां ऐसे रोगियों का इलाज किया जाता है जो हर तरह से निराश हो चुके होते हैं। जीवन खत्म सा लगता है। यहां प्रकृति के सानिध्य में प्राकृतिक तरीके से हो रहा इलाज बरबर ही लोगों को चैंकाता है। साथ भी यह बताने के लिए काफी है कि जंगलों में रहने वाले आदिवासी अपना इलाज निश्चित ही इसी तरह से करते होंगे। गोरखपुर की इस विशिष्ट पहचान केंद्र से विदेशों के बहुत से मरीज फायदा उठा चुके हैं।
दुनिया में बीमारों को ठीक करने के लिए इलाज की कई पद्वतियां मौजूद हैं। एलोपैथी से इलाज की सीमाएं अनंत है। इसके अपने साइड इफेक्ट हैं। इसके अलावा होम्योपैथी, आयुर्वेद, यूनानी और अन्य पद्वतियां भी है। शरीर पांच तत्वों से बना है। शरीर जब रोगग्रस्त होता है तो इसका इलाज अगर इन्ही तत्वों से किया जाए तो अभूतपूर्व फायदा होता है। इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं है। आयुर्वेद के जरिए इलाज में इसी को प्रमुख रखा गया है।
गेरखपुर में ंआरोग्य मंदिर में इलाज इसी प्राकृतिक चिकित्सा पद्वति के आाधार पर किया जाता है। इसकी स्थापना 1940. में विटठलदास मोदी ने की थी। अंग्रेजी शासनकाल के उस दौर में इलाज की बहुत सुविधा नहीं थी। विटठलदास एक बार बीमार पड़े तो एलोपैथी से कोई लाभ नहीं हुआ। तब वह प्राकृतिक चिकित्सा से रोग मुक्त हुए। यह पद्वति उन्हें इतनी भायी कि वह इसके दीवाने से हो गए। यहीं से इनका झुकाव इस तरफ हुआ। मार्च 2000 में उनकी मौत के बाद उनके बेटे डाक्टर विमल कुमार मोदी इसे चला रहे हैं।
करीब 70 सालों से प्राकृतिक चिकित्सा को कंद्र चल रहा है। अब तक इजारों लोग यहां से निरोग होकर जा चुके हैं। इसकी ख्याति देश-विदेश में फैली हुई है। पूरी तरह नेचल के करीब उसी तरह से बने इस अनोखे प्राकृतिक चिकित्सालय मेें 100 शैयाओं की सुविधा है। रोगियों के रहने के बने हर कमरे में पूरी तरह हवादार हैं। इलाज के लिए अलग-अलग कक्ष बने है। रोगी जब यहां आता है तो उसकी काउंसलिंग की जाती है। बातचीत में पता किया जाता है कि उसे किस तरह की बीमारी है। वैज्ञानिक उपाय भी बताए जाते हैं। इसके बाद शुरू होता है इलाज।
यहां रोग कि हिसाब से इलाज की विधियां हैं। जैसे उपवास। इसमें उपवास कुछ इस तरह करायाजाता है कि रोगी को किसी तरह की कमजोरी महसूस नहीं होती है। दूसरा तरीका है दुग्ध कल्प और मटठा कल्प। इससे पाचन संबंधी अनेक रोग दूर हो जाते हैं।
जलोपचार में जल, भाप, बर्फ का प्रयोग इलाज में किया जाता है। कटि स्नान, पैर का गर्म स्नान, रीढ का स्नान, गीली चादर का बंधन स्नान आदि। सूर्य और वायु स्नान। मिटटी के द्वारा भी उपचार किया जाता है। इसके अलावा मालिश और अन्य तरीके से भी यहां रोगी ठीक किये जाते हैं। हर उपचार के लिए छोटे-मोटे यंत्र या बर्तन बनाए गए हैं।
आरोग्य मंदिर के संचालक डाक्टर विमल कुमार मोदी का कहना है कि मनुष्य जब प्रकृति संबंधी नियमों का उल्लंघन करता है तो शरीर रोगग्रस्त हो जाता हैं। आज की आधुनिक जीवनशैली में अधिकतर लोग किसी ने किसी रोग से पीडि़त हैं। प्राकृतिक चिकित्सा के जरिए हर रोग दूर करने के साथ शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाते है। शरीर को पूरी तरह से विषमुक्त करते है। वह कहते हैं कि इलाज के दौरान रोगी हमारे बताये नियमों, तरीकों का कितना पालन करता है यह महत्वपूर्ण। इसी से वह जल्दी ठीक होता है
आरोग्य मंदिर में इलाज करा रहे मुंबई के 37 वर्षीय परेश गोयल साफटवेयर इंजीनियर है। कुछ महीने पहले उन्हें पेटमें दर्द हुआ। दवा कराई ठीक नहीं हुआ। बीमारी बढ़ती गई।एक के बाद दूसरे, तीसरे करते हुए परेश ने मुंबई के सभी नागीगिरामी डाक्टरों से इलाज करा लिया।विभिन्न प्रकार के 45 टेस्ट डाक्टरों ने करा लिया, लेकिन यह डाइगनोस्ट नहीं कर पाए कि पेट में दर्द का कारण क्या है। इसके बाद उन्हें आरोग्य मंदिर के बारे में पता चला। वह यहां इलाज कराने पहुंच गए। यहां 15 दिन लगातार इलाज के बाद उन्हें फायदा हुआ। पेट में दर्द कम हो गया। धीरे-धीरे वह ठीक हो गए। वह यहां एक महीने तक रहे। परेश का कहना है कि यहां इलाज में फायदा धीरे-धीरे होता है, लेकिन वह स्थायी होता है। प्रकृति के साथ रहकर प्रकृति द्वारा दी गई वस्तुओं से इलाज से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है। इसके इलाज में बड़े धैर्य की जरूरत होती है।
यहां इलाज करा रहे लखनउ के सौरभ सिंघल वह शख्स हैं जिनका विश्वास एलोपैथी से लगभग टूट सा गया है। उनकी बीमारी की शुरूआत पेट में कब्ज से हुई। यह बढ़ी और दर्द तक पहुंच गई। पहले वह एलोपैथी की शरण में गए। चूंकि इनके पिता स्वास्थ विभाग में बड़े अधिकारी हैं, इसलिए बड़े से बड़े डाक्टर की देखरेख में इलाज शुरू हुआ। कई जांच के बाद डाक्टरों ने आपरेशन किया। फायदा कुछ नहीं हुआ। उपर से पेट खाना पचाने वाला एंजाइम बनना बंद हो गया। बाक्सिंग में यूपी चैपियन रहे सौरभ की परेशानी बढ़ गई। उन्हें समझ में नहीें आ रहा था कि क्या करें। इसके बाद वह योग की शरण में गए। बाबा रामदेव की आयुर्वेदिक दवाएं लीं। फायदा जीरो। जिसने जो देसी दवा बताई इलाज किया। पर कुछ नहीं हुआ। जुलाई 2009 में वह पहली बार आरोग्य मंदिर आए। उस समय उनका वजन जरूरत से ज्यादा 97 किलो था। 15-16 बार लैटिन जाना पड़ता था। यहां 108 दिन इलाज कराया। इस दौरान 85 दिन तक बिना अन्न खाए रहे। इससे इनकी बीमारी में बहुत सुधार हुआ। और शरीर में चुस्ती-फुर्ती भी आई। कंप्यूटर इंजीनियर सौरभ वापस काम पर लग गए। करीब तीन साल तक सब ठीक रहा। 2011 में फिर प्राब्ल्म बढ़ी तो 9 जुलाई को यहां आ गए। इस बार फिर इनका वनज 102 किलो हो गया था। जुलाई से वह यहां पर हैं। इनका उपचार उपवास, रसाहार, मटठा कल्प से शुरू हुआ। सौरभ बताते हैं कि यहां आकर उनकी विल पावर मजबूत होती है। वह रोजाना दो घंटे ध्यान करते हैं। सुबह से रात तक विभिन्न चरणों में इलाज होता है।

सोमवार, 27 जून 2011

जरा याद करो कुर्बानी

देश पर जान देने वाले लोगों को हम भूल गए। भूल गए उनकी पीढि़यों को जो गुमनामी के अंधेरे में हैं। 15अगस्त और 26 जनवरी को हम कुछ शहीदों को याद कर भूल जाते हैं। यह सोचने की जहमत नहीं उठाते कि उनके परिजन कहां और किस हालत में हैं। स्वतंत्रता आंदोलन की जो हस्तियां राजनीति में आ गईं, उनकी परिवार और पीढि़यों को तो लगा याद रखे हुए हैं, लेकिन उन्हें हमारी पीढ़ी का शायद ही कोई जानता हो, जिन्होंने सही मायने में देश के लिए जान दी। हमारी नई जेरनेशन तो उनके नाम तक नहीं जानती है। उसके पास टाइम नहीं है कि वह इस बारे में सोचे। वह अपने करियर के पीछे इस कदर भाग रही है कि मां-बाप तक पीछे छूट जाते हैं। फिर उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन के शहीदों ओर उनके परिवार वाले कहां याद रहेंगे। ऐसे ही लोगों को झकझोरने और गुमनामी में खो चुके ऐसे लोगों को सामने लाने का काम किया है शिवनाथ झा ने। वरिष्ठ पत्रकार और लेखक शिवनाथ झा इस काम में कई सालों से लगे हैं। वे इसे ‘आंदोलन एक पुस्तक से’ के जरिए मुहिम का रूप दे चुके हैं। इस सीरिज की पांचवी पुस्तक ‘इंडियन मोर्टियर्स एंड देयर डिसेंडेंटस 1857-1947’ जनवरी में लोगों के सामने होगी। 400 से अधिक पेजों की यह पुस्तक वह उधम सिंह की तीसरी पीढ़ी के लोगों को सहायता दिलाने के लिए ला रहे हैं। उनका परिवार बुरी हालत में इस समय जी रहा है। इस पुस्तक में शिवानाथ झा ने मंगल पांडेय, चन्द्रशेखर आजा, सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त, चापेकर बंधु, जतीन्द्र नाथ मुखर्जी, अजीमुल्ला खा, अशफाउल्ला खां, राम प्रसाद बिस्मिल सहित 35 शहीदों को शामिल किया है।
शिवनाथ झा से जब दिलीप जायसवाल की बात हुई तो उन्होंने बताया कि पुस्तक के जरिए उनके आंदोलन की शुरूआत शहनाई वादक बिस्मिल्ला खां को सहायता दिलाने से शुरू हुई। यह 2002 की बात है। उसी समय उन्होंने आंदोलन एक पुस्तक से की मुहिम शुरू की। तब से यह आंदोलन पड़ाव दर पड़ाव आगे बढ़ रहा है। सीरिज की पांचवीं बुक वह शहीदों की गुमनाम पीढि़यों की सहायता के लिए ला रहे हैं। उन्हें हम भूल गए। सरकार भी सुध नहीं ले रही है। जिनकी वजह से हम आजादी की खुली हवा में सांस ले रहे हैं, उन्हें सिर्फ श्रद्वांजलि देने से काम नहीं चलेगा, उनकी पीढि़यों केा गुमनामी से बाहर लाकर काम करना होगा।
उधम सिंह- इस शहीद नाम हम भला कैसे भूल सकते हैं। ये वहीं उधम सिंह हैं, जिन्होंने जलियावाला बाग हत्याकांड का बदला जनरल डायर से लिया था। उनकी तीसरी पीढ़ी आज किस हालत में है यह आप नहीं जानते होंगे। उनके प्रपौत्र जीत सिंह आजकल दिहाड़ी मजदूर का काम पंजाब के सनमगरू में करते हैं। सिर पर ईंट, गारा ढोते हैं। परिवार चलाने के लिए उन्हें यह करना पड़ता है।उनके दो बेटों में से एक जसपाल कपड़े की दुकान पर काम करते हैं। इस शहीद परिवार की सुध तो सरकार ने नहीं ली, लेकिन शिवनाथ अपनी पुस्तक उन्ही की सहायता के लिए लेकर आ रहे हैं।
तात्याटोपे- तात्याटोपे को तो आप जानते ही होगे, जिन्होंने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में प्रमुख भूमिका निभाई। उनकी तीसरी पीढ़ी के विनायक राव टोपे अपनी पत्नी सरस्वती देवी और तीन बच्चों प्रगति, तृप्ति और आशुतोष के साथ कानपुर से 20 किमी दूर बिठूर में रहते थें। वहां वे किराना की दुकान चलाते थें। यह बात जब मीडिया में जून 2007 को आई तब तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने प्रगति और तृप्ति को रेलवे में जाॅब देने का आश्वासन दिया। इसके बाद उन्हें सहारा और सहायता मिली।
बहादुर शाह जफर- मुगलों के अंतिम शासक और 1857 की क्रांति का नेतृत्व करने वाले बहाुदर शाह जफर परिवार की 56 वर्षीय सुल्ताना बेगम तो पश्चिम बंगाल के हाबड़ाके एक स्लम एरिया में रहती थीं। वहां वे चाय की दुकान चलाकर अपना परिवार पाल रही थीं। सुल्ताना बेगम पति मुहम्मद बदर बख्त की मौत 1980 के बाद सरकार ने उन्हें रहने के लिए टाली गंज में एक आवास दिया था, लेकिन लोकल गुंडों ने उन्हें परेशान करना शुरू कर दिया। उन्हें उसे फलैट से भगा दिया गया। उन्हें सहायता दिलाने का काम शिवनाथ ने किया।
झांसी की रानी- खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी। भुजाएं फड़का देेने वाला यह देशभक्ति गीत लोगों की जुबान पर तो है, लेकिन रानी लक्ष्मीबाई के परिवार को लोग भूल गए। वह अपने दत्तक पुत्र दामोदर राव को बांधे युद्व लड़ी थीं। दामोदार राव की अगली पीढ़ी को लोग जानते नहीं होंगे। वे मध्य प्रदेश के इंदौर में एक गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं। तलवार से खेलने वाली पीढि़यों के वंशज आज कंप्यूटर चला रहे हैं। दामोदार राव की प्रपौत्री गायत्री साफटवेयर इंजीनियरिंग की छात्रा हैं। उनका परिवार भी अच्छी हालत में नहीं है।
बटुकंेश्वर नाथ दत्त- भगत सिंह के साथ मिलकर असेंबली में बम फेंकने वाले क्रातिकारी बटुकेश्वर दत्त को आजादी केा बाद लोग भूल गए। उनकी सुध सरकार को भी नहीं रही। उन्होंने गुमनामी की अंधेरे में 1965 में दिल्ली के एम्स में दम तोड़ दिया था। उनकी बेटी बागची आज उनकी यादों को जिंदा रखे हुए हैं। भगत सिंह के साथ फांसी पर चढ़ाए गए सुखदेव के परिजन भी खामोश जिंदगी गुजार रहे हैं। आजादी में अपने तीने बेटों की आहुति दे चुके पुणे का चापेकर परिवार के लोग अब साफटवेयर इंजीनियर हंैं। उनके आसपास वाले भी नहीं जानते कि यह शहीदों का परिवार हैं। चंद्रशेखर आजाद के दूर के वंशज गुड़गांव और दिल्ली में हैं। अनुशीलन समिति से जुड़े रहे क्रांतिकारी जतीन्द्रनाथ मुखर्जी के पोते पृथ्वीचन्द्रनाथ मुखर्जी पेरिस में रह रहे हैं। सत्येन्द्रनाथ बोस को अंग्रेजों ने तिरंगा फहराने पर फांसी दे दी थी। उनकी परिजन सागरिका घोष पश्चिम बंगाल के तुमलुक में रहती हैं।
इस पुस्तक इसी तरह बहुत से शहीद परिवारों को खोजकर सामने लाया गया है, जो गुमनामी में जी रहे हैं।
देश पर जान देने वाले लोगों को हम भूल गए। भूल गए उनकी पीढि़यों को जो गुमनामी के अंधेरे में डूबे हुए हैं। वक्त के साथ उन पर दुखों की मोटी परत चढ़ी हुई है। स्वतंत्रता आंदोलन की जो हस्तियां राजनीति में आ गईं, उनकी परिवार और पीढि़यों को तो लगा याद रखे हुए हैं, लेकिन उन्हें हमारी पीढ़ी का शायद ही कोई जानता हो, जिन्होंने सही मायने में दखे के लिए जान दी। हमारी नई जेरनेशन तो उनके नाम तक नहीं जानती है। गुमानामी में खो चुके ऐसे लोगों को सामने लाने का काम किया है शिवनाथ झा ने। वे सराकर एवं समाज को झकझोरने का कम कर रहे। इसके लिए वे आंदोलन एक पुस्तक से भारतीयों के सामने लाए हैं, इस सीरीज की बुक इंडियन मार्टर एंड देयर निगलेक्टेड डिसेंट में कई शहीदों के परिवार को सामने लाएं हैं, जिन्हें लोग भूल चुके हैं। युवा पीढ़ी के पास टाइम नहीं है कि वह इस बारे में सोचे। वह अपने करियर के पीछे इस कदर भाग रही है कि मां-बाप तक पीछे छूट जाते हैं। फिर उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन के शहीदों ओर उनके परिवार वाले कहां याद रहेंगे।
उधम सिंह- इस नाम को देश के बहुत से लोगों सुने तो होंगे, लेकिन नहीं जानते कि वे कौन हैं। ये वहीं उधम सिंह हैं, जिन्होंने जलियावाला बाग हत्याकांड का आदेश देने वाले कू्रर जनरल डायर को जान से मारा था। उनके पोते जीत सिंह आजकल दिहाड़ी मजदूर का काम पंजाब के सनमगरू में करते हैं। उनके दो बेटों में से एक जसपाल कपड़े की दुकान पर काम करते हैं।
तात्याटोपे को तो आप जानते ही होगे, जिन्होंने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में प्रमुख भूमिका निभाई। उनकी तीसरी पीढ़ी के विनायक राव टोपे अपनी पत्नी सरस्वती देवी और तीन बच्चों प्रगति, तृप्ति और आशुतोष के साथ कानपुर से 20 किमी दूर बिठूर में रहते हैं। वहां वे किराना की दुकान चलाते हैं। यह बात जब मीडिया में जून 2007 को आई तब तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने प्रगति और तृप्ति को रेलवे में जाॅब देने का आश्वासन दिया।
मुगलों के अंतिम शासक बहाुदर शाह जफर परिवार की वुल्ताना बेगम तो पश्चिम बंगाल के हाबड़ा के एक स्लम एरिया में रहती हैं। वहां वे चाय की दुकान चलाकर अपना परिवार पाल रही हैं। सुल्ताना बेगम पति मुहम्मद बदर बख्त की मौत 1980 के बाद सरकार ने उन्हें रहने के लिए टाली गंज में एक आवास दिया था, लेकिन लोकल गुंडों ने उन्हें परेशान करना शुरू कर दिया। उन्हें उसे फलैट से भगा दिया गया।
शिवनाथ झा बताते हैं कि शहीदों के वंशजों के खोजना इतना आसान नहीं था। वह भी अनुशीलन समिति से जुड़े रहे जतीन्द्रनाथ मुखर्जी जैसे लोगोें के वंशजों को। जतीन्द्रनाथ को अंग्रेजों ने फांसी पर चढ़ा दिया था। इनका सुराग लगाने के लिए शिवनाथ ंझा कहां-कहां नहीं गए। देश के कई हिस्सों की खाक छानी। अंत में जतीन्द्रनाथ के पोते पृथ्वीचन्द्र मुखर्जी का पता चला कि वह पेरिस में हैं। इनकी स्थिति अन्य शहीदों के वंशजों से अच्छी है।
शिवनाथ बताते हैं कि शहीदों पर लोग लंबे-लंबे भाषण तो बहुत देते हैं, उनके वंशजों को उचित सम्मान देने की बात होती है, लेकिन जब उनके लिए कुछ करने की बात आती है तो सभी पीछे हट जाते हैं। सरकार भी इस पर ध्यान नहीं देती है। असेंबली बम कांड में भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव शामिल थे। तीनों क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने फांसी पर चढ़ा दिया था। पार्लियामेंट में भगत सिंह की तस्वीर तो लगी है, लेकिन राजगुरू और सुखदेव का नहीं। इन दोनों शहीदों को सरकार याद तक नहीं करती। जब उनके साथ यह किया जा रहा है तो उनके वंशजों की सरकार कहां तक सुध लेगी समझा जा सकता है। शिवनाथ बताते हैं कि उधम सिंह के वंशजों जीत सिंह और अन्य की सहायत के लिए वह अपनी नई पुस्तक ला रहे हैं। इस पुस्तक से जो भी कमाई होगी वह उनके वंशजों को दी जाएगी। इस आंदोलन को लेकर लोग बात तो बहुत करते हैं। इसकी तारीफ भी करते हैं, लेकिन जब सहायता की बात आती है तो मुश्किल से कोई सामने आता है। इसी कारण इस बुक को पब्लिश करने मेें आर्थिक दिक्कतों का सामना पड़ रहा है। वह बताते हैं कि एक बुक की कीमत 2100 रूपये है। लोग इसे खरीद कर शहीद परिवार की मदद कर सकते हैं।
जानें शिवनाथ झा को
पटना यूनिवर्सिटी से पीजी किए वरिष्ठ पत्रकार और लेखक शिवनाथ झा इस समय गाजियाबाद में रहते हैं। वह मूलतः बिहार के दरभंगा जिले में मैथिली ब्राहमण परिवार में 10 जनवरी 1959 को जन्मे शिवनाथ का बचपन परेशानियों में गुजरा। उन्होंने अखबार बेचकर अपनी पढ़ाई की। एमजे अकबर जैसे पत्रकारों के साथ काम कर चुके शिवनाथ कभी भी अपने पुराने दिन को नहीं भूलते। उनकी वाइफ नीना झा एजूकेशन से जुड़ी होने के बाद भी पति के इस आंदोलन में पूरी तरह से जुड़ी हुई हैं। वह उन्हें हर तरह की सहायता देती हैं।

रविवार, 26 जून 2011

इस जुनून को सलाम

दिल में देशभक्ति और शहीदों के लिए कुछ करने का जज्बा हो तो इंसान को घर-परिवार नहीं बांध सकता। वह सबकुछ छोड़ इसी में जी-जान से जुट जाता है। अपना जीवन देशसेवा के लिए अर्पित कर देता है। देश के लिए ऐसे ही जुनून से जुटने वाले एक शख्स हैं हीरालाल यादव। वैसे तो वे उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के कौड़ीराम के निवासी हैं, लेकिन पूरा परिवार मुंबई में रहता है। वैसे उन्हंें एक क्षे़त्र के दायरे में नहीं बांधा जा सकता। क्योंकि वह पूरे देश के हैं। हीरालाल पूर्वांचल की माटी के वह हीरा हैं, जो अपनी चमक पूरे देश में फैला रहे हैं। संघर्षों के बल पर मुकाम हासिल करने वाले इस शख्स ने अब अपना पूरा जीवन देश की हिफाजत में शहीद हुए लोगों को समर्पित कर दिया है। ये देशभर में शहीदों के घर जाते हैं और उनके दुःखों को साझा करते हैं। 26-11 की आतंकी घटना में शहीद एनएसजी कमांडो संदीप उन्नीकृष्णन के घर भी ये पहुंचे। उनके पिता से मिले तो वे काफी प्रभावित हुए। दोनों ने इंडिया गेट से गेटवे आफ इंडिया तक साइकिल यात्रा भी की। इस यात्रा के दौरान वह जिन शहरों से गुजरे, वहां लोगों ने शहीद पिता के लिए पलक पांवड़े बिछा दिए। लोग पैर छूते थे। ऐसा नजारा देख उन्नीकृष्णन के पिता को यह अहसास हुआ कि उन्होंने बेटा खोया नहीं है। हीरालाल इस तरह की अब तक 35 यात्राएं कर चुके हैं। शहीदों और देशप्रेम के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए दर्जनों जगह अपनी कविताओं, शहीदों के पत्रों आदि की प्रदर्शनी लगा चुके हैं।
हीरालाल यादव के संघर्षों की एक लंबी दास्तां है। 1980-81 में गोरखपुर यूनिवर्सिटी से एमए करने के बाद वह नौकरी की तलाश में उधार रूपये लेकर मुंबई गए। यहां फल बेचना शुरू किया। एक मिल में 5 रूपये रोजाना पर काम भी किया। इसी दौरान उन्हें लोकल ट्रेन में एक 17 साल का लड़का मिला। वह ठीक से बोल नहीं पाता था। वह पीलीभीत का रहने वाला था। वह पांच माह के प्रयास के बाद उन्होंने उसे उसके घर पहुंचाया। तब उन्हें लगा कि वह दुनिया का कोई भी कार्य कर सकते हैं।
1997 में आजादी की स्वर्ण जयंती वर्ष में सबसे पहले मुंबई से शहीद भगत सिंह के गांव साइकिल यात्रा की। यह यात्रा 82 दिन की थी। यह मदर टेरेसा को भी समर्पित रहा। इस यात्रा के दौरान वह बाघा बार्डर, जम्मू, जलियावालाबाग आदि जगहों पर गए। लोगों को देशभक्ति और शहीदों के बारे में बताया।
इस सफलता के बाद 1998 में उन्होंने नशा निशेध संकल्प यात्रा शुरू किया। इसकी यात्रा की प्रेरणा उन्हें खुद से मिली। वह बताते हैं कि बहुत सिगरेट, बीड़ी पीते थे। एक दिन उनका छोटा बेटा जो करीब चार साल का था, वह भी मुंह में बीड़ी लगाए  था। यह देख वह सकते में आ गए। इसी के साथ उन्होंने नशा छोड़ दिया और इसके प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए चल पड़े। 103 दिन की यात्रा में वह देश के चार महानगरों मुंबई, कोलकाता, दिल्ली और चेन्नई गए।
1999 में कारगिल युद्व में शहीद सैनिकों को श्रद्वांजलि देने के लिए सलाम सैनिक यात्रा शुरू की। 42 दिन तक चली इस यात्रा को बहुत सफलता मिली। यात्रा के दौरान वह कारगिल शहीद के कई परिवारों से मिले। इसमें राजस्थान के दो शहीदों को याद करते हुए वह बताते हैं कि जयपुर के कैप्टन अमित भारद्वाज अपने खानदान के पहले व्यक्ति थे जो सेना में गए और देश के लिए शहीद हो गए। उनका शव शहीद होने के 56वें दिन घर पहुंचा। कुछ इसी तरह शहीद स्क्वायडन लीडर अजय आहूजा की कहानी है। वह कोटा राजस्थान के निवासी थे।
चैथी 12 दिन की छोटी यात्रा बाबा आम्टे के लिए निकाली। पांचवीं अन्ना हजारे के लिए निकाली।  छठवीं यात्रा के दौरान वह थाइलैंड, वियतनाम, कंबोडिया और लाओेस तक गए। युद्वबंदियों के लिए भी वह यात्रा निकाल चुके हैं। वह कहते हैं कि 71 के भारत-पाक युद्व में भारत को तो विजय मिल गई, लेकिन बहुत से युदबंदियों को रिहा नहीं कराया जा सका। वह आज भी पाकिस्तान की जेलों में बंद हैं। कई तो वहीं मर गए। 2006 में इनके लिए निकाली यात्रा में वह युद्वबंदियों के 10-12 परिवारों से मिले। इस यात्रा के दौरान वह मुंबई, अंडमान निकोबार, कोलकाता, रांची आदि जगहों पर गए।
इसी जुनून में 24 मई 2010 को हीरालाल 26-11 को मुंबई में आतंकियों से लोहा लेते हुए ताज होटल में शहीद होने वाले एनएसजी कमांडो संदीप उन्नीकृष्णन घर बंगलुरु पहुंचे। संदीप के पिता ने अपनी पीड़ा हीरालाल से कही। हीरालाल ने बताया कि जब संदीप के पिता को उन्होंने अपने मिशन के बारे में बताया तो उन्होंने मेहमान के रूप में घर में ही रहने को कहा। उन्होंने वहां संदीप के नाम का एक पीपल का पौधा भी लगाया। जब वह उनके घर से निकलने लगे तो 10 किमी साइकिल चलाकर उन्हें सड़़़क तक छोड़ने आए। तभी उन्होंने लंबी साइकिल यात्रा की इच्छा जताई। प्रस्ताव मिलने पर उन्होंने 26 अक्टूबर से 26 नवम्बर 2010 को इंडिया गेट से एक साथ साइकिल यात्रा शुरू की। दोनों एनएसजी के मुख्यालय से पलवल, आगरा होते हुए पूना पहुंचे। उसके बाद गेटवे आफ इंडिया के पास ताज होटल गए। जिस कमरे में संदीप को गोली लगी थी। वहां पर उन्होंने दिनभर उसी कमरे में रहकर उपवास भी रखा। इस यात्रा में उन्हें बहुत ही सफलता मिली। हर जगह लोगों का हुजूम इनका स्वागत करने के लिए पहुंच जाता था। लोग शहीद पिता के पैर छूते थे।
हीरालाल इसके अलावा अपनी कविताओं के जरिए भी देशभक्ति के प्रति लोगों को जागरूक करते हैं। युद्वबंदियों की पीड़ा का विषय इनकी कविताओं में होता है। यह अपनी कविताओं, शहीदों पत्रों, फोटो आदि की प्रदर्शनी भी स्कूलो, यूनिवर्सिटी आदि जगहों पर लगाते हैं। अब तक वह करीब 165 जगह प्रदर्शनी लगा चुके हैं। उनके इसी काम को देखते हुए पिछले दिनों उन्हें गोरखपुर के बड़हलगंज में आयोजित सरयू महोत्सव में सरयू रत्न से सम्मानित किया गया।
हीरालाल बताते हैं कि देश और देश के लिए शहीद हुए लोगों के लिए काम कर अच्छा लगता है। इसी काम के जुनून में वह अपना परिवार मुंबई में छोड़ चुके हैं। दो बेटे हैं। एक बेटा एचडीएफसी बैंक में काम करता है। दूसरा एनिमशन का कोर्स कर रहा है। वह अपना खर्च खुद निकालता है। पत्नी मुंबई में फल का स्टाल लगाती है। अपना पूरा जीवन देश और शहीदोें के लिए समर्पित कर चुके हीरालाल चाहते हैं कि सभी में देशभक्ति की भावना जगे। सभी देश के लिए आगे आएं।

एक नदी की मौत

नदियों को जीवनदायिनी कहा जाता है। इनके किनारे ही दुनिया की कई बड़ी सभ्यताएं फलीफूलीं। नदियों के पानी का उपभोग नहाने-धोने के साथ ही खेती के लिए किया जाता है। लेकिन आज जो स्थिति नदियों की है वह बहुत ही दुखदायी है। कई नदियां सूख गई, कई सूखने के कगार पर हैं। कई ऐसी हैं जो नाले में बदल गई हैं। उनका पानी जीवनदायिनी नहीं, जीवन लेने वाला बन गया है। ऐसी नदियों का पानी कोई छूता तक नहीं। आमी नदी भी उनमें से एक है। गौतम बुद्व से लेकर कबीरदास को तर कर चुकी इस नदी की कोख में आज जहर फलफूल रहा है। इसका पानी इतना जहरीला हो गया है कि छूने से बीमारी हो जाती है। इसके पानी का यही जहर लोगों में गुस्से के रूप में उस समय फूटा जब लखनउ से पर्यावरण विभाग और प्रदूषण नियंत्रण बोेर्ड के अधिकारी इसकी जांच करने पहुंचे। मामला 20 अप्रैल को हुआ। राज्य के मुख्य पर्यावरण अधिकारी डा. डीसी गुप्ता, क्षेत्रीय पर्यावरण अधिकारी कौशल किशोर एवं सहायक वैज्ञानिक डा. सुरेश चंद्र शुक्ला को कटका के ग्रामीणों ने उस समय बंधक बना लिया जब ये लोग छताई पुल पर आमी नदी के पानी का नमूना लेने जा रहे थे। ग्रामीणों ने अधिकारियों की पिटाई करने के साथ मुंह पर कालिख पोती और साड़ी पहनाया। काफी मुश्किल के बाद प्रशासन इन्हें छुड़ा पाया। ग्रामीण इस बात से गुस्सा थे कि हर बार जांच टीम आती है और आमी का पानी साफ होने के बजाय और काला हो जाता है। कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं होता। ग्रामीणों के इस गुस्से की गूंज लखनउ से लेकर दिल्ली तक पहुंची। यहां केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की टीम दो मई को जांच करने पहंुची। यह पहला मौका रहा जब पूर्वांचल में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की टीम जांच करने आई। टीम ने संतकबीरनग, गीडा और आमी के किनारे बसे गांवों का जायजा लिया। इन जगहों से पानी के नमूने लिए। कई फैक्टियों की जांच हुई। टीम आमी नदी का पानी देखकर चैंक गई। टीम के मुखिया सुपरिंटेंडेंट इंजीनियर गुरूनाम सिंह ने कहा, ये नदी तो लगती ही नहीं। सिर्फ इतनी टिप्पणी काफी है इस नदी का पूरा सच जानने के लिए। टीम अपने साथ तीन दर्जन नमूने लेकर लौट गई। इसकी रिपोर्ट कब तक आएगी और कब कार्रवाई होगी, इस बारे में कहा नहीं जा सकता।
जीवनदायिनी रही यह नदी इतनी प्रदूषित कैसे हो गई, इसकी हकीकत जानने के लिए हमें लौटना होगा 20 साल पहले। हमें यादों के पन्ने उलटने होंगे। सिद्वार्थनगर के सिकहरा ताल से यह नदी निकली है। वहां से संतकबीरनगर और गोरखपुर होते हुए सोहगौरा के पास राप्ती नदी में मिलती है। इस दौरान यह नदी करीब 180 किलोमीटर का सफर तय करती है। 20 साल पहले यह नदी पूरी तरह साफ थी। पानी में आक्सीजन का स्तर भी मानक के अनुसार चार मिलीग्राम प्रतिलीटर था। इस नदी के दम तोड़ने की कहानी ठीक इसी के बाद से शुरू होती है। पूर्वांचल को औद्योगिक नक्शे पर उभारने के लिए बने गीडा में फैक्टियों के लगने का सिलसिला शुरू हुआ। इन उद्योगों का गंदा पानी आमी में गिरकर जाने लगा। किसी भी फैक्टी ने टीटमेंट प्लांट लगाया तो किसी ने नहीं। जिन्होंने लगाया उनका प्लांट ठीक से काम नहीं करता या फिर वे चलाते ही नहीं। इसके अलावा संतकबीरनगर में लगे कई उद्योगों का पानी भी इसे गंदा करने लगा। स्थिति यह हो गई कि आमी नदी कुछ ही सालों में मरने लगी।
मदन मोहन मालवीय इंजीनियरिंग कालेज के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर और पर्यावरणविद डा. गांेविंद पांडेय ने इस नदी पर काफी शोध किया है। उनका कहना है कि आज आमी के पानी में घुलनशील आक्सीजन का स्तर प्रति लीटर 1.8 मिलीग्राम तक पहुंच गया है। कहीं-कहीं यह शून्य तक है। उनका कहना है कि नदी की कोख में ही मछलियां, झींगा, केकड़ा, कछुए और अन्य जलीय जीव मर चुके हैं। पानी के अंदर की वनस्पतियां जहरीली हो चुकी हैं। स्थिति इतनी खराब है कि आमी के किनारे बसे गांवों में लगे हैंडपंपों से भी पीला पानी आता है। नदी के पानी से उठती सड़ांध से इसके किनारे खड़ा होना मुश्किल है। सटे गांवों में लगे हैंडपंपों से भी पीला पानी आता है। डा. पांडेय का कहना है कि आमी में बायोकेमिकल आक्सीजन डिमांड बीओडी, केमिकल आक्सीजन डिमांड सीओडी, टर्बिडिटी, फिकल कोलीफार्म, फलोटिंग मैटर यानी तैरने वाले पदार्थ और रंग-गंध कुछ भी मानक के अनुरूप नहीं है।
देखा जाए तो आमी की हत्या इंसान की इच्छाओं ने किया। औद्योगिकीकरण की लालसा में हम भूल गए कि सिर्फ गंगा ही हमारी माता नहीं है अन्य नदियां भी माता है। जिस तरह गंगा की सफाई के लिए केंद्र करोड़ों रूपये खर्च कर रही है, उसी तरह हर क्षेत्र में इस तरह की नदियों के लिए ऐसा होना चाहिए। आमी को बचाने के लिए न तो कोई पार्टी आई और न ही कोई संस्था। सरकार चुप्पी मारकर बैठी रही। कई शिकायतों के बाद सिर्फ जांच टीम आई और चली गई। ऐसे में आगे आए इससे जुड़े गांव के लोग, शिक्षक, डाक्टर और अन्य। आमी बचाओ मंच की स्थापना की गई। यह कोई रजिस्टर्ड संस्था नहीं, लोगों का मंच है। जब प्रदेश सरकार के अधिकारी जांच करने पहुंचे तो इसी मंच लोगों और ग्रामीणों ने उन्हें बंदी बना लिया। इसके बाद प्रशासन जागा। पुलिस ने इस मंच के अध्यक्ष विश्वविजय सिंह सहित करीब 100 ग्रामीणों पर मुकदमा दर्ज किया। इसके बाद तो कई दलोें के लोग कटका गांव पहुंचने लगे। आंदोलन होने लगा। प्रदर्शन हुए। गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ भी वहां पहुंचे और कहा कि अधिकारी आमी नदी क्या इसके किनारे लगे हैंडपंपों को पानी पीकर दिखाएं। कटका में योगी एक-एक ग्रामीण के घर गए और लोगों की पीड़ा सुनी। अब यह आंदोलन बड़ा रूप ले चुका है। आशा है यह नदी फिर जीवनदायिनी हो जाएगी। इसको नया जीवन मिलेगा।
ये फैक्टियां गंदा कर रहीं नदी
1- इंडियन ग्लाइकार्ड लिमिटेड गीडा, यह शराब बनाने की फैक्टी है।
2- मेमर्स अंबे, लारी और बथवाल। ये तीनों कपड़ा बनाने की मिले हैं।
3- रैना पेपर बोर्ड लिमिटेड संतकबीरनगर।
4- बजाज सुगर मिल, संतकबीरनगर।
 आमी की ऐतिहासिकता-
गौतम बुद्व- 534 ईसा पूर्व जब गौतम बुद्व ने गृहत्याग कर घर से निकले तो इसी तट पर पहुंचे। उन्होंने यहीं अपने राजसी वस्त्रों, केशों का त्याग किया। इसी नदी में स्नान किया। आमी नदी को प्रमाण कर उन्होंने कहा, हे मां शांति की खोज में यदि सफल हुआ तो तुम्हारा दर्शन करने फिर आउंगा। ज्ञान प्राप्ति के बाद वे यहां आए भी।
गुरू गोरखनाथ- नाथ संप्रदाय के गुरू गोरखनाथ की तपोभूमि आमी नदी की तलहटी रही। यही उन्होंने अंतिम समय व्यतीत किए।
कबीरदास- 15वीं शताब्दी में कबीरदास काशी छोड़कर मगहर आ गए। आमी नदी के तट पर उन्होंने अंतिम संास ली। यहीं पर उनका नदी किनारे परिनिर्वाण स्थल बना है।
मुहम्मद हसन- 1857 में मुहम्मद हसन के नेतृत्व में लोगों ने अंगे्रजी सेना के साथ युद्व कर उन्हें पराजित किया था। छह माह तक गोरखपुर आजाद रहा।
गुरूनानक देव- इस नदी के तट पर वह भी आज चुके हैं।
-इसी नदी के तट पर संतकबीरनगर जिले में कोपिया गांव बसा है। यहां 2400 वर्ष पुराना कांच का बर्तन बनाने का कारखाना मिला है। इस पर अभी शोध जारी है।
-आमी नदी के किनारे बसे सोहगौरा गांव में 3000 वर्ष अभिलेख मिले हैं।
कार्रवाई नहीं हुई तो सत्याग्रह
आमी की दुदर्शा देख हर किसी का दिल खौल सकता है। इसके पानी से पले-बढे लोेगोें का दिल अगर इसकी स्थिति देख न उबले ऐसा हो ही नहीं सकता। तभी तो आमी को बचाने के लिए बिना कहे लोग जुड़ने लगे। कारवां अपने आप बन गया। आमी बचाओ मंच की स्थापना लोगों ने आमी के लिए की। यह कोई एनजीओ नहीं लोगों का मंच है, जिसके बैनर तले आंदोलन चल रहा है। इस मुददे को लेकर इसके अध्यक्ष विश्वविजय सिंह से बातचीत हुई, पेश है प्रमुख अंश-
-आमी बचाओ आंदोलन से कब और क्यों जुड़े?
-2006 में छात्र राजनीति से निकलने के बाद कुछ सामाजिक कार्य करने की सोच हमने आमी को बचाने की मुहिम शुरू की। मेरे गांव हरिहरपुर के पास से यह नदी बहती है। इसी के पानी में पला-बढ़ा। इसकी दुदर्शा देख रहा नहीं गया और आगे आया।
इसे लेकर पहला आंदोनल कब किया?
-2006 में डीएम आफिस गोरखपुर पर धरना-प्रदर्शन किया गया। इसके बाद नदी में ब्लीचिंग पाउडर फिटकरी डालो अभियान चला।
-आंदोलनों से कितनी सफलता मिली?
- कोई सफलता नहीं मिली। प्रदूषण नियंत्रण विभाग के अधिकारी आए, जांच किए और चले गए। जो उद्योेग गंदगी फैला रहे थे, उन्हें सिर्फ नोटिस जारी की गई। इसके बाद कुछ नहीं हुआ।
-आमी अहिंसा का संदेश देने वाले गौतम बुद्व से जुड़ी रही हैं। फिर आप लोगों ने प्रदूषण बोर्ड के अधिकारियों को बंधक बनाकर क्यों पीटा?
- हम लोगों ने हिंसा का सहारा नहीं लिया। कई बार अधिकारी आए, कुछ नहीं किया। इस बार भी आए तो उन्हीं उद्योगपतियों की गाड़ी से घूम रहे थे और उन्हीं के यहां नाश्ता, भोजन किया। ऐसे में वे क्या कार्रवाई करते। यही देख लोग भड़क उठे। यह जनता का स्वाभाविक आक्रोश था। यहां के लोगों ने पांच सालों तक बुद्व का रास्ता अपनाया। अब स्वतंत्रता सेनानी हसन अली और बंधु सिंह का रास्ता अपना रहे हैं।
-आगे इसे लेकर आपकी क्या योजना है?
- केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जांच के बाद भी कार्रवाई नहीं हुई तो सत्याग्रह किया जाएगा। सरकारी लगान नहीं देंगे और सरकारी कार्यों का बहिष्कार होगा।
आंदोलन की कहानी
5 जून 1994 को बरवलमाफी गांव में एक कार्यक्रम में तत्कालीन कमिश्न और डीएम से पहली बार ग्रामीणों ने शिकायत की।
पूर्व ब्लाक प्रमुख चतुर्भुजा सिंह ने हाईकोर्ट मंें एक याचिका दाखिल कर प्रदूषण पर रोक लगाने की मांग की। हाईकोर्ट ने प्रदूषणकारी कारखानों को बंद करने का निर्देश दिया।
25 मई 2007 को मंजू सिंह ने हाईकोर्ट में एक और याचिका दाखिल की। इसमें गोरखपुर और संतकबीरनगर के प्रशासन और प्रदूषणकारी कारखानों को नोटिस जारी हुआ।
14 जनवरी 2009 को मकर संक्रांति के दिन हजारों लोगों ने आमी में एक मुटठी फिटकरी और ब्लीचिंग पाउडर डालकर अभियान चलाया।
प्रदूषण से प्रभावित गांवों के लोगों ने संघर्ष समितियां बनाई। आमी बचाओ मंच का गठन किया गया। धरना, कार्यक्रम शुरू हुआ।
13 फरवरी को कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी दिग्विजय सिंह और प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा ने प्रभावित क्षेत्र का दौरा किया।
20 अप्रैल को ग्रामीणों प्रदूषण अधिकारियों के साथ दुव्र्यवहार किया।
ये तो हाल है
18 जुलाई 2009 प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने आरटीआई के तहत बताया कि आमी का पानी इंसान क्या जानवरों के पीने लायक भी नहीं है।
8 सितंबर 2009 को बोर्ड ने माना कि आमी के पानी में आक्सीजन नहीं रह गया है।
छह अप्रैल 2010 प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने आमी को प्रदूषित बताते हुए राज्य मुख्यालय से रैना पेपर मिल को बंद करने की संस्तुति की, लेकिन मिल को केमिकल टीटमेंट प्लांट लगाने का समय देकर मिल चलाए रखने की अनुमति दे दी गई।
19 मई 2010 गीडा के मुख्य कार्यपालक अधिकारी ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को पत्र लिखकर गीडा क्षेत्र के उद्योगों में प्रदूषण मानकों की जांच करने को कहा।
20 मई 2010 प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने गीडा क्षेत्र के तीन उद्योगों को प्रदूषण नियंत्रण के मानकों के अनुसार सही नहीं पाया। कोई कार्रवाई नहीं हुई।
सात अप्रैल 2011 सिटी मजिस्टेट ने आमी क्षेत्र के कई गांवों में हैंडपंपों के पानी की जांच की। उन्होंने डीएम को भेजी रिपोर्ट में कहा कि स्थिति खतरनाक स्तर को पार कर चुकी है। इस पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।

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Indian journalist, working in Amar Ujala, Gorakhpur

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